क्या रोबोट हमारी नौकरियां छीन लेंगे?

रोबोट

अगर आपको डर लगता है कि रोबोटों का वक़्त आने वाला है तो डरने की ज़रूरत नहीं. वो पहले से ही हमारे बीच मौजूद हैं.

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के प्रतिनिधि पहले ही हमारी ज़िंदगी के हर पहलू में शामिल हैं- वह हमारे इनबॉक्स को स्पैम मुक्त रखते हैं, वह इंटरनेट के प्रयोग में मदद करते हैं, वह हमारे हवाई जहाज़ चलाते हैं और अगर गूगल को सफ़लता मिली तो जल्द ही वे हमारे लिए हमारी गाड़ियां भी चलाएंगे.

सिलिकॉन वैली के सिंगुलैरिटी विश्वविद्यालय में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के प्रमुख, नील जैकबस्टीन ने बीबीसी से कहा, "आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बसी हुई है."

वे कहते हैं, "इसका इस्तेमाल दवाइयों, कानून, डिज़ाइन बनाने में और पूरी तरह स्वचालित उद्योग में होता है."

और हर दिन अल्गोरिद्म पहले से ज़्यादा चतुर होती जा रही है.

इसका मतलब यह है कि आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी चाहत- ऐसी मशीन की खोज, जो इंसानों जितनी ही बुद्धिमान हो- पूरा होने के बेहद करीब हो सकती है.

जैकबस्टीन का अनुमान है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस 2020 के दशक के मध्य तक इंसानी बुद्धिमत्ता से आगे निकल जाएगी. लेकिन इससे सवाल उठता है- मशीनी बुद्धि के प्रभाव वाला समाज कैसा होगा और हमारी इसमें भूमिका क्या होगी?

रोबोट नौकरियां चुराएंगे?

वैसे शुरुआत में हमें थोड़ा ठहर कर देखना होगा.

दुनिया की सबसे बड़ी कॉन्ट्रैक्ट इलेक्ट्रॉनिक निर्माता, चीनी कंपनी हॉन हाए ने ऐलान किया है कि वह एक रोबॉट बनाने वाली फ़ैक्ट्री बनाएगी और अगले तीन साल में पाँच लाख कर्मचारियों की जगह रोबोट ले लेंगे.

लेकिन नौकरी नहीं रहने का मतलब होगा पगार का न मिलना और ऐसे समाज के लिए यह बहुत बड़ी बात होगी जो अपना जीवन चलाने के लिए पगार पर निर्भर रहने का आदी है.

जैकबस्टीन कहते हैं, "आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से उल्लेखनीय रूप से बेरोज़गारी बढ़ेगी लेकिन यह ग़रीबी के बराबर नहीं होगी."

जैकबस्टीन भी मानते हैं, "आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और तेज़ी से विकसित हो रही दूसरी तकनीकों से भारी मात्रा में संपत्ति पैदा होगी. हमें उसके बंटवारे को लेकर अपने सामाजिक ताने-बाने को बदलने को तैयार होना होगा."

वह उम्मीद ज़ाहिर करते हैं कि इंसान और मशीन पूरी तरह शांति से एक दूसरे के साथ मिलकर काम करेंगे.

वह कहते हैं, "किसी भी समस्या के समाधान का सबसे अच्छा तरीका होगा कि उसे एक इंसान और एक कंप्यूटर एक साथ मिलकर हल करें."

लेखक और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माता जेम्स बैरेट आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बारे में बिल्कुल अलग राय रखते हैं. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के घातक हमले के बारे में वह इतने चिंतित हैं कि उन्होंने इस पर एक किताब लिख डाली है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव का मतलब है मनुष्य के प्रभुत्व का ख़त्म हो जाना.

इंसान जैसे रोबोट

बैरेट ने बीबीसी से कहा, "विकसित आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एक दोनों तरह से इस्तेमाल होने वाली तकनीक है, अणु के विखंडन की तरह. यह शहरों को प्रकाश भी दे सकती है और उन्हें भस्म भी कर सकती है. विकसित रूप में, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस अणु के विखंडन से भी ज़्यादा ख़तरनाक और विस्फ़ोटक हो जाएगी. अभी से ही स्वायत्त ड्रोन और लड़ाई में काम आने वाले रोबोट्स के रूप में इसका हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है."

वह कहते हैं, "किसी भी अन्य विज्ञान से ज़्यादा यह हमें अपने अंदर झांकने को कहती है- वे चीज़ें क्या हैं जिन्हें हम बुद्धिमत्ता, अंतरआत्मा, भावनाएं कहते हैं? लेकिन अपने अंदर झांककर हम अतार्किक हिंसा, तकनीकी लापरवाही के प्रति अपने झुकाव को बेहतर ढंग से देख पाते हैं."

अगर पेंटागन के शोध विभाग डार्पा की दिसंबर में आयोजित प्रतियोगिता के आधार पर देखें तो रोबोटिक क्रांति अभी काफ़ी दूर है.

ऑनलाइन पोस्ट किए गए वीडियो से दिखता है कि रोबोट इंसानों से बहुत धीमे हैं, अक्सर अपने पैरों पर संतुलन बनाए रखने में नाकाम रहे और कुछ तो किसी भी चुनौती को पूरा नहीं कर पाए.

यकीनन रोबोटों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर एक तरह की अतिउत्सुकता है. गूगल ने हाल ही में आठ रोबोटिक कंपनियों को ख़रीदा है तो फ़ेसबुक की अपनी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस प्रयोगशाला है.

कयास इस बात को लेकर लग रहे हैं कि गूगल अपने अधिग्रहणों से क्या करना चाहता है.

बैरेट को लगता है कि गूगल रोबोट बहुत शानदार हो सकते हैं.

वह कहते हैं, "इंसान के स्तर की बुद्धिमत्ता तक पहुंचने का एक रास्ता है. एक उच्च स्तर का निजी सहायक जो सिर्फ़ एक स्मार्टफ़ोन नहीं होगा- बल्कि इसका एक इंसान जैसा शरीर भी होगा. इंसान के जैसा क्यों? ताकि यह आपकी गाड़ी चला सके, आपके उपकरणों का इस्तेमाल कर सके, बच्चे को खिला सके और ज़रूरत पड़े तो आपके बॉडीगार्ड का भी काम करे."

रोबोटों से मुकाबला

अगर रोबोट्स का उभरना अपरिहार्य है- हालांकि इसमें कुछ साल की देरी है- तो फिर यह भी तार्किक है कि इंसान अंततः फ़ैसले लेने की प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे, मतलब यह कि कृत्रिम बुद्धिमान उपकरण ही दूसरे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को नियंत्रित करेंगे.

जैकबस्टीन कहते हैं कि हमारे लैपटॉप और कंप्यूटर में यही हो रहा है.

Image caption रोबोट का मुकाबला करने के लिए इंसान को उनके जैसा बनना होगा.

वह कहते हैं, "एंटी वायरस सॉफ़्टवेयर दरअसल एक आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तकनीक है जो दूसरे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, जिन्हें हम वायरस और वॉर्म्स कहते हैं, उन्हें ढूंढने के लिए इस्तेमाल की जाती है."

वे कहते हैं, "हमें रोबोट्स को नियंत्रण में रखने के लिए उसी तरह की कई परत वाली प्रणाली तैयार करनी होगी जैसी कि इंसानों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में है. हम ख़तरों पर नज़र रखना और ऐसी प्रणाली तैयार करना चाहते हैं जो ग़लत व्यवहार को रोके."

जैकबस्टीन रोबोटों के कब्ज़ा करने को लेकर आशान्वित हैं लेकिन वह यह भी जानते हैं बहुत से इसे एक बुरे सपने की तरह देखते हैं.

वह कहते हैं, "कुछ लोग पूछते हैं, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की संभावनाओं को जानने के बाद भी आप रात को सो कैसे सकते हैं? लेकिन मैं रातों को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की वजह से नहीं इंसानी मूर्खताओं की वजह से जगा रहता हूं."

उनके हिसाब से इंसान रोबोटों के साथ तभी मुकाबले में बना रहेगा जब वह उनकी तरह हो जाए.

वह कहते हैं, "हमारे दिमाग में करीब 50,000 साल से कोई महत्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है और अगर लैपटॉप या स्मार्टफ़ोन में पांच साल में कोई अपग्रेड नहीं होता तो आपको उनके बारे में चिंता होने लगती है."

हमारे पास अब भी सिरी और गूगल नाउ जैसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता है और वह हमारे स्मार्टफ़ोन के ज़रिए लगातार वेब से कनेक्ट रहती है तो यह कल्पना करना बहुत बड़ी बात नहीं होगी कि भविष्य में हमारी खोपड़ी में भी सिलिकॉन लगाए जाएंगे.

और यही अकेला तरीका है रोबोटों से मुकाबला करने का.

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