जो सूंघकर पहचान सकती हैं पार्किसंस का मरीज़

  • 23 अक्तूबर 2015
जॉय

पर्थ की एक महिला सूंघकर ही इस बात का पता लगा लेती है कि किसे पार्किंसंस बीमारी है या होने वाली है.

इससे डॉक्टरों को इस लाइलाज बीमारी का ठीक-ठीक पता लगा पाने की उम्मीद जगी है.

पर्थ में रहने वाली जॉय मिलने के पति लेस की पार्किसंस बीमारी से 65 की उम्र में मौत हुई थी. उन्हें 45 साल की उम्र में यह बीमारी हुई थी.

ब्रिटेन में हर पांच सौ लोगों में से एक व्यक्ति इस बीमारी से पीड़ित है. पूरे ब्रिटेन में पार्किसंस के एक लाख 27 हज़ार मरीज़ हैं.

इस बीमारी में रोगी को चलने, बोलने और सोने में खासी दिक्कत होती है. इसके इलाज और जांच की कोई निश्चित विधि नहीं तलाशी जा सकी है.

Image caption जॉय के पति लेस.

हालांकि लेस की बीमारी का ठीक-ठीक पता चलने के छह साल पहले ही जॉय ने कुछ बदलाव महसूस किए थे.

वो बताती हैं, “उनकी गंध बदल गई थी और ये ऐसी थी जिसे बता पाना मुश्किल है. यह अचानक नहीं बल्कि धीरे धीरे हुआ. कस्तूरी जैसी गंध आने लगी.”

जॉय इस गंध को तब समझ पाईं जब वे एक चैरिटी संस्था पार्किसंस यूके में काम कर रही थीं.

इसकी संभावना को देखते हुए उन्होंने बातचीत के दौरान एक वैज्ञानिक को इस बारे में बताया जिससे वो चकित रह गए थे.

एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी ने जॉय का परीक्षण करने का फैसला किया और पाया कि वो बहुत सही थीं.

यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ बायोलॉजिकल साइंसेज़ में पार्किंसंस यूके के साथ जुड़कर काम करने वाले डॉक्टर टिलो कुनाथ को जॉय ने इस बारे में पहली बार बताया था.

वो कहते हैं, “पहली बार हमने पार्किसंस के छह रोगियों और छह स्वस्थ लोगों को लेकर जॉय का परीक्षण किया.”

उनके मुताबिक़, “इन लोगों को हमने एक पूरा दिन पहनने के लिए टी-शर्ट दिए और फिर वापस लेकर उन्हें कूट भाषा में निशान लगाकर पैक कर दिया.”

वो बताते हैं, “जॉय का काम था ये बताना कि किसे पार्किंसंस है, किसे नहीं है. उनका आंकलन 12 मामलों में से 11 में सही था.”

कुनाथ कहते हैं, “वो सभी छह रोगियों को पहचान गई थीं लेकिन स्वस्थ लोगों में से एक के बारे में उन्हें पूरा भरोसा था कि वो भी रोगी है.”

वो बताते हैं, “हालांकि उस इंसान को रोग नहीं था. लेकिन इस परीक्षण के आठ महीने बाद उसे इस बीमारी से पीड़ित होने की बात पता चली.”

वैज्ञानिकों का मानना है कि पार्किसंस की शुरुआत में त्वचा में कुछ बदलाव आता है जिसका संबंध एक खास किस्म की गंध से होता है.

उन्हें उन अणुओं का पता लगा लेने की उम्मीद है, जो खास गंध के लिए ज़िम्मेदार हैं और इस तरह वे माथे के पसीने से ही जांच की एक आसान विधि ईजाद कर लेंगे.

पार्किसन्स यूके संस्था अब मेनचैस्टर, एडिनबर्ग और लंदन में क़रीब 200 लोगों पर अध्ययन के लिए आर्थिक मदद दे रही है.

संस्था के स्कॉटलैंड डायरेक्टर कैथरीन क्रॉफ़ोर्ड के मुताबिक, “अगर एक आसान सी जांच प्रणाली विकसित कर ली जाती है तो यह बहुत बड़ा बदलाव होगा.”

उनके अनुसार, पार्किसंस का पता लगाना एक बहुत ही मुश्किल काम होता है.

वे कहते हैं, “हम आज भी इस बीमारी की उसी तरह जांच करते हैं जैसे वर्ष 1817 में डॉ जेम्स पार्किसंस किया करते थे और ये विधि है लोगों की निगरानी करना और लक्षणों को पहचानना.”

हो सकता है कि यह अचानक ही हाथ आने वाली खोज हो लेकिन जॉय को उम्मीद है कि यह उन लोगों के लिए बहुत अहम साबित होगी जिन्हें पार्किंसंस का ख़तरा है.

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