कैसे बचे अफवाहों के गर्म बाज़ार से ?

  • 1 अप्रैल 2016
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लोग बहुत जल्द अफ़वाहों पर यक़ीन कर लेते हैं. चालाक से चालाक लोग, झूठ या ग़लत बातों के ऐसे जाल मे फंस जाते हैं. कभी आपने सोचा कि आख़िर ऐसा क्यों होता है?

चलिए पता लगाने की कोशिश करते हैं. सबसे पहले आपको साल 2000 में अमरीका में फैली एक अफ़वाह के बारे में बताते हैं.

उस साल, अमरीका में अचानक ऐसे ई-मेल्स की बाढ़ आ गई, जिसमें कहा जा रहा था कि एक ख़ास तरह का केला खाने से आपकी चमड़ी फट जाएगी और आप मर जाएंगे.

लोगों ने एक दूसरे को ये मेल भेजकर, अपने दोस्तों-रिश्तेदारों को आगाह करने को कहा. ये एकदम बकवास बात थी, जिसे सिरे से ख़ारिज कर दिया जाना चाहिए था. मगर लोगों ने इस पर तुरंत यक़ीन कर लिया.

इस मामले पर ई-मेल्स की ऐसी बाढ़ आ गई कि अमरीकी स्वास्थ्य विभाग ने बाक़ायदा सफ़ाई जारी की कि ऐसा कुछ नहीं है. मगर लोगों ने यक़ीन नहीं किया.

इमरजेंसी नंबरों पर कॉल आने लगी कि उन्होंने ऐसा केला खा लिया है और अब उन्हें मदद की दरकार है. अफ़वाह ने इस क़दर डर का माहौल बना दिया कि अमरीकी फूड एंड ड्रग विभाग को बनाना हेल्पलाइन शुरू करनी पड़ी. हालात बमुश्किल क़ाबू में आए.

अभी हाल ही में अमरीका समेत कई देशों में ये अफवाह फैल गई कि सेलेब्रिटी, पॉल मैकार्टिनी, माइली साइरस और मेगन फॉक्स, तीन के तीनों मारे जा चुके हैं. आज दुनिया के सामने इनके नाम से जो लोग हैं, वो असल में इनके जैसे दिखने वाले लोग हैं, असल नहीं.

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ये अफवाह भी फैली कि एड्स की बीमारी कतई नुक़सानदेह नहीं. या फिर, 9/11 का हमला, असल में अमरीका ने ख़ुद अपने ऊपर करवाया था.

भारत में भी कई बार ऐसी अफ़वाहें फैल चुकी हैं. कभी गणेश की मूर्ति के दूध पीने की, तो कभी किसी बीमारी के फैलने की.

आख़िर क्यों हम ऐसी ऊल-जलूल बातों पर यक़ीन कर लेते हैं? मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि दिमाग़ के इस्तेमाल में हम अक्सर कंजूसी बरतते हैं. सोच-विचारकर किसी भी बात पर भरोसा करने के बजाय हम बहुत जल्द अटकलों पर यक़ीन कर लेते हैं. इसमें दिमाग़ पर ज़ोर नहीं डालना पड़ता.

इसके अलावा, हम कई बार गड़बड़ी सामने होते हुए भी उसको नोटिस नहीं कर पाते. जैसे आपसे पूछा जाए कि मार्गरेट थैचर किस देश की राष्ट्रपति थीं?

आधे से ज़्यादा लोग सवाल के जवाब में इंग्लैंड लिखेंगे, ये ध्यान दिए बग़ैर की थैचर तो असल में इंग्लैंड की प्रधानमंत्री थीं, राष्ट्रपति नहीं.

लोगों को अक्सर ऐसा भरम हो जाता है. हम कई बार, सामने साफ़ तौर पर दिखने वाली गड़बड़ी भी पकड़ नहीं पाते. अक्सर बेख़याली में जो कहा जाता है उस पर सहज रूप से यक़ीन कर लेते हैं.

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इस बारे में अमरीका की सदर्न कैलीफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी में एक रिसर्च चल रही है. ये रिसर्च करने वाली एरिन न्यूमैन कहती हैं कि, इस भोलेपन के पीछे पांच बुनियादी सवाल होते हैं.

-क्या ये बात किसी भरोसेमंद इंसान के हवाले से पता चली है?

-क्या दूसरे लोग इस पर यक़ीन करते हैं?

-क्या इसे सही साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं?

-क्या ये हमारी सोच से मेल खाता है?

-क्या इससे कोई अच्छी कहानी निकलकर सामने आती है?

दिलचस्प बात ये है कि इनमें से हर मुद्दे पर हमारी प्रतिक्रिया एकदम अलग होती है. अक्सर, इसका सचाई से कोई ताल्लुक़ नहीं होता.

अब जैसे ये सवाल कि बात का सोर्स क्या है? मामला अरब मुल्क़ों में जंग का हो या विमान अपहरण की कोई वारदात, हम अपने साथियों पर ज़्यादा यक़ीन करते हैं. जबकि हमें ये मालूम होता है कि वो इन मामलों के एक्सपर्ट नहीं.

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जैसे जैसे इस बात के समर्थकों की तादाद बढ़ती है, हम उस अफ़वाह पर यक़ीन करने को मजबूर से हो जाते हैं. हमें भरम हो जाता है कि ये बात सच और भरोसे के क़ाबिल है.

कोई बात अगर आसानी से यक़ीन करने वाली होती है, तो बिना सोचे-विचारे हम उस पर भरोसा कर लेते हैं. क्योंकि इसके लिए दिमाग़ को मेहनत नहीं करनी होती.

इस बारे में रिसर्च करने वाली एरिन न्यूमैन ने एक प्रयोग किया. उन्होंने कुछ लोगों को एक फर्जी लेख पढ़ाया, जिसमें एक मशहूर गायक के मरने की झूठी ख़बर थी. इसमें लेखक की फोटो भी थी. लोगों ने इस झूठी ख़बर पर आसानी से भरोसा कर लिया.

न्यूमन कहती हैं कि आसानी से पढ़े जा सकने वाले शब्द, अच्छे से समझ में आने वाली बोली भी किसी अफ़वाह पर यक़ीन करने में मददगार होती है. लोग अपने जानने वालों के बोलने का लहजा समझते हैं, इसलिए उनके कहे पर तुरंत यक़ीन कर लेते हैं.

अब आपको समझ में आ गया होगा कि आप भोलेपन में या किसी और वजह से, कैसे किसी अफ़वाह पर आसानी से यक़ीन कर लेते हैं.

न्यूमैन कहती हैं कि अगर इन अफ़वाहों के ख़िलाफ़ कोई बात कही जाती है, तो लोगों का अफ़वाह पर भरोसा और बढ़ जाता है. हमारी कमज़ोर याददाश्त भी इसके लिए ज़िम्मेदार होती है. किसी बात के कुछ पहलू अगर हम भूल जाते हैं, तो उस गड्ढे को अटकलों से भर लेते हैं.

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अपने इन खोटों की वजह से हम झूठी बातों पर यक़ीन कर बैठते हैं. जब बार बार कोई अफवाह हमें सुनाई देती है, तो उस पर भरोसा बढ़ता जाता है.

अगर कोई बात ग़लत साबित कर दी जाती है तो भी उसका असर हमारे दिमाग़ पर रहता है. अगर वो हमारे विचारों से मेल खाती है, तो हम अवचेतन मन में उस पर भरोसा करते रहते हैं. भले ही उसे सबूतों की मदद से ग़लत ठहरा दिया गया हो.

कुछ-कुछ ये किसी क़िताब के पन्ने फाड़ने जैसा है. जब बीच के पन्ने फाड़ दिए जाते हैं, तो कहानी का फ्लो बदल जाता है. ऐसा ही हमारी याददाश्त के साथ भी होता है. इन फाड़ दिए गए पन्नों की खाली जगह को हम अटकलों से भर लेते हैं.

ऐसी आदत से छुटकारा पाने के लिए ज़रूरी है कि हम अटकलों को दोहराएं नहीं. बल्कि जो बात हमें मालूम है, उस पर अपना भरोसा कायम रखें. जैसे कोई ये कहे कि मूर्तियां दूध पी रही हैं, तो उस पर यक़ीन करने के बजाय अपने मन की बात पर भरोसा रखें कि मूर्तियां दूध नहीं पीतीं.

सदर्न कैलीफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी की एरिन न्यूमैन कहती हैं कि आज दुनिया भर में अटकलों, अफ़वाहों का बाज़ार गर्म है. लोग झूठी बातों को फैलाने में जुटे हुए हैं. ऐसे में हम अपने दिमाग़ पर ज़ोर डालें. इन बातों पर सोचें, विचार करें, सवाल उठाएं. क्या ऐसी बातों पर आसानी से यक़ीन किया जा सकता है. क्या ऐसा होना मुमकिन है.

इस तरह हम अपने भोलेपन की वजह से किसी अफ़वाह का शिकार होने से बच सकते हैं.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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