'सोशल मीडिया से बच्चों की नींद हुई हराम'

  • 15 सितंबर 2015
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एक शोध में पाया गया है कि 12 से 15 साल के हर तीन में से एक से ज़्यादा बच्चों की नींद हफ़्ते में कम से कम एक बार टूट जाती है.

शोध के मुताबिक बच्चों की नींद टूटने की वजह सोशल मीडिया का इस्तेमाल है.

कार्डिफ़ विश्वविद्यालय की टीम ने पाया कि हर पांच बच्चों में से एक से ज़्यादा ने रात में उठ कर सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया और इसके चलते अगले दिन स्कूल में उन पर थकान हावी रही.

पूरे वेल्स के अलग अलग स्कूलों के 848 बच्चों का सर्वे किया गया और इसमें पाया गया कि हर तीन बच्चे में से एक बच्चा लगातार थका हुआ था.

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लेकिन इसकी तुलना में उन बच्चों का संख्या कहीं ज़्यादा थी जिन्होंने सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं किया और उन सभी बच्चों के जागने का समय एक ही था.

आयु वर्ग: 12 से 13 साल

पहला सर्वेक्षण 12 से 13 साल के 412 बच्चों पर किया गया.

इनमें 22 फ़ीसदी बच्चे ऐसे थे जो कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल के चलते हर रात जगाते थे.

14 प्रतिशत बच्चे ऐसे थे, जिनकी नींद कम से कम हफ़्ते में कम से कम एक बार टूटती थी.

आयु वर्ग: 14 से 15 साल

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दूसरा सर्वेक्षण 14 से 15 साल के 436 बच्चों पर किया गया.

इस सर्वे के मुताबिक ऐसे बच्चों की संख्या 23 प्रतिशत थी जो कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल के चलते जागते थे.

इस आयु वर्ग में 15 प्रतिशत बच्चे ऐसे थे जो कि हफ़्ते भर में कम से कम एक बार सोशल मीडिया का इस्तेमाल के चलते जागते थे.

ये शोध कार्डिफ़ विश्वविद्यालय के डॉ किम्बर्ले हॉर्टॉन ने किया है. उनका कहना है, 'लगता है अब वक्त आ गया है कि रात के दौरान सोशल मीडिया के इस्तेमाल को बढ़ावा ना दिया जाए.'

शोध में पाया गया कि सही वक्त पर बिस्तर पर ना जाने और ना सोने के चलते ही बच्चे हमेशा थके रहते हैं.

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