डाकिया ही नहीं, डॉक्टर भी है कबूतर

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कबूतरों पर हुए एक शोध से पता चला है कि यह पैथोलॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट के रूप में भी काम कर सकता है.

वह अपनी नज़र और संवेदन क्षमता से रोगों की पहचान कर सकता है.

शांति का प्रतीक और एक चिड़िया के रूप में कबूतर की पहचान हमेशा से रही है. कबूतरों को संदेश लाने और ले जाने वाले के रूप में भी देखा जाता है.

पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ़ साइंस पत्रिका में प्रकाशित शोध में बताया है कि प्रशिक्षित कबूतर रेडियोलॉजिस्ट की तरह स्तन कैंसर की पहचान कर सकते हैं. वे स्वस्थ ऊतकों और कैंसर प्रभावित ऊतकों के बीच अंतर कर सकते हैं.

इन कबूतरों को जब मैमोग्राफी (स्तन चित्रण) छवियां दिखाई गईं तो पाया गया कि जिन मैमोग्रामों में इन्हें अंतर करना था उसे इन्होंने बेहद कुशलता के साथ कर दिया. लेकिन जिनमें परीक्षणों में इन्हें संदेहास्पद गांठों की पहचान करनी थी, उसमें इन्हें कोई ख़ास सफलता नहीं मिली.

इसके बावजूद शोधकर्ताओं का मानना है कि कबूतरों की इस क्षमता की वजह से छवियों के आधार पर किए जाने वाले रोगों की पहचान और उसके इलाज में मदद मिल सकती है.

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कबूतरों पर हुए शोध से जुड़े विशेषज्ञों में से एक आयोवा यूनिवर्सिटी के प्रो.एडवर्ड वॉसरमैन ने कहा, "कबूतर इंसानों के चेहरे और उनके भावों को पहचान सकते हैं, वो अक्षरों में अंतर कर लेते हैं. यही नहीं कबूतर मोनेट और पिकासों के चित्रों तक के बारीक भेद को समझ जाते हैं".

उन्होंने कहा, "कबूतर का दिम़ाग इंसान की तर्जनी से भी छोटा होता है. वो 1800 से ज़्यादा छवियों को याद रख सकते हैं."

प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर रिचर्ड लेवेसन के अनुसार कबूतरों को दो हफ़्ते का प्रशिक्षण दिया गया.

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प्रशिक्षण के दौरान प्रत्येक कबूतर को कैंसर प्रभावित और स्वस्थ टिशू की माइक्रोग्राफिक छवियों में अंतर करना सिखाया गया. इसके साथ इन्हें ट्यूमर की पहचान करना भी सिखाया गया.

प्रयोग की ख़ास बात यह रही कि इन पक्षियों ने रंगहीन छवियों को बड़ा या छोटा करने के बावजूद उनमें फ़र्क़ करना सीखा. इस दौरान कबूतरों ने 85 फ़ीसदी सफलता हासिल की.

कबूतरों ने बैनाइन, संदेहास्पद या इन्टरमिडियेटरी और असाध्य स्तन कैंसर की मैमोग्राम स्लाइड्स के बीच फ़र्क़ को पहचान कर शोधकर्ताओं को हैरत में डाल दिया.

लेकिन कबूतर ऐसी गांठों की पहचान करने में असफल हुए जिनके हानिकारक होने की संभावना थी. ऐसे मामले विशेषज्ञों के लिए भी परेशानी का सबब बनते हैं.

प्रो. लेवेसन के मुताबिक़ इससे पता चलता है कि कबूतरों में भी इंसानों की नज़र से जुड़ी कमज़ोरियां और क्षमताएं होती हैं.

कई अन्य शोधकर्ता दावा करते हैं कि कुत्ते सूंघकर कई क़िस्म के कैंसर की पहचान कर लेते हैं या फिर अफ्रीकी चूहे सूंघकर तपेदिक का संकेत दे देते हैं. यह शोध फ़िलहाल ऐसा कोई दावा नहीं कर रहा है.

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हां इतना ज़रूर है कि यह शोधकर्ताओं और इंजीनियरों के लिए ऐसे उपकरणों को विकसित करने में मदद कर सकता है, जिनसे कैंसर की पहचान करने में आसानी हो.

हालांकि ऐसे उपकरणों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता तय करने के लिए प्रशिक्षित चिकित्सकों की मान्यता की आवश्यकता होगी.

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