क्यों हो रही हैं इतनी ज़्यादा कॉल ड्रॉप?

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भारत के दूरसंचार मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कॉल ड्रॉप के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का एलान किया है.

उन्होंने मोबाइल कंपनियों से कहा है कि उनके पास काफी स्पेक्ट्रम है इसलिए अब उनके पास सर्विस की क्वालिटी सुधारने को लेकर कोई बहाना नहीं होना चाहिए.

बीबीसी हिंदी को दिए गए एक इंटरव्यू में टेलीकॉम मंत्री ने कहा कि 'अब कंपनियों की बहानेबाज़ी नहीं चलेगी.'

दूरसंचार विभाग अब टेलीकॉम कंपनियों का ऑडिट करने की तैयारी कर रहा है ताकि वो ये पता कर सके कि सर्विस क्वालिटी बनाए रखने की कोशिश कंपनियां कैसे कर रही हैं.

टेलीकॉम रेगुलेटर ट्राई ने 2013 में टेलीकॉम कंपनियों के ख़िलाफ़ पांच करोड़ रुपये जुर्माना लगाया था क्योंकि उनकी सर्विस क्वालिटी ख़राब पाई गई थी.

ट्राई के रिपोर्ट में पाया गया था कि 2014 जून में सभी 3G टेलीकॉम सर्विस के लिए 14 फीसदी कॉल ड्रॉप हुए थे. इससे तीन महीने पहले ये संख्या नौ फीसदी थी.

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2014 के आखिरी तिमाही में ट्राई के महाराष्ट्र और गोवा के सर्वे में कई मोबाइल कंपनियों की सर्विस क्वालिटी मान्य नियमों से कम पाई गई.

दुनिया भर के टेलीकॉम रेगुलेटर सर्विस क्वालिटी ख़राब होने पर टेलीकॉम कंपनियों के ख़िलाफ़ जुर्माना लगाते हैं.

द मिंट अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक़, इस सर्वे में पाया गया कि कॉल ड्रॉप के लिहाज़ से एयरसेल सबसे बढ़िया टेलीकॉम कंपनी है और इस मामले में सबसे पिछड़े हैं एमटीएनएल, रिलायंस टेलीकॉम और आइडिया सेलुलर.

इस सर्वे को सात शहरों में करवाया गया जिसमें 4000 लोगों से राय ली गई थी.

आखिर ये कॉल ड्रॉप होता क्यों है? क्या सिर्फ कंपनियां इसके लिए जिम्मेदार हैं?

कंपनियों का कहना है कि उनके पास स्पेक्ट्रम नहीं है. ये बात पूरी तरह सही नहीं है. टेलीकॉम सर्विस के लिए स्पेक्ट्रम हाईवे की तरह है.

अगर नेशनल हाईवे आगे जाकर थोड़ा तंग स्टेट हाईवे की तरह हो जाता है तो आपको गाड़ी की रफ़्तार धीमी करनी पड़ेगी. मोबाइल सब्सक्राइबर की हालत, खासकर बड़े शहरों में, कुछ ऐसी ही है.

गिरती क्वालिटी

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जब इस हाईवे पर ट्रैफिक बढ़ जाता है, या जब ऑफिस के समय ज़्यादा लोग अपने मोबाइल इस्तेमाल करने लगते हैं, तो सभी की रफ़्तार धीमी हो जाती है या मोबाइल के मामले में फ़ोन कनेक्ट करना भी कभी कभी मुश्किल हो जाता है.

टेलीकॉम कंपनियों के लाइसेंस में सेवा गुणवत्ता बनाए रखने की बात की गई है. ट्राई इस बात पर नज़र भी रखता है.

लेकिन सेवा की गुणवत्ता के मायनों को हमेशा सख़्ती से लागू नहीं किया जाता है.

घनी आबादी वाले क्षेत्र में टेलीकॉम टावर की कमी के कारण भी कॉल ड्रॉप होता है. गाड़ी में एक जगह से दूसरे जा रहे हैं तो कॉल ड्रॉप होना कोई नई बात नहीं है.

नए टावरपर खर्च

हर शहर में सैकड़ों टॉवरों का जाल बिछा होता है. लेकिन एक टावरसे दूसरे टावरको आपका कॉल हैंडओवर अगर ठीक तरीके से नहीं होगा तो कॉल ड्रॉप हो सकता है.

जब मोबाइल फ़ोन ट्रैफिक किसी एक या दो टावरपर बहुत ज़्यादा होता है तब भी कॉल ड्रॉप होना आम बात है.

मोबाइल टावरसे रेडिएशन के ख़तरे के कारण कई बिल्डिंगों पर ये टावरलगाना मुश्किल हो गया है.

इसलिए इंडस्ट्री के कुछ लोग ये मानते हैं कि मोबाइल फ़ोन कंपनियों को कम रेडिएशन वाले ज़्यादा टावरलगाना चाहिए जिससे ये ख़तरा कम हो सकता है.

कंपनियों का कहना है कि उन्हें वॉयस कॉल के लिए इतने पैसे नहीं मिल रहे हैं और ज़्यादा टावरलगाने के लिए ख़र्च करना मुश्किल है.

एयरटेल, आइडिया और रिलायंस कम्युनिकेशंस के तिमाही नतीजे के आंकड़े देखेंगे तो ये साफ़ है कि अब नए टावरलगाने के लिए कम पैसे ख़र्च किए जा रहे हैं.

4-जी का आगमन

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कॉल की दरें अब भी नहीं बढ़ रही हैं और कंपनियां आपके फ़ोन पर बात करने से ज़्यादा पैसे नहीं बना रही हैं.

कंपनियों के पास अब इस सेवा को बढ़िया करने से और पैसे नहीं मिलेंगे.

रिलायंस जिओ के 4-जी सर्विस लांच से मोबाइल फ़ोन पर बात करने की दरों में और कमी आ सकती है और डेटा के दाम भी कम होने की उम्मीद है.

इसके मुकाबले डेटा का इस्तेमाल बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है इसलिए कंपनियां अब 3-जी डेटा सर्विस पर ध्यान दे रही हैं.

पिछले साल भर में कई बार डेटा की दरों में बढ़ोतरी की गई है.

कंपनियों ने दाम बढ़ाने के अलावा डेटा के लिमिट में भी कमी कर दी. यानी ग्राहकों को कम डेटा के लिए अब पहले से कहीं ज़्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं.

3-जी सर्विस के लिए किसी भी कंपनी के पास पूरे देश का लाइसेंस नहीं है. इसलिए उन्होंने एक दूसरे के साथ ये क़रार किया है ताकि ग्राहकों को दिक्कत न हो.

दिल्ली के वोडाफोन के 3-जी ग्राहक अगर हैदराबाद या इलाहबाद जाएंगे तो भी उन्हें 3-जी सेवा मिलेगी, हालांकि वहां वोडाफोन के पास 3-जी सेवा के लिए लाइसेंस नहीं है.

फ़ोन कॉल

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रिलायंस जिओ एकमात्र मोबाइल फ़ोन कंपनी है जिसके पास 4-जी का लाइसेंस देश भर के लिए है. इसकी सर्विस इस साल शुरू होने की उम्मीद है.

कॉल की दरों को लेकर एक बार फिर जंग शुरू होने की उम्मीद की जा रही है. इसलिए, वॉयस कॉल के अच्छे दिन आएंगे, ऐसा सोचना अभी शायद ग़लत होगा.

अब तक ट्राई को जो आंकड़े मोबाइल फ़ोन कंपनियां देती थीं, उन्हें देखकर ऐसा नहीं लगता है कि कॉल ड्रॉप 2 फीसदी से ज़्यादा होता है.

लेकिन अगर दूरसंचार विभाग विशेष ऑडिट करेगा तो सब कुछ दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.

कंपनियों को अपने वॉयस कॉल के लिए अगर आप ज़्यादा पैसे देंगे तो आप सुधार की उम्मीद कर सकते हैं. लेकिन अगर ग्राहकों से ज़्यादा पैसे लेने हैं तो उन्हें ट्राई और दूरसंचार विभाग के डंडे के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा.

पैसे का तमाशा

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अब मोबाइल फ़ोन कंपनियों को ट्राई, ग्राहक, दूरसंचार विभाग और अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी, रिलायंस जिओ - सबका सामना करना पड़ेगा.

इस लड़ाई में उनके लिए एक ही बढ़िया चीज़ है - डेटा सर्विस की मांग, जो तेज़ी से बढ़ रही है और उससे मुनाफ़ा भी.

ग्राहकों के लिए कॉल ड्रॉप के सिरदर्द का सार एक ही लाइन में है- पैसा फेंको, तमाशा देखो.

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