'विज्ञान किसी एक की बपौती नहीं'

दुनियाभर में क़रीब बीस से तीस लाख लोग रीढ़ की हड्डी की चोट के शिकार हैं. रीढ़ की हड्डी वो ज़रिया है जिसकी मदद से हमारा दिमाग़ शरीर के दूसरे हिस्सों को कंट्रोल करता है.

जब किसी इंसान की रीढ़ की हड्डी में चोट लगती है, तो वहां से नीचे का शरीर का हिस्सा लकवे का शिकार हो जाता है. उतने हिस्से में कुछ भी महसूस नहीं होता. वो लाचार हो जाता है. व्हीलचेयर पर ज़िंदगी बिताने को मजबूर होता है. मगर, ऐसे लोगों के लिए उम्मीद की नई रोशनी दिखी है.

मेडिकल साइंस के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि रीढ़ की हड्डी की चोट के शिकार एक शख़्स को इलाज के बाद व्हील चेयर छोड़कर ख़ुद से चलने की ताक़त दोबारा हासिल हुई है.

ये करिश्मा कर दिखाया हैं लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के तंत्रिका विज्ञान के प्रमुख डॉक्टर ज्योफ्री रेज़मैन ने. डॉक्टर रेज़मैन पिछले कई सालों से इसके लिए कोशिश कर रहे थे.

आख़िरकार उनकी मेहनत रंग लाती दिखाई दे रही है. पहली बार किसी इंसान की चोटिल रीढ़ की हड्डी का कनेक्शन उसके दिमाग से दोबारा जोड़ा जा सका है.

डॉक्टर रेज़मैन इसके लिए क़रीब पचास सालों से काम कर रहे थे. वो बताते हैं कि उन्हें पहले पहल ये ख़्याल आया था साल 1965 में.

तब तक माना ये जाता था कि इंसान का दिमाग़ एक टेलीफोन एक्सचेंज जैसा होता है. शरीर के किसी हिस्से को जोड़ने वाली तार कटी नहीं कि उसका दिमाग से कनेक्शन कट जाता है.

लेकिन डॉक्टर रेज़मैन का कहना है कि ये धारणा ग़लत है. इंसान का दिमाग एक ज़िंदा अंग है, जिसमें लगातार नई कोशिकाएं बनती रहती हैं. टेलीफोन एक्सचेंज की भाषा में कहें तो नए कनेक्शन के लिए तार बिछाए जाते रहते हैं. और फिर पुराने, ख़राब हो चुकी लाइनों की मरम्मत भी तो होती है.

डॉक्टक रेज़मैन के ज़ेहन में ख़याल आया कि अगर दिमाग को रीढ़ की हड्डी से जोड़ने वाली तार अगर टूट जाए तो उसकी मरम्मत क्यों नहीं हो सकती.

आख़िर दिमाग भी तो अपनी पुरानी लाइनों की मरम्मत करता रहता है. तो इसकी इस ख़ूबी का फ़ायदा उठाकर, चोटिल रीढ़ की हड्डी का दिमाग से फिर से कनेक्शन भी जोड़ा जा सकता है. पचास बरस पहले ये ख़याल एकदम नया था. मेडिकल साइंस ने भी इतनी तरक़्क़ी नहीं की थी कि इस तरफ़ काम किया जा सके.

लेकिन, डॉक्टर ज्योफ़्री रेज़मैन ने उम्मीद नहीं छोड़ी. वो अपने इरादों को परवान चढ़ाने की कोशिश में जुटे रहे.

1985 में जब डॉक्टर रेज़मैन, दिमाग के उस हिस्से की पड़ताल कर रहे थे, जहां से हमें सूंघने की ताक़त मिलती है, तो, उन्होंने देखा कि दिमाग का ये हिस्सा लगातार अपनी मरम्मत कर रहा था. यहां लगातार नई कोशिकाएं या सेल्स बन रही थीं. टेलीफोन की भाषा में कहें तो दिमाग के इस हिस्से में लगातार नई वायरिंग हो रही थी.

ये देखकर डॉक्टर रेज़मैन का हौसला सातवें आसमान पर पहुंच गया. उन्हें चोटिल रीढ़ की हड्डी से दिमाग का कनेक्शन दोबारा जोड़ने की उम्मीद की नई किरण दिखी.

उन्होंने सोचा कि दिमाग की इन सेल्स को अगर रीढ़ की हड्डी के उस हिस्से में लाकर लगाया जाए, जहां से दिमाग का कनेक्शन टूटा है, तो, शायद दिमाग से शरीर के बाक़ी हिस्सों का कनेक्शन फिर जुड़ सके. आख़िर दिमाग में भी ये सेल्स यही काम तो कर रही थीं. कनेक्शन जोड़ने का.

इस नुस्खे को डॉक्टर रेज़मैन ने एक चूहे की चोटिल रीढ़ की हड्डी पर आज़माया. उसके दिमाग़ के सूंघने वाले हिस्से की सेल्स निकालकर, चूहे की चोटिल रीढ़ की हड्डी में लगाया, उस जगह, जहां रीढ़ की हड्डी टूटी थी.

इस प्रयोग के चौंकाने वाले नतीजे आए. चूहे के अगले पांव का उसके दिमाग से टूटा हुआ कनेक्शन फिर से जुड़ गया था. चूहा अपने बेकार हुए पैर के इस्तेमाल से फिर से चल रहा था.

ये प्रयोग कामयाब रहा तो डॉक्टर रेज़मैन को यक़ीन हो गया कि उनकी बरसों की मेहनत रंग लाने वाली है, जब इंसान की चोटिल रीढ़ की हड्डी का दिमाग से दोबारा कनेक्शन वो जोड़ सकेंगे.

डॉक्टर रेज़मैन की तरह ही इस दिशा में काम कर रहे थे, पोलैंड की वारक्लाव यूनिवर्सिटी के न्यूरोसर्जन, डॉक्टर पॉवेल तबाको. डॉक्टर पॉवेल, डॉक्टर रेज़मैन के साथ चूहे के सेल ट्रांसप्लांट के प्रयोग में भी शामिल थे.

चूहे पर किए प्रयोग से मिले सबक़ की मदद से दोनों ने ये प्रयोग इंसान पर आज़माने का फ़ैसला किया.

इसके लिए डॉक्टर पॉवेल ने अपने ही एक मरीज़, पोलैंड के रहने वाले डेरेक फिदिका को चुना. चाकू के एक घाव के चलते डेरेक की रीढ़ की हड्डी चोटिल हो गई थी. और वो चलने फिरने से लाचार थे.

डॉक्टर रेज़मैन बताते हैं कि घाव की वजह से डेरेक की रीढ़ की हड्डी में क़रीब सात मिलीमीटर का गैप आ गया था. उसके दिमाग से क़रीब पांच लाख सेल्स निकालकर रीढ़ की हड्डी की ख़ाली हुई जगह में भरी जा सकती थीं. लेकिन, ये संख्या बहुत कम थी.

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इस चुनौती से निपटने के लिए डॉक्टर पॉवेल ने एकदम नया तरीक़ा चुना. ख़ाली जगह को उन्होंने मरीज़ की कोहनी से निकाली हुई सेल्स से भर दिया. और बाक़ी हिस्से में दिमाग से निकाली गई कोशिकाएं डाल दीं.

डेरेक के ऊपर डॉक्टर पॉवेल और डॉक्टर रेज़मैन का ये प्रयोग कामयाब रहा. वो आज दिमाग के सेल ट्रांसप्लांट की मदद से आज वो व्हीलचेयर छोड़कर धीरे-धीरे चलने लगे हैं.

डॉक्टर रेज़मैन कहते हैं कि अब अगली चुनौती इस तकनीक में सुधार लाना है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसका फ़ायदा उठा सकें. अभी तो ये छोटा सा प्रयोग है. अगर दिमाग के सेल ट्रांसप्लांट की इस तकनीक को हम बेहतर बना सकें तो रीढ़ की हड्डी की बड़ी चोटों से परेशान लोगों को फिर से उनके पैरों पर खड़ा किया जा सकेगा.

डॉक्टर रेज़मैन कहते हैं कि मेडिकल साइंस के लिए ये एक ऐतिहासिक मौक़ा है. लेकिन वो इसे अपनी निजी कामयाबी नहीं मानते. उनके हिसाब से ये मानवता के हित में होगा कि लोग उनके प्रयोग से फ़ायदा उठा सकें.

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डॉक्टर रेज़मैन कहते हैं कि ये विज्ञान किसी एक की बपौती नहीं. ये पूरी मानवता के हित में इस्तेमाल होना चाहिए. इसीलिए वो चाहते हैं कि उनकी आधी सदी की मेहनत के इस फल को पाने के लिए, किसी को एक पैसा भी न ख़र्च करना पड़े. वो कहते हैं कि जो उन्होंने हासिल किया है, उसे पैसे से नहीं तोला जा सकता है.

इंसानियत की मदद का, क़ुदरत के चमत्कारों का जो अनुभव वो इस प्रयोग की कामयाबी से महसूस करते हैं, उसकी कोई क़ीमत नहीं हो सकती.

जब डॉक्टर रेज़मैन, पोलैंड के डेरेक को अपने पांव पर चलता देखते हैं तो उन्हें याद आता है आधी सदी पहले देखा गया वो ख़्वाब, जब उन्होंने सोचा था कि इंसान का दिमाग, शरीर के दूसरे हिस्सों से फिर से कनेक्शन जोड़ सकता है.

आज डेरेक के धीरे-धीरे उठते क़दम, डॉक्टर रेज़मैन को उस ख़्वाब की पूरे होने का एहसास कराते हैं.

अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.

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