अगली जंग 'किलर रोबोट्स' लड़ेंगे?

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झाड़-झंखाड़ के बीच एक रोबोट टैंक अपने 'कैटरपिलर ट्रैक्स' पर तेज़ी से जा रहा है. अचानक वह रुकता है और उसकी मशीनगन कमाल की सटीकता से गोलियां दागती है.

यह किसी साइंस फ़िक्शन फ़िल्म का हिस्सा लग सकता है लेकिन दरअसल यह एक रोबोट का वीडियो है जिसका परीक्षण अमरीकी सेना कर रही है.

यह सिर्फ़ एक उदाहरण है कि कैसे कल की साइंस फ़िक्शन फ़िल्मों की कल्पना आज युद्ध के मैदान में हक़ीक़त में बदल सकती है.

यह छोटा सा टैंक, जो सिर्फ़ एक मीटर लंबा है और जिसे उत्तरी अमरीका की क्विनेटिग कंपनी ने बनाया है उन मानवविहीन वाहनों में एक है जिन्हें समुद्र, धरती और हवा में दुनिया भर की सेनाएं इस्तेमाल कर रही हैं.

आज 90 से ज़्यादा देश ऐसे सिस्टम्स को इस्तेमाल कर रहे हैं और शोध कंपनी आईएचएस के अनुसार 2014-23 तक यह उद्योग 57.32 ख़रब रुपए का हो जाएगा.

आईएचएस के डेरिक मैपल कहते हैं, "अमरीका इसका मुख्य बाज़ार और मुख्य खिलाड़ी है लेकिन बहुत से देश मानवरहित सिस्टम की क्षमताएं विकसित कर रहे हैं."

हार्पी ड्रोन

क्विनेटिग के घूमने वाले रोबोट्स को निगरानी करने या शुरुआती आक्रमण के लिए तैयार किया गया है. इन्हें ऐसी जगह भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जहां चोर-फंदे बहुत ज़्यादा लगे हों और सैनिकों को भेजना ख़तरनाक हो सकता है.

ग्रेनेड लॉन्चर या मशीनगन से लैस कंपनी का नया मार्स मॉड्यूलर एडवांस्ड आर्म्ड रोबोटिक सिस्टम बेहद ख़तरनाक है लेकिन स्वतंत्र नहीं है.

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Image caption अमरीकी सेना किलर रोबोट मार्स का परीक्षण कर रही है.

यह रिमोट से नियंत्रित होता है, जो 800 मीटर की दूरी से भी नियंत्रित किया जा सकता है.

हालांकि बहुत से आलोचकों की चिंता यह है कि रोबोटिक्स और लघु रूपांतरण (मिनिचुराइज़ेशन) में ये तकनीकी सुधार आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस (एआई) की ओर ले जाएगा, जो अगर टर्मिनेटर निर्माण की ओर नहीं ले जाता, तो कम से कम उसके अपरिष्कृत पूर्ववर्ती की ओर ले जाएगा.

अन्य लोगों का तर्क है कि एआई के विकास में कई दशक लग सकते हैं और पूर्वाभासी भविष्य के लिए ऐसे सिस्टम्स की निगरानी के लिए "इंसान को भी बीच में रहना चाहिए."

लेकिन इसके बावजूद कुछ ऐसे स्वायत्त हथियार आज भी इस्तेमाल हो रहे हैं, जो खुद तय करते हैं कि हमला करना है या नहीं. मसलन इसराइल के हार्पी ड्रोन को देख लीजिए.

इसके निर्माता, आईएआई, इसे 'दागो और भूल जाओ' हथियार कहते हैं. सेना की भाषा में - एक स्वायत्त हथियार या एक 'देर करने वाला शस्त्र'.

एक बार युद्ध क्षेत्र के पीछे से दागने के बाद हार्पी- जो दरअसल एक पंखों वाली गाइडेड मिसाइल है- इलाक़े के ऊपर तब तक घूमती रहती है जब तक इसे उचित लक्ष्य नहीं मिल जाता, जैसे शत्रु के राडार.

सबसे अहम बात यह है कि एक बार राडार की पहचान के बाद, ड्रोन ही यह तय करता है कि हमला किया जाना है या नहीं.

सचमुच, हार्पी तभी दागा जाता है, जब इसके ऑपरेटर को शक होता है कि शत्रु राडार हैं, जिन पर हमला किया जाना है. मगर इस तरह के ऑटोमेशन जल्द ही आम हो सकते हैं.

'काफ़ी उम्मीद'

कुछ लोगों के अनुसार इन 'किलर रोबोट्स' के व्यापक इस्तेमाल की असली मुश्किल यह है कि उन्हें दोस्त और दुश्मन के बीच फ़र्क कैसे पता चलेगा.

सेंटर फ़ॉर अ न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी के रक्षा विशेषज्ञ पॉल शर्रे कहते हैं, "टैंक तो पिक-अप ट्रक जैसा दिखता है नहीं. लेकिन दुश्मन टैंक और अपना टैंक एक मशीन को एक जैसा दिख सकता है."

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"सेनाएं युद्धक्षेत्र में ऐसी चीज़ तैनात नहीं करना चाहेंगी जो ग़लती से उनकी अपनी ही सेनाओं के ख़िलाफ़ चली जाएं."

अमरीकी वायुसेना की गुप्तचर सेवा के उपप्रमुख जनरल लैरी जेम्स ने भी यही सवाल उठाया था.

"अगर दशक नहीं तो हम ऐसे आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस सिस्टम तैयार करने से कई-कई साल दूर हैं जो फ़र्क कर सकें और फ़ैसले कर सकें."

मानवरहित वायुयानों (यूएवी) का सबसे बड़ा ग्राहक अमरीका है और आने वाले दशक में इसके चीन के मुक़ाबले तीन गुना यूएवी पर ख़र्च करने का अनुमान है. अमरीका के बाद चीन यूएवी पर ख़र्च करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है.

यूएवी पर ख़र्च का मतलब यह है कि धरती या समुद्र में स्थित मानवरहित सिस्टम्स पर भी काफ़ी ख़र्च करना पड़ता है, हालांकि तुलनात्मक रूप से यह कम होता है.

इस तकनीक को विकसित करने में मुश्किलों के बावजूद अमरीकी रक्षा विभाग की पिछले साल प्रकाशित 25-वर्षीय योजना में कहा गया है, "आने वाले वक़्त में लड़ी जाने वाली जंगों में मानवरहित सिस्टमों से काफ़ी उम्मीदें हैं."

'प्रतिबंध'

कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय में रोबोटिक्स के प्रोफ़ेसर और निअर अर्थ ऑटोनॉमी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी संजीव सिंह अमरीकी सेना और अमरीकी रक्षा अनुसंधान संस्थान डार्पा में काम कर रहे हैं.

उनकी टीम ने मानवरहित स्यावत्त हैलिकॉप्टर को सफ़लतापूर्वक प्रदर्शित किया है. रिमोट सेंसिंग लेज़र का इस्तेमाल कर यह वायुयान इलाके का एक नक़्शा बनाता है. पहुंचने के सुरक्षित रास्ते तय करता है और खुद अपनी लैंडिंग साइट्स चुनता है- बिनी किसी हैलीकॉप्टर या ऑपरेटर के.

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अब ये लोग सेना के लिए स्यायत्त हैलीकॉप्टर तैयार करने पर काम कर रहे हैं, जो सामान ले जा सकें या घायलों को बाहर निकाल सकें.

वह कहते हैं कि यह ड्रोन के मुकाबले एक बड़ा कदम होगा जो "जीपीएस से प्राप्त डेटा से चलाए जाते हैं."

"अगर आप फ़्लाइट प्लान में एक भी ग़लती कर दें, तो वो आसानी से रास्ते में पड़ने वाले पहाड़ से टकरा जाएंगे."

स्वतंत्र रक्षा विश्लेषक पॉल बीवर कहते हैं, कि इस क्षेत्र में जितना पैसा लगाया जा रहा है उससे अंततः स्वायत्त हथियार सिस्टम विकसित हो ही जाएंगे.

उन्होंने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के बिज़नेस डेली कार्यक्रम को बताया, "यह भी किसी परमाणु हथियार की तरह है, आप इसमें विनिवेश नहीं कर सकते."

चिंताजनक बात यह है कि उन्हें सबसे ज़्यादा डर सरकारों से नहीं है, "मुझे लगता है कि करीब एक दशक में ही संगठित अपराधी संगठन इस तरह के हथियार सिस्टमों को आतंकी समूहों को बेचने लगेंगे."

इस महीने की शुरुआत में 117 देशों के प्रतिनिधियों ने जेनीवा में संयुक्त राष्ट्र की बैठक में ऐसे घातक स्वायत्त हथियर सिस्टम्स पर प्रतिबंध लगाने पर विचार किया.

हालांकि "किलर रोबोट्स" वाली तकनीक अब भी ठीक से मौजूद नहीं है, फिर भी इसके विरोधियों का कहना है कि दुनिया को अभी हरकत में आ जाना चाहिए.

ह्यूमन राइट्स वॉच के स्टीफ़न गूस कहते हैं, "ऐसे बहुत से लोग हैं, जो इन्हें अनिवार्य और वांछित मानते हैं. इन्हें रोकने के लिए हमें अभी क़दम उठाने होंगे. यह एकदम ज़रूरी है, हालांकि हम भविष्य के हथियारों के बारे में बात कर रहे हैं."

किलर कंप्यूटर्स

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हालांकि स्वायत्त ड्रोनों के सैन्य इस्तेमाल पर ध्यान केंद्रित कर हम संभवतः उस बड़े ख़तरे को अनदेखा कर रहे हैं जो लगातार परिष्कृत होती आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस से पैदा हो रहा है.

कैंब्रिज विश्वविद्यालय में अस्तित्ववादी खतरों के शोध केंद्र के शॉन ओ-हीगीर्टैग कहते हैं, "मुश्किल यह है कि हम ऐसी चीज़ बना रहे हैं जो बहुत तेज़ी से चलती है और हम हमेशा परिणामों का अनुमान लगा सकते हैं."

वह कहते हैं, "इनके फ़ैसले करने की प्रक्रिया को रोकना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि ये सिस्टम इंसानों के मुक़ाबले बहुत तेज़ी से काम करते हैं."

वह चेतावनी देते हैं कि विरोधाभास यह है कि एआई का नागरिक इस्तेमाल सैन्य इस्तेमाल से ज़्यादा ख़तरनाक हो सकता है.

डॉक्टर ओ-हीगीर्टैग के अनुसार, "क्योंकि यह सेना के लिए नहीं हैं इसलिए यहां सुरक्षा और नैतिकता को लेकर उस तरह का ध्यान नहीं होगा."

"यह संभव है कि कोई चीज़ हाथ से निकल जाए. ख़ासतौर पर अगर आपको ऐसा अल्गॉरिद्म मिले जो खुद में सुधार करने और अपना कोड फिर लिखने में सक्षम हो."

दूसरे शब्दों में, शायद हमें किलर रोबोट्स के बजाय किलर कंप्यूटर्स से डरने की ज़्यादा ज़रूरत है.

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