कैमरे के सामने खुला 'ग्रे घोस्ट' का रहस्य

  • 18 मार्च 2016
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शेर और उसके भाई-बंधु जैसे बाघ, चीता, तेंदुआ इंसान को बहुत लुभाते हैं. आज हम आपको इनमें से सबसे कम दिखने वाले जानवर की कहानी सुनाते हैं.

ये क़िस्सा है स्नो लेपर्ड या बर्फ़ीले, पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले तेंदुए का. अंग्रेज़ी में इसे 'ग्रे घोस्ट' कहते हैं. क्योंकि ये बमुश्किल दिखाई देता है और बेहद शातिर-ख़तरनाक होता है.

स्नो लेपर्ड, मध्य और दक्षिण एशिया के कुछ देशों में पाए जाते हैं. दूर-दराज़ के पहाड़ी इलाक़ों में. भारत में ये जम्मू-कश्मीर के लद्दाख इलाक़े में पाया जाता है.

चीन, कज़ाख़स्तान और मंगोलिया के कुछ हिस्सों में भी स्नो लेपर्ड या बर्फ़ के बीच पाया जाने वाला तेंदुआ मिलता है.

कुछ दिनों पहले बीबीसी अर्थ की एक टीम, इस 'भूरे रंग के भूत' का कैमरे से शिकार करने के लिए लद्दाख पहुंची थी. इस टीम की अगुवाई कर रहे थे, जस्टिन एंडरसन.

वो इससे पहले भी पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में साल 2006 में स्नो लेपर्ड की तस्वीरें ले चुके थे.

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उनकी बनाई डॉक्यूमेंट्री प्लैनेट अर्थ ख़ूब पसंद की गई थी. अब इसी का सीक्वल बनाने के लिए जस्टिन को फिर से भारतीय उप महाद्वीप आना था.

मगर, इस बार पाकिस्तान के हालात बदल चुके थे. इसीलिए जस्टिन और उनकी टीम ने लद्दाख के हेमिस नेशनल पार्क पहुंची. ताकि चार पैरों वाले इस भूरे भूत को कैमरे में क़ैद कर सकें.

जस्टिन की टीम ने पहले भी वहां स्नो लेपर्ड की शूटिंग करने की कोशिश की थी. मगर बहुत ज़्यादा कामयाबी उन्हें नहीं मिली थी.

हालांकि, पिछले कुछ सालों में हेमिस नेशनल पार्क में हालात काफ़ी बदल गए हैं. वन अधिकारियों की शानदार टीम और स्थानीय लोगों के साथ अच्छी जुगलबंदी की वजह से यहां स्नो लेपर्ड की नस्ल यहां ख़ूब फल फूल रही है.

यहां के अधिकारियों-लोगों की कोशिशों का नतीजा ये हुआ है कि अब स्नो लेपर्ड, इंसानों को देकर इतना दूर भी नहीं भागते. इसलिए इन्हें कैमरे में क़ैद करना आसान हो गया है.

भारत ने स्नो लेपर्ड की नस्ल को बचाने के लिए एक एक्शन प्लान तैयार किया है. इसकी मदद से लद्दाख के हेमिस नेशनल पार्क में स्नो लेपर्ड की आबादी काफ़ी बढ़ गई है.

ऐसे प्लान की सख़्त ज़रूरत भी है. क्योंकि बर्फ़ीले इलाक़ों में पाए जाने वाले ये तेंदुए ज़िंदगी की जंग लड़ रहे हैं.

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इनके रिहाइश वाले इलाक़ों में इंसानों के बढ़ते दखल से इंसान और स्नो लेपर्ड में झगड़ा बढ़ रहा है. और अक्सर हार स्नो लेपर्ड की हो रही है. इस हार की क़ीमत वो अपनी जान गंवाकर चुकाते हैं.

स्नो लेपर्ड, किसी एक देश के बजाय भारत-पाकिस्तान, चीन, मंगोलिया, कज़ाख़स्तान, किर्गीज़िस्तान, नेपाल, रूस, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान में मिलते हैं.

स्नो लेपर्ड बहुत मुश्किल हालात में रहते हैं. उनके ठिकाने ऊंचे बर्फ़ीले पहाड़, तीखी ढलान वाली चट्टानें और पठारी इलाक़ों में होते हैं. ऐसी जगहों पर बारिश कम होती है. अक्सर बर्फ़ीले तूफ़ान आते हैं.

इन हालात के हिसाब से उनका शरीर भी ढल चुका होता है. उनका रंग ऐसा होता है कि वो अपने आस-पास के माहौल में बमुश्किल दिखाई देते हैं. उनके लिए छुपना आसान होता है.

फिर भी जिन इलाक़ों में वो रहते हैं. वहां क़ुदरती संसाधनों की कमी होती है. इन संसाधनों, खाने-पीने के सामानों के लिए अक्सर स्नो लेपर्ड और इंसान आमने-सामने आ जाते हैं.

खाने की तलाश में स्नो लेपर्ड इंसानी बस्तियों पर धावा बोलते हैं. पालतू जानवरों को मारकर खा जाते हैं. नाराज़ स्थानीय लोग पलटवार करके स्नो लेपर्ड का ख़ात्मा करने की कोशिश करते हैं.

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इस जंग का नतीजा ये है कि आज दुनिया में सिर्फ़ चार से साढ़े छह हज़ार स्नो लेपर्ड ही बचे हैं. पिछले पंद्रह सालों में ये तादाद और घट गई है.

स्नो लेपर्ड अक्सर पहाड़ी भेड़ों-बकरियों का शिकार करते हैं. मगर, इन जानवरों का शिकार इंसान भी करते हैं. इस वजह से स्नो लेपर्ड को शिकार की कमी हो जाती है.

भेड़-बकरियों के अलावा वो परिंदों, चूहों और गिलहरियों को भी मारकर खाते हैं.

जब बीबीसी की टीम हेमिस नेशनल पार्क पहुंची तो उस दौरान बारह दिनों में नौ स्नो लेपर्ड वहां देखे गए थे. यानी जस्टिन को उम्मीद की किरण दिख रही थी.

पहाड़ी इलाक़ों की तरफ़ रवाना होने से पहले इस टीम ने बाक़ायदा ट्रेनिंग ली, अमेरिका के इदाहो में. इसके साथ स्थानीय लोग भी जोड़े गए, जो तेंदुओं के स्पॉटर्स थे.

जस्टिन ने जो टीम इकट्ठी की थी, उसमें तीन कैमरामैन, दो सहायक, ग्यारह लोकल गाइड, कुली वग़ैरह थे.

इस अभियान में पहली बार जस्टिन और उनकी टीम को स्नो लेपर्ड की झलक मिली महज़ एक किलोमीटर की दूरी से. यानी शुरुआत अच्छी हो गई थी.

जस्टिन की टीम के एक सीनियर कैमरामैन थे जॉन शीयर, जिन्हें ऐसे करामाती शॉट्स लेने का अच्छा ख़ासा तजुर्बा था. उन्हें हेमिस नेशनल पार्क का माहौल बहुत पसंद आया.

यहां पर स्नो लेपर्ड देखने के लिए दूर-दूर से लोग आ रहे थे. बीस-तीस लोग इकट्ठे, स्नो लेपर्ड के पग मार्क्स का पीछा करते हुए निकलते थे ताकि इस भूरे भूत के दीदार हो जाएं.

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Image caption पाकिस्तान के असकोल में तेंदुए की खाल बेचता एक बाल्टी परिवार.

भीड़-भाड़ देखकर तेंदुए बिदक जाते हैं. इसीलिए बीबीसी की टीम ने दूर दराज़ के उन इलाक़ों का रुख़ किया. जहां सैलानियों की भीड़ नहीं जाती.

इसका तुरंत फ़ायदा हुआ. पहले पांच दिनों में ही इस टीम को पांच स्नो लेपर्ड देखने को मिले.

हेमिस नेशनल पार्क, समुद्र तल से क़रीब चार हज़ार मीटर की ऊंचाई पर है. यहां अक्सर ऑक्सीजन की कमी से सांस लेने में दिक़्क़त होती है. इसलिए बीबीसी की टीम ने इसके लिए भी पूरी तैयारी कर रखी थी. जैसे वो अपने साथ ऑक्सीजन ले गए थे.

दूर दराज़ का इलाक़ा होने की वजह से मुसीबत के वक़्त हेलीकॉप्टर का पहुंचना भी दूभर था. इसलिए ये एहतियात ज़रूरी थे. बीच-बीच में टीम के सदस्य, एक दूसरे की सेहत की पड़ताल भी करते रहते थे.

राहत की बात रही कि शूटिंग के दौरान क़ुदरत ने मेहरबानी बनाए रखी, न बर्फ़ीला तूफ़ान आया, न रौशनी की कमी हुई, न ही किसी की तबीयत बिगड़ी.

हां, तेज़ धूप की वजह से कई बार दिक़्क़त हुई. भयंकर ठंड ने भी परेशान किया. इस दौरान कैमरों के केबल टूटने का डर लगा रहता था.

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रात में तापमान माइनस से पच्चीस डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाता था.

बीबीसी टीम को अपने मिशन में कामयाबी स्थानीय लोगों की वजह से मिली. तेंदुओं के स्पॉटर्स, गाइड, पग मार्क के ट्रैकर्स की मदद से वो अपने मिशन में कामयाब हो सके.

अक्सर बीबीसी की टीम को चट्टानों में छुपे तेंदुए नहीं दिखाई देते थे. तब उन्हें स्पॉटर्स बताते थे कि वहां छुपा है भूरा भूत.

जस्टिन कहते हैं कि स्थानीय लोगों की ये टीम मौज-मस्ती वाले मिज़ाज की थी. ये लोग अक्सर, मज़ाक़ करते रहते थे. बीबीसी की टीम के कई लोगों को उन्होंने तेंदुआ दिखाने के नाम पर सोते से जगाया और बुद्धू बनाया.

इन्हीं में से एक थे खेनराब फुंटसॉग. खेनराब पिछले 14 सालों से हेमिस नेशनल पार्क में काम कर रहे हैं. वो स्नो लेपर्ड का पीछा करने के उस्ताद हैं.

बचपन से ही उन्हें इन जानवरों से लगाव हो गया था. खेनराब ने अब तक 17 तेंदुओं की जान बचाई है. जो अक्सर इंसानी बस्तियों में आकर फंस जाते थे.

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खेनराब का कहना है कि स्नो लेपर्ड, पालतू जानवरों का शिकार तो अक्सर करते हैं. मगर उन्होंने इंसानों पर कभी हमला नहीं किया. खेनराब अब इतने जानकार हो चुके हैं कि वो तेंदुओं को उनकी धारियों से पहचान लेते हैं.

स्नो लेपर्ड एक दूसरे से अपने यूरिन मार्क की मदद से बात करते हैं. अपने इलाक़े में वो जगह-जगह पेशाब करके ये मार्किंग करते हैं. अपने इलाक़ों की सरहदें तय करते हैं.

अगर कोई तेंदुआ अपने साथियों से बिछड़ जाता है तो ये यूरिन मार्क उसके बहुत काम आता है. इन्हीं के ज़रिए नर तेंदुए, अपनी मादा साथी को तलाशते हैं.

बीबीसी की टीम को स्नो लेपर्ड को शूट करने में पहले ही दिन से कामयाबी मिलने लगी थी. पहले हफ़्ते में ही इस टीम ने तीन स्नो लेपर्ड को कैमरे में क़ैद कर लिया था.

ये स्नो लेपर्ड का पूरा परिवार था. जिसमें एक नर, एक मादा और उनका एक बच्चा था.

मार्च का महीना, इन तेंदुओं का ब्रीडिंग सीज़न होता है. तो इस दौरान ये अक्सर आवाज़ निकालकर अपने साथियों को बुलाते हैं.

अक्सर, एक मादा तेंदुए के लिए दो नरों में झगड़ा होता देखा गया है. स्नो लेपर्ड के इस ''लव ट्रायंगल'' इस झगड़े में कई बार बच्चे मारे जाते हैं.

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खेनराब के तजुर्बों का इस टीम को ख़ूब फ़ायदा हुआ. एक मादा स्नो लेपर्ड और उसके बच्चे से बीबीसी की टीम का पंद्रह दिनों में छह बार सामना हुआ.

इस दौरान, कई बार मां, अपने बच्चे को शिकार की ट्रेनिंग देती कैमरे में क़ैद हुई. बच्चा भी इस ट्रेनिंग को आज़माता दिखा.

इस बच्चे को देखकर ही हेमिस नेशनल पार्क को लेकर नई उम्मीद जगी है. कि यहां तस्नो लेपर्ड की नस्ल फल-फूल रही है.

स्थानीय लोगों को भी रोज़गार के दूसरे साधन मुहैया कराए जा रहे हैं. ताकि व जानवर पालकर गुज़र बसर करना छोड़ दें. क्योंकि इन्हीं जानवरों का शिकार तेंदुए करते हैं.

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भूटान में भी स्नो लेपर्ड के बचाव के लिए काफ़ी काम हो रहा है. बौद्ध धर्म के अनुयायी होने की वजह से यहां लोग हिंसा से बचते हैं. इस सिद्धांत की वजह से भी स्नो लेपर्ड का बचाव मुमकिन हो पाया है.

हालांकि, जानकार सलाह देते हैं कि स्नो लेपर्ड को बचाने के लिए अलग अलग अभियान चलाने के बजाय, सभी देश मिल-जुलकर कोशिश करें, तो बेहतर होगा.

इस तरह के अभियान में स्थानीय लोगों की भागीदारी बहुत ज़रूरी है. क्योंकि, वही लोग अक्सर स्नो लेपर्ड से क़ुदरती संसाधन साझा करते हैं.

स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार के साधन जुटाना. उनको जानवर पालने के विकल्प मुहैया कराना, स्नो लेपर्ड की नस्ल को बचाने के लिए सबसे ज़रूरी क़दम है.

सबसे बड़ी बात, स्थानीय लोगों को ये समझाना है कि स्नो लेपर्ड उनके दुश्मन नहीं. उनका भी ज़िंदा रहने का, शिकार करने का हक़ है.

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हेमिस नेशनल पार्क में इस दिशा में काफ़ी काम हुआ है. यहां पर ''होम स्टे टूरिज़्म'' नाम से अभियान चलाया गया है.

इसमें बाहर से आने वाले सैलानियों को स्थानीय लोगों के घर पर ठहराया जाता है. इससे सैलानियों को घर जैसा एहसास होता है. और स्थानीय लोगों को आमदनी होती है.

अभी हाल में ताजिकिस्तान में एक स्थानीय शख़्स ने स्नो लेपर्ड को मार डाला था. जिसके बाद उस पर वन विभाग ने भारी जुर्माना कर दिया.

एक ग़ैर सरकारी संगठन को ये बात पता चली, तो उसने इस शख़्स को तेंदुए बचाने की मुहिम का हिस्सा बना लिया. आज वो घूम-घूमकर पूरे इलाक़े में लोगों को स्नो लेपर्ड बचाने के अभियान से जोड़ रहा है.

ऐसे ही अभियान से स्नो लेपर्ड के इलाक़े में रहने वाली पूरी आबादी को जोड़ने की ज़रूरत है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

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