15 सालों की एक-एक बात याद है इन्हें

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याददाश्त हमारे लिए बहुत ज़रूरी है. कई मौक़ों पर जब हमें कुछ याद नहीं आता तो बड़ी झल्लाहट होती है. अक्सर हम लोगों को देख कर रश्क करते हैं कि 'काश, ऐसी याददाश्त हमारी भी होती.'

लेकिन यदि आप कभी कुछ भूलें ही नहीं, सब कुछ याद रहे, तो क्या होगा? आप कहेंगे कि ऐसा मुमकिन ही नहीं कि आपने जो भी देखा-सुना या समझा, वो सब आपको याद रहे.

दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जिन्हें कुछ भूलता ही नहीं, सब याद रहता है. अब आप सोचेंगे कि क्या उन्हें वरदान मिला है, तो ऐसा ही है. लेकिन ऐसे लोगों में से कई लोग बातें न भूल पाने को अभिशाप मानते हैं.

ऐसे ही एक शख़्स हैं, नीमा विसेह. इन्हें पिछले पंद्रह सालों में अपनी ज़िंदगी में घटी हर घटना याद है.

वैज्ञानिक इन्हें हाइली सुपीरियर ऑटो-बायोग्राफिकल मेमोरी या संक्षेप में एचएसएएम मेमोरी वाले इंसान कहते हैं.

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ख़ुद विसेह कहते हैं कि उनके दिमाग़ में जैसे वीडियो टेप रखे हुए हैं. जब चाहा, उन्हें चला दिया और हर पुरानी घटना की फ़िल्म आंखों के सामने चलने लगी. यहां तक कि किसी ख़ास तारीख़ को उन्होंने क्या कपड़े पहने थे, किस चीज़ से सफर किया था, मेट्रो में किस सीट पर बैठे थे, ये सब उन्हें याद है.

विसेह के साथ, ऐसा हमेशा से नहीं था. मगर 15 दिसंबर साल 2000 को जब वो अपने दोस्त की बर्थडे पार्टी में अपनी पहली गर्लफ्रैंड से मिले, तब से ऐसा हो गया कि उन्हें हर चीज़, हर बात याद रहने लगी.

अब ऐसे चमत्कार के पीछे, पहली गर्लफ्रेंड का हाथ था, या कोई और वजह, ये उन्हें नहीं मालूम. मगर हुआ कुछ यूं कि जैसे दिमाग ने कोई गियर लगाया और याददाश्त की रफ़्तार बदल गई.

ऐसी स्पेशल मेमोरी रखने वालों में न्यूरो साइंटिस्ट्स की बड़ी दिलचस्पी रही है. वो जानना समझना चाहते हैं कि ऐसी असाधारण क्षमता कहां से आ जाती है. अगर इसके तमाम पहलू समझ में आ जाएं, तो और लोगों की याददाश्त बढ़ाने पर भी काम हो सकता है.

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वैसे, एचएसएएम, यानी याद रखने की इस असाधारण क्षमता के बारे में चर्चा ज़्यादा पुरानी नहीं. इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में, ऐसी काबिलियत रखने वाले कुछ लोग ख़ुद ही सामने आए और वैज्ञानिकों को इस बारे में जानकारी दी.

ऐसी ही एक महिला हैं जिल प्राइस, जिन्होंने याददाश्त पर रिसर्च करने वाले जिम मैक्गॉ को मेल करके दावा किया कि उन्हें 12 बरस की उम्र से अपनी ज़िंदगी की हर बात याद है.

मैक्गॉ को पहले तो इस दावे पर यक़ीन ही नहीं हुआ. तो उन्होंने जिल प्राइस को अपनी लैब में बुलाया. जिम ने जिल को कई बार अलग अलग तारीख़ देकर उस दिन घटी घटना के बारे में पूछा. और, उन्हें बड़ी हैरत हुई जब जिल ने हर बार सही जवाब दिया.

दिलचस्प बात ये रही कि ख़ुद जिल प्राइस ने पुरानी बातों को डायरी मे नोट कर रखा था, जिससे वैज्ञानिकों को उनके जवाब मिलाने में सहूलियत हुई. जिल प्राइस पर कई बरस तक रिसर्च करने के बाद वैज्ञानिकों ने उनसे एक बार ये पूछा कि वो कब और कितनी बार उनकी लैब में आईं.

जिल ने इसका भी सटीक जवाब देकर वैज्ञानिकों को चौंका दिया. ख़ुद रिसर्च करने वालों को सही सही तारीख़ें याद नहीं थीं.

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ऐसी असाधारण, अनोखी याददाश्त वालों के बारे में जल्द ही चर्चा रिसर्च लैब से बाहर होने लगी. मीडिया ने ज़ोर-शोर से मामला उठाया. फ़िल्में बनाने वाले इसको भुनाने में जुट गए. आख़िर बरसों पुरानी हर एक बात याद रखना सबके बस की बात जो नहीं.

तो ऐसे चमत्कार के क़िस्सों का बाज़ार खड़ा करने की कोशिश भी हुई. चर्चा बढ़ी तो ऐसी याददाश्त रखने वाले और लोग भी सामने आए.

इनमे से विसेह जैसे कई लोगों ने अमेरिका की कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों से संपर्क किया, जो एचएसएएम पर रिसर्च कर रहे थे. कई बार तो इन लोगों ने वैज्ञानिकों के पूछे सवाल तक को सही करके उसका जवाब दिया.

इस बारे में और रिसर्च हुई तो पता चला कि एक्स्ट्रा शार्प मेमोरी वाले ये लोग भी हम लोगों जैसे ही, हाल-फ़िलहाल में घटी बातें कई बार भूल जाते हैं. अमरीका की सदर्न मिसीसिपी यूनिवर्सिटी में साल 2013 में ऐसी ही एक रिसर्च हुई.

पता चला कि ग़ज़ब की याददाश्त रखने वाले इन लोगों में से कुछ, पांच मिनट पहले हुई बातें भूल गए, जबकि बरसों पहले की घटना उन्हें याद रही. कई बार उन्होंने ऐसी बातें याद रखने का दावा किया जो असल में हुई ही नहीं थीं, यानी ऐसी ग़ैरमामूली याददाश्त रखने वाले लोगों के दिमाग़ भी वही ग़लतियां करते हैं जो एक आम इंसान करता है.

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सवाल ये उठता है कि फिर उनमें याद रखने की ये ग़ज़ब की काबिलियत आई कैसे? कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक क्रेग स्टार्क ने ऐसे कुछ लोगों से जब अलग अलग वक़्त पर बात की तो कुछ नतीजे सामने आए.

जब वैज्ञानिकों ने ऐसी गैर मामूली याददाश्त वालों के दिमाग़ पर रिसर्च की तो दूसरे लोगों में और उनके दिमाग़ में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं दिखा. हां, उनके दिमाग़ में कुछ ऐसे बदलाव ज़रूर देखे गए, जो आम नहीं थे. मगर वो ऐसे नहीं थे कि उनका इस याद रखने की असाधारण क्षमता से कोई ताल्लुक था.

यानी बरसों की रिसर्च और नतीजा सिफर. तो ऐसी ग़ज़ब की याददाश्त की वजह आख़िर क्या है? जवाब तलाशने की कोशिश में वैज्ञानिकों ने और रिसर्च की. पता चला कि ऐसी मेमोरी वाले लोग अक्सर ख़्वाबों में डूबे रहते हैं. शायद ये एक वजह थी उनकी शार्प मेमोरी की.

वो औरों के मुक़ाबले कल्पनाओं में ज़्यादा खोए रहते हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक़, इसका फ़ायदा ये होता है कि वो ऐसी बातों को याद रखने की कोशिश करते हैं, और इससे उनकी याददाश्त भी तेज़ होती है.

वैसे हम सब, अपनी ज़िंदगी की बड़ी घटनाओं को याद रखते हैं. जैसे शादी का दिन, या फिर, यूनिवर्सिटी से पास आउट करने का दिन. उस ख़ास दिन की हर बात हमें याद रहती है.

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हममें और एचएसएम यानी शार्प मेमोरी वाले लोगों में फ़र्क़ यही है कि उनका दिमाग हर दिन की बात बार-बार याद करता है, जबकि हमारा दिमाग़ हर बात को सहेज कर रखना ज़रूरी नहीं समझता.

वैज्ञानिकों को लगता है कि इस ग़ज़ब की याददाश्त की काबिलियत के पीछे और भी कोई वजह है, जो अभी समझ से परे है. शायद ऐसे लोगों की ज़िंदगी में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं, जो दिमाग की याद रखने की गाड़ी का गियर बदल देती हैं.

जैसे, हमने नीमा विसेह की बात की, शुरू में. वो जब अपने दोस्त की बर्थडे पार्टी में अपनी पहली गर्ल फ्रैंड से मिले, तब से उन्हें हर बात याद रहने लगी.

अब सवाल ये है कि क्या ऐसे लोगों की तरह हर इंसान अपनी याददाश्त बेहतर कर सकता है. वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर हम किसी घटना के फौरन बाद दिल ही दिल में उसे दोहराएं, तो हमारी याद रखने की क्षमता बढ़ जाती है. हम ज़्यादा बातें याद रख पाते हैं.

वैसे ऐसी ग़ैरमामूली याददाश्त रखने के फ़ायदे भी हैं और नुक़सान भी. फ़ायदा ये कि आप जो पढ़ लिख रहे हैं, जो देख रहे हैं, वो याद रहा तो ज़िंदगी में तेज़ी से तरक़्क़ी कर सकते हैं. जैसे नीम विसेह को ही ले लें. उनकी पेंटिंग में शुरू से दिलचस्पी रही थी.

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उन्होंने कई देशों की सैर की. जहां भी गए आर्ट गैलरी में ज़रूर गए. और ऐसे करके उन्होंने पेंटिंग करने की ख़ुद की कला को काफ़ी विकसित कर लिया. आज वो ख़ुद मंझे हुए आर्टिस्ट हैं. ऐसे ही उन्हें अपनी डिज़ाइन और टेक्नॉलॉजी की रिसर्च में भी अपनी याददाश्त का फ़ायदा मिला.

ऐसी ही क्षमता रखने वाली इतिहास की टीचर हैं डोनोह्यू, जिनका कहना है कि अपनी ग़ज़ब की याददाश्त से उन्हें पढ़ाई में काफ़ी मदद मिली. और करियर बनाने में भी.

मगर, शार्प मेमोरी वाला हर इंसान पढ़ाई में कामयाब हो, ज़रूरी नहीं. वैज्ञानिकों से ख़ुद संपर्क साधने वाली जिल प्राइस को पढ़ना लिखना पसंद नहीं था. सो, आज उन्हें बाक़ी सभी बातें तो याद हैं, मगर स्कूल में क्या पढ़ा यही याद नहीं रहता. यानी याद रखने की क्षमता का सीधा ताल्लुक आपकी पसंद नापसंद से है.

बढ़िया याददाश्त होने के नुक़सान भी हैं. कई बुरी बातें या घटनाएं जो हम भूल जाना चाहेंगे, वो ऐसे लोगों को हमेशा याद रहती हैं. चाहकर भी ये उन्हें भूल नहीं पाते और बार बार तक़लीफ़ उठाते हैं. ऐसे में फॉरगिव एंड फॉरगेट का फॉर्मूला इन लोगों पर लागू नहीं होता. इन्हें पुरानी यादों के ज़ख़्म हमेशा तकलीफ़ देते रहते हैं.

अब, ये बातें जानकर आपको तय करना है कि ऐसी याददाश्त होना वरदान है या फिर अभिशाप.

(मूल लेख आप यहाँ पढ़ सकते हैं जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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