क्या इंटरनेट दूर करेगा हेल्थ सेक्टर का भ्रष्टाचार?

भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं, डॉक्टर

भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर लंबे समय से बहुत कुछ कहा सुना जाता रहा है.

इस चिंता के कई पहलू हैं. सरकारी अस्पतालों की स्थिति, महंगा इलाज, डॉक्टरों की परेशानी और इन सबके इतर तकलीफ़ भुगत रहा मरीज़.

लेकिन एक चीज़ जो कहीं ज़्यादा परेशान करती है, वह है स्वास्थ्य क्षेत्र का भ्रष्टाचार. डॉक्टरों पर कमीशनखोरी के लगने वाले आरोप और नकली दवाईयों के मामले ही समस्या नहीं हैं.

अब अच्छे डॉक्टरों को खोजना भी एक अलग चुनौती है.

एलिस फ्रांसिस की ख़ास रिपोर्ट

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ये साल 2011 की बात है. अमरेंद्र कुमार को पता चला कि दिल्ली के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक के डॉक्टर ने उनकी भतीजी को दिल के ऑपरेशन कराने की सलाह दी थी.

कुमार की भतीजी को इस ऑपरेशन की ज़रूरत नहीं थी और डॉक्टर की सलाह देने का अंदाज़ लगभग दबाव देने जैसा था. उन्होंने दो-तीन अन्य डॉक्टरों से भी सलाह ली और सभी ने यही बात कही कि बच्ची को निगरानी और देखभाल की ज़रूरत है.

कुमार कहते हैं, "मैं अवाक रह गया था." एक साल पहले कुमार ने देखा था कि उनके दोस्त अमित भगत किस तरह से पिता को हार्ट अटैक आने के बाद एक भरोसेमंद डॉक्टर की तलाश कर रहे थे.

बुनियादी ढांचा

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इस वाकये के बाद बिज़नेस की पढ़ाई कर चुके कुमार ने 'सर्जरिका' नाम से एक वेंचर शुरू किया ताकि लोगों को अच्छे डॉक्टर खोजने में आसानी हो सके.

पिछले साल शुरू की गई 'सर्जरिका' एक ऑनलाइन मंच की तरह है जो भारत भर के डॉक्टरों के बारे में जानकारी देती है और उनकी सेवाएं लेने वाले लोग डॉक्टर के बारे में अपनी राय रेटिंग की शक्ल में देते हैं.

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत में जो बुनियादी ढांचा मौजूद है, उसमें भ्रष्टाचार हर कहीं देखा जा सकता है. वो चाहे महंगे अस्पताल हों या फिर भीड़ भाड़ वाले सरकारी अस्पताल.

जुलाई के महीने में भारत के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने वादा किया था कि वे कमीशन के लिए किसी और के पास रेफर करने वाले डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे.

नए तरीके

हालांकि तब एक ऑस्ट्रेलियाई डॉक्टर ने एव क अस्पताल के इस तरह के बर्तासे तंग आकर उन्हें चिट्ठी लिखी थी.

साल भर पहले गैर सरकारी संगठन ऑक्सफ़ैम ने कहा था कि हज़ारों की तादाद में महिलाओं को बच्चेदानी हटाने के गैर ज़रूरी ऑपरेशन के लिए झांसा दिया गया था.

इसी वजह से कई लोग डॉक्टरों पर यकीन करने से घबराते हैं. और यही कारण है कि लोग नए ज़रियों की तलाश कर रहे हैं. नौजवान भारतीय लोग नई तकनीक के सहारे पुराने तौर तरीके बदलने की कोशिश कर रहे हैं.

पिछले साल ऑनलाइन मार्केट में स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी कई नई शुरुआत हुई थी. इसमें 'सर्जिरिका', 'मेडिपाल' और 'लाइब्रेट' शामिल थे.

डॉक्टर की तलाश

डॉक्टरों की रेटिंग करने का तरीका वैसा ही है जो लोकप्रिय अमरीकी वेबसाइट रेटएमडीएस डॉटकॉम का है. लेकिन ये प्लेटफॉर्म्स खास भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं.

फ़ेसबुक के लिए काम कर चुके सौरभ अरोड़ा ने लाइब्रेट की शुरुआत की है.

उनका कहना है, "ज़्यादातर भारतीय मोबाइल के ज़रिए पहली बार इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे हैं न कि कंप्यूटर पर. इसलिए ऐसी किसी भी कोशिश को मोबाइल प्लेटफॉर्म पर ध्यान देना होगा."

लाइब्रेट के यूज़र उसके एंड्रॉयड ऐप के ज़रिए डॉक्टर की तलाश कर सकते हैं, उनका वक्त ले सकते हैं और डॉक्टर की सेवा की रेटिंग कर सकते हैं.

इस सहूलियत में मरीज़ो का मेडिकल रिकॉर्ड्स ऑनलाइन सुरक्षित रखने की सुविधा भी शामिल है.

स्मार्टफोन

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सौरभ अरोड़ा बताते हैं, "पहले मरीज़ो के मेडिकल रिकॉर्ड्स केवल डॉक्टर रखते थे लेकिन नई तकनीक मरीज़ो को भी अपना मेडिकल रिकॉर्ड्स देखने की सुविधा देती है."

सौरभ की कोशिश को सिलिकॉन वैली की एक कंपनी से सितंबर में डेढ़ मिलियन डॉलर की फंडिंग मिली है. लाइब्रेट मरीज़ो के लिए फ्री है लेकिन डॉक्टरों को इस पर रजिस्टर्ड होने के लिए हर महीने एक फीस चुकानी होती है.

वे जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है वे भी फोन पर अपने डॉक्टर का फीडबैक दे सकते हैं. और फोन नंबर की इस सुविधा में मिसकॉल्ड देने की सहूलियत भी शामिल है.

भारत जैसे देश में जहां पैसे की अहमियत ज़्यादा है, वहां इस तरह की सहूलियत मायने रखती है.

सर्जरिका की शुरुआत करने वाले भगत ने सीड फंडिंग के रास्ते दो लाख अमरीकी डॉलर जुटाए. भारत में यह चिंता का एक बड़ा कारण रहा है कि यहां ज्यादातर लोगों का बीमा नहीं है.

अस्पताल

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सरकारी अस्पतालों की स्थिति ऐसी है कि गरीब लोगों को भी प्राइवेट क्लिनिक में जाना पड़ता है और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे रहता है.

भगत का कहना है कि यहां के अस्पताल अपनी फीस तय करने के लिए स्वतंत्र हैं और इसके पीछे कोई तर्क नहीं देखा जाता है.

सर्जरिका के यूजर 900 अस्पतालों और 1200 डॉक्टरों के बीच उनकी फीस के आधार पर अपना विकल्प चुन सकते हैं.

भगत ने भारत के बड़े प्राइवेट अस्पतालों को इस प्लेटफ़ॉर्म पर लाने की नाकाम कोशिश की. वे कहते हैं, "हमने उन्हें मनाने की कोशिश की लेकिन वे हमें पसंद नहीं करते हैं."

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स

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यहां सवाल केवल अच्छे डॉक्टरों की तलाश का नहीं है बल्कि नकली दवाईयों से निपटने की चुनौती भी है, ब्लड बैंक के ब्लैक मार्केट से भी कुछ लोगों को जूझना पड़ता है.

कुछ दवा विक्रेता जेनेरिक दवाईयों की बेजा कीमत वसूल रहे हैं. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर नए तौर तरीके ईजाद करने वाले लोगों के सामने इन समस्याओं से निपटने की भी चुनौती भी है.

इस तरह की पहल करने वाले उद्यमियों के सामने दूसरा सवाल फंडिंग में आ रही मुश्किलों से जुड़ा हुआ है.

हेल्थस्टार्ट शुरू करने वाले प्रदीप जयसिंह कहते हैं कि दुनिया भर में इस तरह की कोशिशों को परिपक्व होने में वक्त लगा है, इसलिए हमें भारत में भी इनसे कुछ सीखना होगा.

हेल्थ केयर सेक्टर

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केपीएमजी के हेल्थकेयर प्रमुख अमित मुकीम कहते हैं भारत में 24.3 करोड़ लोगों की पहुंच इंटरनेट तक है और यह देश की आबादी का 19 फ़ीसदी है. अब ये लोग हेल्थ के लिए ऑनलाइन पर जा रहे हैं.

दिल्ली स्थित एम्स के हृदय रोग विशेषज्ञ बलराम भार्गव मानते हैं कि भारत में हेल्थ केयर सेक्टर के काम करने के तरीके तकनीक के बहुत गुंजाइश है लेकिन मर्यादाओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.

वे कहते हैं, "और जो चीज सबसे ज्यादा जरूरी है, वह है भारत में मरीजों और डॉक्टरों के रिश्ते को फिर से मज़बूत करना."

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