तोप से लैस स्पेसक्राफ्ट है डराने वाला !

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अंतरिक्ष में इंसान की दिलचस्पी तब से है, जबसे वो धरती पर आया. चांद पर जाने, तारों को छूने के ख़्वाब देखते-देखते आज इंसान, मंगल पर जाने की तैयारियां कर रहा है.

क़रीब साठ साल पहले भेजे गए सोवियत संघ के पहले कामयाब स्पेस मिशन से शुरू करके आज दुनिया, अंतरिक्ष स्टेशन तक पहुंच गई है. लोग चांद पर इंसानी बस्तियां बसाने के ख़्वाब देख रहे हैं. कुछ सनकी क़िस्म के लोग तो अंतरिक्ष में तैरते होटल की कल्पना भी कर चुके हैं.

कुछ कामयाबियां नाज़ करने लायक़ हैं. मगर, ऐसे तमाम ख़्वाबों और तकनीकी तरक़्क़ी के बावजूद, अंतरिक्ष में इंसानी छलांग का भविष्य धुंधला ही है.

पिछली सदी के साठ और सत्तर के दशक में इंसान ने अंतरिक्ष में जो छलांग लगाई थी, आज बात उससे बहुत आगे नहीं बढ़ सकी है. पिछले चालीस सालों में अंतरिक्ष को लेकर जो ख़्वाब देखे गए, उनमें से ज़्यादातर की ताबीर नहीं हो पाई है.

हां, अमरीका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध या 'कोल्ड वार' के उस दौर में कई ऐसे मिशन की योजना ज़रूर बनी, जो बड़े महत्वाकांक्षी थे, मगर किसी न किसी वजह से परवान नहीं चढ़ सके.

आज आपको ऐसे ही कुछ मिशन के बारे में बताते हैं.

एटमी रॉकेट : अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अलाबामा स्थित मार्शल स्पेस सेंटर के बाहर अजब तरह का रॉकेट इंजन रखा हुआ है. स्पेस शटल के मॉडल से जुड़ा किसी चिमनी जैसा दिखने वाला ये इंजन, बहुत ख़ास है. ये किसी स्पेस मिशन के लिए बना अब तक का इकलौता इंजन है, जिसमें एटमी ईंधन इस्तेमाल होने वाला था.

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नासा ने इसे नर्वा नाम दिया था. नर्वा यानी न्यूक्लियर इंजन फॉर रॉकेट व्हीकल एप्लीकेशन. इस इंजन में तरल हाइड्रोजन से गैस बनाने का रिएक्टर लगा था. जिसकी मदद से इस रॉकेट को उड़ान भरनी थी. एटमी ताक़त जो बहुत ख़तरनाक मानी जाती है, उसका किसी स्पेस मिशन में इस्तेमाल करना बेहद जोखिम भरा काम था.

मगर नासा के वैज्ञानिकों ने इस इंजन के कई टेस्ट किए थे और ये कामयाब रहे थे. इस एटमी इंजन की मदद से नासा की तैयारी 1979 में मंगल ग्रह पर मिशन भेजने की थी.

मगर इंजन के कामयाब टेस्ट के बावजूद 1973 में मिशन पर ब्रेक लगा दिया गया. क्योंकि कई वैज्ञानिकों ने स्पेस मिशन के लिए एटमी ईंधन के इस्तेमाल पर सवाल उठाए थे. उन्हें लगता था कि तेज़ रफ़्तार रॉकेट में इतनी ज़्यादा तरल हाइड्रोजन भेजना बहुत जोखिम का काम है. कहीं रास्ते में विस्फोट हुआ तो इससे इंसान पर जो क़हर बरपेगा, उससे निपटना मुश्किल होगा.

बहरहाल, अब जब मंगल पर इंसान को भेजने के प्लान बन रहे हैं तो एक बार फिर इस नर्वा इंजन की ज़रूरत महसूस की जा रही है.

अंतरिक्ष में जंगी जहाज़ : यूं तो सोवियत संघ ने कई डरावने मिशन को अंजाम दिया. मगर अंतरिक्ष के लिए उनका जो इरादा था, उसके बारे में सुनकर ही होश उड़ जाएं. सोवियत स्पेस एजेंसी ने अपने मशहूर सोयुज रॉकेट का एक ऐसा वैरिएंट विकसित किया था, जिसे अंतरिक्ष में जंगी बेड़ा कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा.

इस रॉकेट की मदद से सोवियत संघ का इरादा, अंतरिक्ष में अमरीकी सैटेलाइट और रॉकेट पर नज़र रखने का ही नहीं था. सोयुज रॉकेट के इस वैरिएंट में तोपें भी लगी हुई थीं, जिनकी मदद से अमरीकी उपग्रहों और रॉकेट का ख़ात्मा किए जाने का भी प्लान था.

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तोप के गोले दागने से सोयुज रॉकेट को झटका न लगे, इसलिए तोप को अलग से बनाए गए प्लेटफॉर्म पर तैनात किया जाना था. इस मिशन के लिए सोवियत संघ ने रॉकेट भी डेवेलप कर लिया था और कई अंतरिक्ष यात्रियों को निशाना लगाने की ट्रेनिंग भी दी गई थी. मगर बाद में मिशन को रद्द कर दिया गया. खुफिया सैटेलाइट्स के ज़माने में शायद इसकी ज़रूरत नहीं रह गई थी.

जेमिनी मिशन : साठ के दशक में सोवियत संघ और अमरीका में अंतरिक्ष में आगे निकलने की होड़ लगी थी. सोवियत संघ ने अंतरिक्ष में पहली उड़ान और स्पेसवॉक के ज़रिए बढ़त बना ली थी. अमरीका को इससे आगे निकलने की ज़रूरत थी. इसीलिए नासा ने जेमिनी मिशन की शुरुआत की थी. ये नासा का बेहद कामयाब मिशन था.

अंतरिक्ष की सैर करने में जेमिनी रॉकेट बहुत काम आए. दो अंतरिक्ष यात्री इसमें सवार होकर अंतरिक्ष में आराम से जा सकते थे. इसकी मदद से अमरीकी अंतरिक्ष यात्रियों ने पहली बार स्पेसवॉक की.

उन्होंने पहली बार एक रॉकेट से दूसरे स्पेसक्राफ्ट को जोड़ने में कामयाबी हासिल की. वो अपने स्पेसक्राफ्ट से बाहर निकलकर मरम्मत का काम भी कर सकते थे. जेमिनी की कामयाबी की बुनियाद पर ही अमेरिका, चांद पर इंसान को भेजने में सोवियत संघ से आगे निकल गया.

जेमिनी का डिज़ाइन बनाने वाले वैज्ञानिक मैक्डॉनेल डगलस ने तो जेमिनी का बड़ा वैरिएंट भी बनाने की सोची थी. जिसमें एक साथ नौ एस्ट्रोनॉट, अंतरिक्ष में भेजे जा सकते थे. लेकिन, 1971 में नासा ने स्पेस शटल के डिज़ाइन पर काम शुरू कर दिया.

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जेमिनी मिशन को बंद कर दिया गया. हालांकि अब नासा, जेमिनी जैसे बड़े स्पेसक्राफ्ट पर फिर से काम कर रहा है. बोइंग और स्पेसएक्स नाम की कंपनियां इससे जुड़े प्रयोग कर रही हैं, अंतरिक्ष के सफ़र के लिए.

स्पेस स्टेशन फ्रीडम : आज पूरी दुनिया आईएसएस या इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के बारे में जानती है. ये अंतरिक्ष में तमाम देशों के मिलकर काम करने की सबसे बड़ी मिसाल है. शुरुआत अमरीका ने की थी. फिर पुराना दुश्मन रूस भी आईएसएस में साझीदार हो गया. कई और देश भी इसमें शामिल हैं.

मगर, आज से क़रीब 32 साल पहले अमरीका ने फ्रीडम के नाम से स्पेस स्टेशन बनाने की सोची थी. इस प्रोजेक्ट को अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने मंज़ूरी दी थी. नासा का इरादा ऐसा स्पेस स्टेशन बनाने का था, जिसमें आराम करने और मौज मस्ती की सुविधा भी होती.

साथ ही बाहर से लाकर सैटेलाइट और दूसरे स्पेसक्राफ्ट की मरम्मत की जगह रखने का भी प्लान था. कुल मिलाकर फ्रीडम ऐसा स्पेस स्टेशन बनने वाला था जैसा हम साइंस फ़िक्शन फ़िल्मों में देखते हैं. मगर, शीत युद्ध के ख़ात्मे के बाद ये महंगा, बेतुका और और ग़ैरज़रूरी प्रोजेक्ट बंद कर दिया गया.

सोवियत स्पेस-प्लेन : शीत युद्ध के दौरान अंतरिक्ष की होड़ में लगे अमरीका और सोवियत संघ, एक ही काम के लिए अलग तरह के स्पेसक्राफ्ट बनाते थे. हालांकि होड़ में आगे निकलने के लिए दोनों ही खेमे एक दूसरे के अच्छे डिज़ाइन की नक़ल भी करते थे.

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जैसे अमरीकी स्पेस शटल की नकल करके रूस ने 'ब्यूरान' नाम का स्पेस प्लेन बनाया. मगर, ख़ुद अमरीका ने सोवियत संघ के ही पुराने स्पेस प्लेन का डिज़ाइन चुराकर उसकी मदद से स्पेस शटल बनाया था.

सोवियत संघ के इस स्पेस प्लेन का नाम था, मिग-105. सोवियत वैज्ञानिकों का इरादा था कि इस प्लेन को रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजा जाए. वापसी में यही स्पेस प्लेन, किसी आम विमान की तरह एयरपोर्ट पर उतरे. सोवियत संघ ने इस स्पेस प्लेन की टेस्ट फ्लाइट में कामयाबी हासिल की. मगर तब तक ये तकनीक अमरीकियों के हाथ लग गई. और उन्होंने इसे स्पेस शटल का नाम देकर, सोवियत संघ से बाज़ी मार ली.

अब सोवियत स्पेस प्लेन और अमरीकी स्पेस शटल दोनों का दौर ख़त्म हो गया है, मगर एक अमरीकी कंपनी फिर से स्पेस प्लेन के इस डिज़ाइन को ज़िंदा करने में जुटी है.

सिएरा नेवादा कॉरपोरेशन नाम की इस कंपनी ने स्पेस प्लेन को 'ड्रीम चेज़र' का नाम दिया है. इस मिशन में नासा ने भी पैसा लगाया है. अगले कुछ सालों में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन तक ज़रूरी सामान पहुंचाने में इस अंतरिक्ष विमान का इस्तेमाल करने की तैयारी है.

शीत युद्ध के दौर की होड़ में विकसित की गई तकनीक, आज की अंतरिक्ष तक जाने की ज़रूरत में काम आ रही है. इसी तरह मंगल और दूसरे ग्रहों पर जाने के लिए एटमी ईंधन वाले रॉकेट के बारे में भी फिर से सोचा जा सकता है.

हां, तोप से लैस स्पेसक्राफ्ट का आइडिया ज़रूर डराने वाला है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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