अच्छी नींद चाहिए? तो चाय पिएं!

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अगर आपसे पूछें कि आपको चाय ज़्यादा पसंद है या कॉफ़ी, तो शायद आप दुविधा में पड़ जाएंगे. आजकल ब्रिटेन में इसी पर बहस छिड़ी है कि चाय बेहतर है या कॉफ़ी?

पिछली सदी में मशहूर ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने चाय को अपने देश की सभ्यता की बुनियाद क़रार दिया था. मगर, आजकल ब्रिटेन का नेशनल ड्रिंक कही जाने वाली चाय को कैपुचिनो, लाते, एसप्रेसो या अमेरिकानो कॉफ़ी से तगड़ी चुनौती मिल रही है.

चाय के बहुत से शौक़ीन हैं तो कॉफ़ी चाहने वालों की संख्या भी कम नहीं. ऐसे में, चाय ज़्यादा अच्छी या कॉफ़ी की बहस में पड़ना, एक बड़ा ख़तरा मोल लेने जैसा है. लेकिन, हमने सोचा कि ये रिस्क लें और दोनों को सेहत के पैमाने पर कसें. ताकि, हम आपके लिए इस सवाल का जवाब तलाश सकें.

बहस को किसी नतीजे तक पहुँचाने की कोशिश में हमारा ज़ोर स्वाद पर नहीं होगा. हम विज्ञान के आधार पर शोध की मदद से चाय और काफ़ी के शरीर और दिमाग़ पर होने वाले असर की पड़ताल करेंगे.

नींद से जगाना- ज़्यादातर लोग चाय-कॉफी इसलिए पीते हैं ताकि सुबह के वक़्त, रात की नींद की ख़ुमारी उतार सकें, आगे आने वाले दिन की चुनौतियों के लिए एलर्ट हो सकें.

दिन के वक़्त भी जब हमें ताज़गी की ज़रूरत होती है तो हम अपनी अपनी पसंद के मुताबिक़ चाय या कॉफ़ी का मग उठाते हैं. चाय और कॉफ़ी दोनों में मौजूद कैफ़ीन, इस काम में लोगों की मदद करती है.

अगर कैफ़ीन को पैमाना मानें तो इस मामले में कॉफ़ी, चाय पर 20 नहीं 21 बैठती है.

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जहां एक कप चाय में 40 मिलीग्राम कैफ़ीन होती है. वहीं, इतनी ही कॉफ़ी में कैफ़ीन 80 से 115 मिलीग्राम तक होती है. लेकिन, यहां भी एक पेंच है. कॉफ़ी की कैफ़ीन की बराबरी करने के लिए अगर कोई उतनी मात्रा में चाय पिए तो ज़्यादा अलर्ट महसूस करेगा.

एक छोटे से सर्वे से यह बात सामने आई है. लेकिन ये पूरी कहानी नहीं है. वैज्ञानिकों का मानना है कि व्यक्तिगत तौर पर हम चाय या कॉफ़ी पीने से क्या उम्मीद करते हैं, शरीर पर उसका असर इस बात पर भी निर्भर करता है.

फ़ैसला- शायद तार्किक न लगे, लेकिन नींद की ख़ुमारी उतारने के पैमाने पर कसें तो चाय उतनी ही असरदार है जितनी कॉफ़ी.

नींद पर असर- चाय और कॉफ़ी में फ़र्क खोजना हो तो वो है इनका हमारे सोने से नाता. हम दिन में जितनी चाय या कॉफ़ी पीते हैं, उसका सीधा ताल्लुक़ हमारी रात की नींद से होता है.

ब्रिटेन की सरे यूनिवर्सिटी ने इस बारे में रिसर्च की तो इसके दिलचस्प नतीजे मिले. कॉफ़ी पीने वालों को रात में सोने में कुछ मुश्किल होती है.

इस शोध के मुताबिक़, यदि एक ही दिन में समान मात्रा में चाय और कॉफ़ी पिएं तो चाय पीने वालों को कॉफ़ी पीने वालों के मुक़ाबले ज़्यादा आसानी से और आराम देने वाली नींद आती है. इसकी वजह शायद, कॉफ़ी में कैफ़ीन की ज़्यादा मात्रा हो.

फ़ैसला- अच्छी नींद चाहिए, तो चाय कॉफ़ी से बेहतर है.

दांतों पर असर - चाय हो या कॉफ़ी, दोनों ही हमारे दांतों का रंग बिगाड़ने का काम करते हैं. दोनों में मौजूद प्राकृतिक पिगमेंट हमारे झक सफ़ेद दांतों को थोड़ा पीला कर देते हैं.

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लेकिन, सवाल ये है कि दोनों में से कौन हमारे दांतों को ज़्यादा ज़र्द करता है. वैज्ञानिक मानते हैं कि चाय हमारे दांतों को ज़्यादा ख़राब करती है. इसमें पाया जाने वाला पिगमेंट दांतों के एनेमल से जाकर चिपक जाता है. और अगर चाय पीने के बाद आपने माउथवॉश इस्तेमाल लिया, तो बात और भी बिगड़ जाती है.

फ़ैसला- दांतों का रंग ख़राब करने के हिसाब से कॉफ़ी के मुक़ाबले चाय, ज़्यादा कसूरवार साबित हुई है.

मुश्किल वक़्त की साथी - इंग्लैंड में चाय की शोहरत एक और वजह से भी है. परेशानी के पलों में अक्सर लोग अपने साथियों को, जानने वालों को, सुकून देने वाली सलाह के साथ चाय का कप ऑफ़र करते हैं.

इस चलन को इंग्लैंड में, 'टी विद सिम्पैथी' कहा जाता है. कुछ रिसर्च से संकेत मिलते हैं एक कप चाय कई बार परेशान व्यक्ति के लिए दवा का काम भी करती है. यह बेचैनी महसूस कर रहे लोगों को राहत देती है, उनके दिमाग को शांत करती है.

एक और रिसर्च से पता चला है कि उलझन या बेचैनी के शिकार लोगों में से जो हर्बल ड्रिंक्स पीते हैं, उनके मुक़ाबले चाय पीने वाले ज़्यादा राहत महसूस करते हैं.

दिन में औसतन तीन कप चाय पीने वाले लोगों के डिप्रेशन में जाने की आशंका 37 फ़ीसदी तक कम है, उन लोगों के मुक़ाबले में जो चाय नहीं पीते हैं.

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बात करें कॉफ़ी की तो वो बेचैनी, उलझन या परेशानी से राहत देती हो, ऐसा नहीं माना जाता. बल्कि उलझन के वक़्त कॉफ़ी पीने वाले कई लोगों ने शिकायत की कि उनका दिमाग़ तो और झनझना उठा.

लेकिन, कुछ रिसर्च में यह भी देखा गया है कि कॉफ़ी, लंबी अवधि में लोगों की दिमाग़ी सेहत ठीक रखने में मददगार होती है. अभी हाल ही में क़रीब 300,000 लोगों पर एक रिसर्च की गई.

जब इस रिसर्च के नतीजे जमा किए गए, तो बड़ी दिलचस्प बातें सामने आईं. इसके मुताबिक़, रोज़ एक कप कॉफ़ी पीने से डिप्रेशन की आशंका आठ फ़ीसदी तक कम हो सकती है. इनके मुक़ाबले अगर आप दूसरे सॉफ़्ट ड्रिंक्स पीते हैं तो उनका उल्टा असर होने की बात भी सामने आई है.

वैसे, ऐसे तज़ुर्बों को, ऐसी रिसर्च को बहुत ज़्यादा गंभीरता से लेना भी रिस्की है. वैज्ञानिकों की तमाम कोशिशों के बावजूद, यह रिसर्च कितने भी अहतियात के साथ की गई हो, तथ्य यह है कि डिप्रेशन से तमाम तरह के फैक्टर जुड़े हैं. कई चीज़ों का असर होता है.

ऐसे में सिर्फ़ चाय-कॉफ़ी के असर से राहत मिलती हो या ख़तरा टल जाता हो, ऐसा दावा करना सही नहीं होगा.

फ़ैसला- एक बात ज़रूरत साफ़ हो जाती है कि चाय हो या कॉफ़ी, दोनों हमें दिमाग़ी राहत देते हैं. इस मोर्चे पर चाय-कॉफ़ी का मुक़ाबला बराबरी पर छूटता है.

सेहतमंद रहना हो तो- तमाम रिसर्च, इस बात की ओर इशारा करते हैं चाय और कॉफ़ी दोनों ही हमारी सेहत के लिए फ़ायदेमंद हैं. इनमें कई ऐसे गुण हैं, केमिकल हैं, जो हमें फ़ायदा पहुँचाते हैं.

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हम चाय पिएं या कॉफ़ी, रोज़ाना इन्हें दो-तीन कप पीने से कुछ बीमारियां होने का रिस्क कम होता है - मसलन डायबिटीज़.

पक्के तौर पर तो ये नहीं कह सकते. ऐसे संकेत मिले हैं कि रोज़ाना चाय या कॉफ़ी पीने से डायबिटीज़ का रिस्क पांच से 40 फ़ीसदी तक कम होता है. यहां तक कि डिकैफ़िनेटेड कॉफ़ी से भी कुछ फ़ायदा होता है.

दिल की बीमारियों से बचाने में चाय-कॉफ़ी का कुछ हद तक रोल माना जा रहा है. लेकिन, इस मामले में कॉफ़ी बीस ठहरती है. वहीं कुछ रिसर्च से यह भी पता चला है कि चाय में पाए जाने वाले एंटी-ऑक्सीडेंट्स कुछ कैंसर से कुछ हद तक बचाव करते हैं.

फ़ैसला- सेहत के मोर्चे पर भी चाय और कॉफ़ी की जंग बराबरी पर छूटती दिख रही है.

कुल मिलाकर कहें तो आप अपनी पसंद के मुताबिक़, चाय या कॉफी पीते रह सकते हैं. किसी रिसर्च की बुनियाद पर अपना स्वाद बदलने की हम आपको नसीहत नहीं देंगे.

हां, ब्रिटेन में रहने वाले यह ज़रूर चाहते होंगे कि चाय बनाम कॉफ़ी की जंग में उनकी प्यारी चाय जीते, मगर सेहत से जुड़े तमाम मोर्चों पर यह मुक़ाबला ड्रॉ ही रहा है.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.

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