अब ‘बकवास’ नहीं करेगा आपका स्मार्टफ़ोन!

  • 8 अक्तूबर 2014
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भारत की स्मार्टफ़ोन क्रांति ने रफ़्तार पकड़ ली है और हर साल क़रीब दो सौ फ़ीसदी की रफ्तार से स्मार्टफ़ोन बिक्री में इज़ाफ़ा हो रहा है. लेकिन ये स्मार्टफोन आपका ख़ासा समय भी नष्ट कर रहे हैं.

स्मार्टफ़ोन्स और टैबलेट्स अपने यूज़र्स को पूरी तरह से कनेक्टेड होने का एहसास कराते हैं, चाहे वो सोशल मीडिया के ज़रिए हो या फिर ईमेल, एसएमएस या फोन कॉल्स.

लेकिन यही स्मार्टफ़ोन आपके दिन का एक बड़ा हिस्सा चट कर जाता है. आखिर कैसे?

मार्केटिंग कॉल्स, फेसबुक, वॉट्सऐप, जंक ई-मेल और गैरज़रूरी सोशल मीडिया अपडेट.....ये आपके दिन का बड़ा समय बर्बाद कर देते हैं.

मोबाइल बदल रहा आपका व्यवहार?

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लिहाज़ा कई बार अपने दफ़्तर, दोस्तों और परिजनों के बीच बैठकर भी यूज़र्स मोबाइल की स्क्रीन पर टकटकी लगाए रहते हैं.

धीरे-धीरे ये व्यवहार में परिवर्तित हो जाता है और ऐसे यूज़र्स सोशल सर्कल में अनपॉपुलर होने लगते हैं.

ऐसी परिस्थिति से बचने के लिए कई तरह के ऐप्स भी अब बाज़ार में आने लगे हैं जो यूज़र्स को मोबाइल स्क्रीन ब्रेक लेने की हिदायत देते हैं, आपको अनचाहे नोटिफ़िकेशन से बचाते है.

‘ऑफ़टाइम’ ऐसा ही एक ऐप है.

ये ऐप इस बात की जानकारी जुटाती है कि यूज़र किस ऐप का प्रयोग कितने देर तक करता है. आप चाहें तो अपने प्रयोग की अवधि निर्धारित कर सकते हैं.

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साथ ही यूज़र्स अपने फेवरेट कॉलर्स को चुन सकते हैं और ‘डू नॉट डिस्टर्ब’ ऑप्शन पर भी उनके कॉल्स प्राप्त कर सकते हैं, ताकि कोई ज़रूरी कॉल मिस न हो.

डिस्टर्ब होने से बचाएंगे ऐप्स?

ऑफ़टाइम ऐप बनाने वाली जर्मन कंपनी के प्रमुख माइकल डेटबार्न कहते हैं, “लोग अब ये समझने लगे हैं कि उन्हें मोबाइल चेक करने की आदत पड़ गई है, चाहे कोई नया मैसेज आया हो या नहीं. हम चाहते हैं कि लोग जाने कि वो कितना समय मोबाइल पर बर्बाद कर रहे हैं.”

एक अन्य अमरीकी ऐप ‘चेकी’ यूज़र्स को बताता है कि वो अपना फ़ोन कब और क्यों यूज़ करते हैं. ये ऐप एंड्रॉएड और आईओएस पर मुफ़्त में उपलब्ध है.

अगर आकड़ों पर ध्यान दें तो, तकनीकी कंपनी एरिकसन की एक रिसर्च कहती है कि भारत में यूज़र्स हर रोज़ तीन घंटे 18 मिनट अपने मोबाइल को देते हैं.

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वहीं रिसर्च कंपनी नीलसन के अनुसार अमरीका में ये आंकड़ा 90 मिनट का है.

ताज़ा रिसर्च उस पुरानी बहस को फिर हवा दे रहे हैं कि स्मार्ट मशीनों को यूज़र्स इस्तेमाल कर रहे हैं या मशीनें हमें?

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