कैसे मिलेगा 'डिजिटल भूतों' से छुटकारा?

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इंसान दुनिया में आते हैं. अपनी ज़िंदगी जीते हैं. और, एक दिन उनकी ज़िंदगी ख़त्म हो जाती है. क़ुदरत का यही नियम है.

जाने के बाद भी इंसान के तमाम निशान धरती पर रह जाते हैं, जो वक़्त के थपेड़ों के साथ पहले धूमिल पड़ते हैं और धीरे-धीरे मिट जाते हैं.

मगर, क्या आपने सोचा है कि किसी के गुज़र जाने के बाद उसकी डिजिटल पहचान का क्या होता है? आज हम-आप अच्छा ख़ासा वक़्त सोशल मीडिया पर गुज़ारते हैं. रोज़ कोई पोस्ट डालते हैं, तस्वीरें शेयर करते हैं. इस तरह हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को डिजिटल दुनिया में दर्ज करते रहते हैं.

पहले गिने-चुने बड़े लोग ही अपनी ज़िंदगी की कहानी, या आत्मकथा लिखते थे. कुछ मशहूर लोगों की जीवनियां लिखी जाती थीं.

मगर सोशल नेटवर्किंग के इस दौर में हम रोज़ डिजिटल दुनिया में अपनी ज़िंदगी के तमाम पहलू दर्ज करते जाते हैं. बग़ैर इस बात का एहसास हुए कि हम असल में अपनी जीवनी लिखते जा रहे हैं. अपने अलग ही अंदाज़ में.

तो, कभी आपने सोचा है कि किसी इंसान के गुज़र जाने के बाद उसके तमाम सोशल मीडिया अकाउंट्स का क्या होता होगा? वो लोग जो असल ज़िंदगी से जा चुके होते हैं, उनके फ़ेसबुक अकाउंट्स का क्या होता है?

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फ़ेसबुक अक्सर हमें जान-पहचान वाले लोगों से जुड़ने की सलाह देता रहता है...''पीपुल यू मे नो'' नोटिफ़िकेशन के ज़रिए.

ज़रा सोचिए, आप जानते हैं कि फ़लां इंसान अब इस दुनिया में नहीं है. मगर फ़ेसबुक को इसकी ख़बर नहीं. और आपके नोटिफ़िकेशन में उसका नाम और तस्वीर आए...''पीपुल यू मे नो''.

फ़ेसबुक आज की तारीख़ में इंसान का डिजिटल क़ब्रिस्तान बनता जा रहा है. साल 2012 में ही फ़ेसबुक पर तीन करोड़ ऐसे अकाउंट थे, जिनके मालिक मर चुके थे. आज की तारीख़ में ये आंकड़ा और भी बढ़ गया है. मोटे अंदाज़े से कहें तो रोज़ाना आठ हज़ार फ़ेसबुक इस्तेमाल करने वालों की मौत हो रही है.

वो दिन दूर नहीं जब फ़ेसबुक पर गुज़र चुके लोगों का आंकड़ा, ज़िंदा लोगों के एक्टिव अकाउंट से ज़्यादा हो जाएगा.

ऐसे गुज़र चुके लोगों के कई फ़ेसबुक पेज पर लिखा होता है, ''मेमोरियलाइज़्ड''. उनको लेकर नोटिफ़िकेशन आने बंद हो जाते हैं. वो आपके दोस्त रहे होते हैं तो उनके बर्थडे की याद दिलाना फ़ेसबुक बंद कर देता है.

लेकिन, ऐसा हर गुज़र चुके इंसान के फ़ेसबुक पेज के साथ नहीं होता. कई लोगों की मौत की ख़बर फ़ेसबुक को नहीं हो पाती. लिहाज़ा उस शख़्स के जानने वालों के पास ''पीपुल यू मे नो'' या जन्मदिन की नोटिफ़िकेशन आती रहती है. ऐसे लोग असल ज़िंदगी में मरने के बाद भी डिजिटल दुनिया में ज़िंदा रहते हैं.

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सोशल मीडिया ने हमें मौजूदा पलों की अहमियत का एहसास कराया है. हम दुनिया भर के लोगों से जुड़ते हैं. खेल-कूद, फ़िल्मों, अवार्ड्स, पढ़ाई लिखाई, और दूसरे सामाजिक मसलों के बहाने.

लेकिन, शायद अब वक़्त आ गया है कि हम इंसान के गुज़र जाने के बाद उसकी डिजिटल विरासत के बारे में गंभीरता से सोचें.

पहले लिखने-पढ़ने, अपने दौर के क़िस्से दर्ज करने का काम गिने-चुने लोग करते थे. आज हममें से ज़्यादातर लोग हर हफ़्ते औसतन बारह घंटे सोशल मीडिया पर खर्च करते हैं. इस दौरान हम जो भी लिखते पढ़ते या शेयर करते हैं, एक तरह से वो आपकी ज़िंदगी की कहानी है, जो सोशल मीडिया पर दर्ज होती जाती है.

हमारी आने वाली पीढ़ी, शायद फ़ेसबुक के ज़रिए हमें बेहतर जान-समझ पाएगी. हमारे जन्मदिन, पसंद-नापसंद, दोस्तों, ख़ुशी और ग़म के क़िस्से-कहानियों को हमारी आने वाली पीढ़ी सोशल मीडिया पर देखेगी-पढ़ेगी.

फ़ेसबुक या दूसरे सोशल नेटवर्क पर हमनें जो तस्वीरें साझा कीं, जो दुख बयां किया, जो वीडियो पसंद किया, जो कार्टून देखा, जो मेमे दोस्तों को भेजे, जिस रेस्तरां में खाने गए, जो खाया, जहां घूमने गए, सब-कुछ डिजिटल दुनिया में दर्ज होगा, हमारी आने वाली नस्लों के लिए.

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हमारे सोशल नेटवर्क की दुनिया के दोस्त हमारी पसंद-नापसंद जानते हैं. हम किस धर्म में यक़ीन रखते हैं. कौन सी राजनैतिक विचारधारा के हामी हैं. ज़िंदगी को लेकर हमारी क्या उम्मीदें हैं. वो सब डिजिटल दुनिया में दर्ज है. अगर आज हमारी मौत हो जाती है, तो भी, वहां पर तो हमारे एहसास, हमारी पहचान बनी रहेगी.

पिछले कुछ सालों में कुछ टेक कंपनियों ने डिजिटल आत्मा के कॉन्सेप्ट को बढ़ावा दिया है. 2014 में शुरू की गई वेबसाइट Eterni.me ने वादा किया कि वो आपके व्यक्तित्व के डिजिटल अवतार को सहेजकर रखेगी.

वेबसाइट कहती है कि मौत तो तय है. मगर आप अगर अपने डिजिटल व्यक्तित्व को वहां दर्ज करा दें तो मरने के बाद भी आप बाक़ी दुनिया के लिए ज़िंदा रहेंगे. वेबसाइट कहती है कि उसके साथ जुड़ेंगे तो आपके जाने के बाद भी लोग आपके किरदार से बात कर सकेंगे. आपकी यादें ताज़ा रहेंगी. आपकी पसंद-नापसंद लोगों को मालूम होगी. ऐसा होगा कि लोग आपसे बातें करते रहेंगे, आपकी मौत के बाद भी.

अगर Eterni.me जैसी वेबसाइट कामयाब होती हैं. तो लोगों के जाने के बाद भी उनकी आने वाली पीढ़ियां उनके साथ डिजिटल दुनिया में रूबरू हो सकेंगी.

बात अब इससे भी आगे बढ़ चुकी है. मार्टिन रोथब्लैट नाम के एक कारोबारी ने अपनी पत्नी की शक्लो-सूरत वाला एक रोबोट ही बनवाया था. जिसकी मेमोरी, में मार्टिन की पत्नी के हाव-भाव, यादें और वो तमाम बातें दर्ज हैं, जो मार्टिन की पत्नी कहती सुनती थी.

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मार्टिन का दावा है कि मौत तय नहीं, महज़ एक विकल्प है. क्योंकि आज तकनीक की मदद से किसी इंसान का मशीनी अवतार बनाया जा सकता है. इस तरह वो इंसान मरकर भी ज़िंदा रहेगा. और असल इंसान के क्लोन की तरह आपसे बातें करेगा, वक़्त गुज़ारेगा.

अगर, ऐसा हुआ कि इंसान मरकर भी डिजिटल अवतार में ज़िंदा रहेगा. तो, हम किसी की मौत का सोग कैसे मनाएंगे? क्योंकि गुज़र जाने के बाद भी इंसान का डिजिटल क्लोन तो अपने लोगों के बीच रहेगा ही.

किसी की मौत पर दुख के बारे में 1969 में एक क़िताब लिखी गई थी, ''ऑन डेथ एंड डाइंग''. ये क़िताब एलिज़ाबेथ कुब्लर-रॉस ने लिखी थी. एलिज़ाबेथ ने लिखा कि किसी के जाने के दुख के एहसास के पांच चरण होते हैं. शुरुआत इन्कार से होती है. फिर ग़ुस्सा आता है. फिर लोग ऊपरवाले से मोल-भाव करते हैं मन ही मन. इसके बाद उन्हें सदमा लगता है. और आख़िर में थक-हारकर वो किसी के इस दुनिया से चले जाने की सचाई मान लेते हैं.

क़िताब के प्रकाशन के बाद से ही इसे लेकर तमाम तरह के सवाल खड़े हुए हैं.

आज बहुत से एक्सपर्ट हैं जो लोगों की मदद करते हैं, उनके अपनों के गुज़र जाने के बाद के सदमे को बर्दाश्त करने में. उन्हें समझाया जाता है कि जाने वाला उनकी यादों में आज भी ज़िंदा है.

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हालांकि, किसी के जाने का ग़म बर्दाश्त करने में ये शामिल नहीं होता कि हम जाने वाले को भूल जाएं. हां, हम उसके चले जाने का सच तो स्वीकार कर लेते हैं. मगर, वो कभी था ही नहीं, ये मानने को दिल तैयार नहीं होता. यहीं पर हमारी डिजिटल आत्मा, ग़म को सहने में मददगार साबित हो सकती है.

किसी को भूल जाने की कूवत ही इंसान को ज़िदगी बसर करने की ताक़त देती है. 2009 में आई क़िताब, 'डिलीट:द वर्चू ऑफ फॉरगेटिंग इन द डिजिटल एज' में लेखकर विक्टर मेयर शोनबर्गर ने इस बात को बख़ूबी समझाया है. विक्टर कहते हैं. किसी भी इंसान के दिमाग़ी एहसास का सबसे अहम पड़ाव होता है किसी को भूल जाना. इसी के बूते हम सही वक़्त पर सही फ़ैसले लेते हैं. गुज़रे हुए कल के बारे में ख़ुद को समझाते हैं कि वो था तो, मगर आज नहीं. बीते पलों से ख़ुद को आज़ाद करते हैं और ज़िंदगी में आगे बढ़ते हैं.

मेयर इसके लिए योर्ग लुई बोर्ग की कहानी ''फ्यून्स, द मेमोरियस'' का ज़िक्र करते हैं. इस कहानी का मुख्य किरदार, एक हादसे के बाद भूल जाने की क्षमता गंवा देता है. इस शख़्स को अपनी ज़िंदगी का हर पल याद होता है. हर तजुर्बे को वो हूबहू बयां कर सकता है.

लेकिन उसकी ये क़ाबिलियत ही उसके लिए श्राप बन जाती है. दिमाग़ में ऐसी बातों का ढेर लग जाता है, जिनकी अब उसे ज़रूरत नहीं. फ्यून्स का मतलब होता है, ख़राब क़िस्मतवाला. आख़िर में वो अपने ही दिमाग़ के झंझावातों में फंसकर पागल हो जाता है. क्योंकि वो कुछ भूल ही नहीं पाता.

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विक्टर कहते हैं कि अगर हम अपनी भूल पाने की ताक़त गंवा देते हैं तो हम अपनी यादों के शिकार हो जाते हैं. उन यादों के दलदल में धंसते चले जाते हैं. ज़िंदगी में आगे नहीं बढ़ पाते.

किसी की डिजिटल पहचान को सहेजकर रखने से हम उसे कभी भूल नहीं पाएंगे. वो इस अवतार में बार-बार सामने आकर हमारे-आपके ज़ेहन में ख़ुद को ज़िंदा रखेगा.

पहले किसी गुज़र चुके इंसान को याद करने के लिए हमें क़ब्रिस्तान या चर्च जाना पड़ता था. या पुरानी तस्वीरों के एल्बम को निकालकर देखना पड़ता था. लोगों को अपने हाल में से कुछ वक़्त निकालकर माज़ी में झांकना होता था, जाने वाले के साथ गुज़ारे पलों की यादों को ताज़ा करने के लिए.

मगर सोशल नेटवर्क पर, फ़ेसबुक पर वो हमेशा मौजूद रहते हैं. हम जब भी फ़ेसबुक पर लॉग इन करेंगे, वो हमारे सामने आ खड़ेंगे, कभी मुस्कुराते तो कभी किसी और मूड में.

उनकी यादों को बिसराकर हम आगे नहीं बढ़ सकते. डिजिटल अवतार में वो हमेशा हमारे साथ हैं.

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एक सर्कस का जोकर, जिसका नाम डूबी था, वो परफ़ॉर्मेंस देने जा ही रहा था कि उसके दादा की वॉयसमेल उसे मिली, जिसमें उसके दादा कह रहे थे कि वो उससे बहुत प्यार करते हैं. जब वो अपने दादा की डिजिटल आवाज़ सुन रहा था, ठीक उसकी वक़्त डूबी के दादा ये दुनिया छोड़कर जा चुके थे. मगर, वो गुज़रकर भी उसके साथ थे.

जब हमारा ज़ेहन हमें ये चेतावनी देता है कि कुछ बुरा होने वाला है, तो उस एहसास को पूर्वाभास कहते हैं.

जब हम हमारी ज़िंदगी से जा चुके किसी ऐसे शख़्स के फ़ेसबुक पेज को देखेंगे तो ऐसा ही एहसास होगा, मगर ये पूर्वाभास नहीं. उस तक़लीफ़ के पल का फिर से आभास होना होगा. ये याद हमें बार-बार दर्द ही देगी, किसी के गुज़र जाने से हुई तकलीफ़ का एहसास कराएगी.

तो इसका हल क्या है? फ़िलहाल तो इन डिजिटल भूतों की दिक़्क़त का कोई हल नहीं निकला है. अब सिर्फ़ यही उम्मीद है कि एक वक़्त ऐसा आएगा, जब इंटरनेट की याददाश्त कमज़ोर पड़ने लगेगी. तब शायद हम इन डिजिटल भूतों से छुटकारा पा सकेंगे.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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