मलेरिया के ख़िलाफ़ जंग को इबोला से ख़तरा!

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एक मलेरिया विशेषज्ञ के मुताबिक़ पश्चिम अफ़्रीकी देशों में मलेरिया के ख़िलाफ़ जारी लड़ाई को इबोला संकट के कारण झटका लग सकता है.

'रोल बैक मलेरिया (आरबीएम) पार्टनरशिप' की प्रमुख डॉ. फ़ाटोमाता नफ़ो त्राओरे ने पश्चिम अफ़्रीकी देशों का दौरा किया.

डॉ. त्राओरे ने वहां की स्थिति के बारे में कहा, "स्वाभाविक है स्वास्थ्य कर्मियों का ध्यान इबोला की तरफ़ है."

उनके मुताबिक़ हर साल मलेरिया के मरीजों से भरे रहने वाले बच्चों के वॉर्ड में 'सन्नाटा पसरा' है.

मलेरिया की स्थिति

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Image caption मलेरिया और इबोला के प्राथमिक लक्षण एक समान हो सकते हैं.

इबोला से सबसे ज़्यादा प्रभावित तीन देशों लाइबेरिया, सिएरा लियोन और गिनी में 2012 में करीब 7,000 लोगों की मौत हुई थी..

लेकिन डॉ. त्राओरे को आशंका है कि मलेरिया के ख़िलाफ़ मिली बढ़त, इबोला संकट के कारण प्रभावित हो सकती है.

मलेरिया के कारण साल 2012 में सिएरा लियोन में करीब 4,000 मौतें हुईं, लाइबेरिया में लगभग 2,000 और गिनी में तकरीबन 1,000 लोगों की मौत हुई थी.

इबोला का असर

आरबीएम की प्रमुख ने कहा कि इन देशों में पाँच साल पहले हालात इससे भी बदतर थे और मलेरिया से दोगुनी मौतें होती थीं.

वो कहती हैं, "हम मानते हैं कि मलेरिया से किसी भी बच्चे की मौत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि हमारे पास इसे रोकने और उपचार के तरीके मौजूद हैं."

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Image caption आरबीएम की प्रमुख डॉ. फ़ाटोमाता नफ़ो त्राओरे कहती हैं कि इबोला संकट ने मलेरिया से ध्यान हटाया है.

उऩके मुताबिक़ स्वास्थ्य कर्मियों पर लोगों का भरोसा कमज़ोर हुआ है क्योंकि लोग उनको ही वायरस का संक्रमण फैलाने की वजह मान रहे हैं.

उन्होंने कहा, "हम इस बात से चिंतित है कि ऐसे हालात में मलेरिया से लड़ने की हमारी कोशिशों को झटका लगेगा."

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