जीन टेस्ट 'बचाएगा कैंसर के मरीज़ों की जान'

  • 2 अक्तूबर 2014
कैंसर की कोशिकाएं इमेज कॉपीरइट SPL

छोटी आंत के कैंसर से जूझ रहे मरीज़ों को नई ज़िंदगी मिल सकती है.

एक शोध में कहा गया है कि इनके मरीज़ों की आनुवांशिक जांच के जरिए ये पता लगाया जा सकता है कि उनके कैंसर के बढ़ने का खतरा और कितना है.

ट्यूमर की आनुवांशिक जांच से मरीज़ों की ज़िंदगी बच सकती है और यह ब्रितानी स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने वाले एनएचएस के लिए कम खर्चीला भी होगा.

आनुवांशिक कारणों से होने वाले कैंसर के बढ़ने का ख़तरा अधिक रहता है, ख़ासकर आंत और गर्भाशय के कैंसर का. इसे लिंच सिंड्रोम कहते हैं.

कैंसर रिसर्च के लिए करोड़ों रुपए जुटाने वाले किशोर स्टीफ़न सटन के परिवार में भी कैंसर का इतिहास रहा है.

आनुवांशिक जांच

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Image caption स्टीफन सटन ने कैंसर रिसर्च के लिए 30 करोड़ से भी ज्यादा रकम जुटाई है

यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्ज़ेटर के मेडिकल स्कूल से जुड़े डॉक्टर ट्रिस्टान स्नोसिल कहते हैं, "लिंच सिंड्रोम या कैंसर की आशंका वाले लोगों की सेहत सुधारने का ये एक तरीका है. खासकर उन लोगों के लिए, जिन्हें नहीं मालूम कि उन्हें ये हो सकता है."

रिसर्च टीम में डॉक्टर ट्रिस्टान के साथ काम करने वाले कार्डिफ़ यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल जेनेटिक्स के डॉक्टर इयन फ़्रेलिंग का कहना है, "आनुवांशिक जांच की लागत अब कम हो रही है. छोटी आंत के कैंसर से पीड़ित मरीज़ों के लिए ये अच्छी खबर है कि वे इसकी जांच करवा सकते हैं. इससे लोगों की ज़िंदगी बचाई जा सकेगी."

लिंच सिंड्रोम

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50 साल तक की उम्र वाले आंत के कैंसर के 12 मरीजों में से एक का मामला लिंच सिंड्रोम का होता है.

एक तिहाई लोगों की आंत का कैंसर 70 साल की उम्र आते-आते पूरी तरह विकसित हो जाता है.

करीबी रिश्तेदारों पर लिंच सिंड्रोम के असर की संभावना 50 फीसदी होती है.

अगर उनकी पहचान समय रहते हो जाए तो दवाओं के जरिए इसके असर को कम किया जा सकता है.

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