दिमाग में रहकर भी ज़ुबान पर नहीं आता !

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क्या आपके साथ ऐसा कभी हुआ है कि आप किसी शब्द को याद कर रहे हों, और वो दिमाग में होकर भी आपकी ज़ुबान पर नहीं आ रहा. पक्का आपके साथ ऐसा हुआ होगा.

सबके साथ होता है. बार-बार ये लगता है कि वो शब्द आपकी ज़ुबां पर है, पर बाहर नहीं आ रहा. वैसे मिलते-जुलते तमाम शब्द ज़ेहन में आते हैं, मगर, दिमाग़ पर लाख ज़ोर डाल लीजिए, वो सटीक शब्द उस वक़्त तो नहीं ही याद आता. बस आप झुंझलाकर रह जाते हैं.

इसको हल्के में लेने की ग़लती न कीजिए. ये एक बीमारी होती है. वैज्ञानिकों ने इस बीमारी का नाम लेथोलॉजिका रखा है.

अंग्रेज़ी का ये शब्द, ज़्यादा पुराना नहीं. ये ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है.

पहला शब्द है लेथे, यानी भूलने की आदत. और दूसरा ग्रीक शब्द है लोगोस जिसका मतलब है पढ़ाई. पुरानी यूनानी कहानियों में लेथे एक नदी का भी नाम था. ये उन पांच नदियों में से एक थी, जिसका पानी, मर कर इस दुनिया से जाने वाले पीते थे, ताकि दुनियावी यादों को भुला सकें.

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ज़ुबां पर आए शब्द न याद कर पाने वाली इस बीमारी को ये नाम, बीसवीं सदी के मशहूर मनोवैज्ञानिक, कार्ल गुस्ताव जंग ने दिया था. हालांकि जंग से भी पहले लेथोलॉजिका शब्द का ज़िक्र अमेरिका की इलस्ट्रेटेड मेडिकल डिक्शनरी में साल 1915 में हुआ था.

बहरहाल, ये शब्द किसने सोचा, पहले पहल इस बीमारी को ये नाम किसने दिया, ये ज़्यादा अहम नहीं. ये पक्का है कि पता होकर भी ज़ुबां पर शब्द न आने की इस बीमारी पर सबसे पहले कार्ल जंग ने ही काम किया था.

वैसे मेडिकल साइंस की तरक़्क़ी के चलते, इस बीमारी के बारे में हमारी समझ भी बेहतर हुई है. ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक टॉम स्टैफोर्ड कहते हैं कि हमारा दिमाग किसी कंप्यूटर की तरह काम नहीं करता कि आपने किसी चीज़ को सर्च किया और झट से जवाब हाज़िर.

असल में किसी शब्द या जानकारी को हम जितनी शिद्दत से समझते हैं, महसूस करते हैं. हमारा दिमाग उसी हिसाब से उस शब्द या जानकारी को अपने अंदर अलग अलग खांचों में रखता है.

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किसी भी इंसान के लिए पढ़ा हुआ हर शब्द सही समय पर याद करना क़रीब-क़रीब नामुमकिन है. अंग्रेज़ी भाषा को ही लें. ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में आज की तारीख़ में छह लाख शब्द हैं. मगर, अंग्रेज़ी के बहुत से ऐसे शब्द हैं, जो इसमें नहीं.

जानकार कहते हैं कि आम तौर पर हर इंसान बोलने और लिखने में औसतन पचास हज़ार शब्द इस्तेमाल करता है. इसे वैज्ञानिकों की भाषा में किसी इंसान का एक्टिव शब्दकोश है. इसके सिवा भी हर शख़्स को बहुत से और शब्द पता होते हैं.

मगर, हम इन शब्दों को कम ही इस्तेमाल में लाते हैं. और इस तरह अपने दिमाग को संदेश देते हैं कि इन शब्दों की अहमियत हमारे लिए कम है. नतीजा ये कि दिमाग इन शब्दों को छांटकर किसी ऐसी जगह रख देता है, कि, कई बार पता होने पर भी ये याद नहीं आते.

ऐसा लगता है कि बस अभी आपकी ज़ुबां पर ये शब्द आया, मगर याद नहीं आता. ये कुछ वैसा ही होता है, जैसे हम कोई चीज़ बक्से में बंद करके भूल जाएं.

और जिस चीज़ को हम नियमित रूप से इस्तेमाल नहीं करते, उसको भूल जाते हैं. यही हाल शब्दों के साथ होता है. जिन्हें हम बहुत कम इस्तेमाल करते हैं, उन्हें दिमाग अपने किसी पुराने बक्से में बंद करके भूल जाता है.

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और ऐसे ही शब्द होते हैं जो दिमाग पर बहुत ज़ोर डालने पर याद नहीं आते. जैसे पुराना सामान, जिसके बारे में आपको पता है कि कहीं रख दिया था, मगर कहां, ये बहुत ज़ोर देने पर भी याद नहीं आता.

ऐसे हज़ारों शब्द होते हैं, जो हमारे दिमाग के किसी बक्से में बंद पड़े रहते हैं. और बहुत बार मौक़े पर याद नहीं आते.

लेथोलॉजिका ऐसी बीमारी है, जिसमें हम शब्द भी भूल जाते हैं, और उसका पता ठिकाना भी. मतलब उससे हमारा रिश्ता टूट सा जाता है. मगर वो हमारे दिमाग के स्टोरेज की जगह, भी घेरे रहते हैं.

शायद हमें ज़रूरत है ग्रीक पुराणों वाली नदी, लेथे का पानी पीने की, ताकि हम ग़ैरज़रूरी बातें भूल सकें, अपने दिमाग में स्टोरेज की जगह बना सकें.

इसका फ़ायदा ये होगा कि ग़ैरज़रूरी जानकारी दिमाग से साफ होगी और हम अपने ज़रूरत वाली बातें ही याददाश्त के बक्से में रखेंगे, ताकि जब ज़रूरत पड़े फ़ौरन उसे निकाल सकें.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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