मौत पर चर्चा करने से क्यों लगता है डर?

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मौत का ज़िक्र होते ही, हम सब चुप हो जाते हैं. कोई मौत के बारे में बात भी करता है तो लोग उसे रोकते हैं.

कहते हैं कि ये क्या मरने-मारने की बुरी बात ले बैठे.

ज़िंदग़ी की बात करो, ज़िंदादिली की बात करो. मौत का नाम आते ही लोगों से भरे कमरे में सन्नाटा पसर जाता है. जबकि मौत तय है.

ज़िंदगी में एक यही चीज़ है जो तय है. बाक़ी सब अनिश्चित है.

हम मौत के बारे में इसलिए बात करने से बचते हैं क्योंकि इसे हमारे डर की निशानी माना जाता है.

कहा जाता है कि हम अभी से मरने को लेकर ख़ौफ़ज़दा हैं. इसीलिए, अब मौत के बारे में बात करने का चलन बढ़ रहा है.

साल 2004 में स्विटज़रलैंड में खुला था 'डेथ कैफ़े'. जहां लोग केक-पेस्ट्री खाते हुए, कॉफ़ी पीते हुए मौत पर चर्चा कर सकते थे.

अब दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी ऐसे 'डेथ कैफ़े' खुल रहे हैं. लोग अब मौत पर बात करने में कम हिचक रहे हैं.

पहला सवाल तो ये कि आख़िर हम मौत के किस पहलू से ज़्यादा घबराते हैं? इसका जवाब कई लोगों ने तलाशने की कोशिश की.

वो बताते हैं कि हम अपनी मौत से ज़्यादा अपनों की मौत को लेकर डर महसूस करते हैं.

दूसरी बात ये कि हम मरने की प्रक्रिया, इस दौरान होने वाले दर्द और अकेलेपन को लेकर ज़्यादा ख़ौफ़ खाते हैं.

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किसी से भी सवाल कीजिए कि क्या वो मौत से डरता है. तो, ज़्यादातर लोग इससे इनकार करते हैं.

बहुत कम लोग हैं जो मौत से बहुत ज़्यादा घबराते हैं. इनके दिमाग़ी इलाज करवाने का मशविरा दिया जाता है.

हमारी, मौत को लेकर ज़्यादा फ़िक्र न जताने की आदत असल में हमारे भीतर का डर छुपाने की कोशिश होती है.

इस बारे में 200 से ज़्यादा तजुर्बे किए गए हैं. जिसमें लोगों को कहा गया कि वो ख़ुद को मरते हुए देखने के बारे में सोचें.

ऐसा प्रयोग अमरीका में सबसे पहले हुआ. जिसमें कुछ जजों को ख़ुद को मरते हुए देखने की कल्पना करने को कहा गया.

इस दौरान उन्हें ये भी कहा गया वो किसी अपराधी की ज़मानत के लिए शर्तें भी तय करें.

ये देखा गया कि जिन्हें मरने के बारे में सोचने को कहा गया था, उन्होंने ज़मानत के लिए कड़ी शर्तें रखीं.

इससे साफ़ है कि मरने की कल्पना करने से हमारी सोच बेहद सख़्त हो जाती है.

मौत की सोच जब हमारे दिमाग़ पर हावी होती है, तो हममें देशभक्ति का भाव भी जग जाता है.

हम दूसरे धर्म और जाति के लोगों के प्रति कठोर रवैया अख़्तियार कर लेते हैं.

इसी तरह की और ओछी बातें हमारे दिमाग़ में आने लगती है.

कुल मिलाकर, जब हम मरने की सोचते हैं, तो अपने माहौल, अपनी जाति, अपने देश से ज़्यादा नज़दीकी मालूम होने लगती है.

दिलचस्प बात ये है कि मौत का ख़्याल हमारी विचारधारा पर भी असर डालता है.

जैसे की अगर हम कट्टरपंथी हैं, तो हमारी राय और पुख़्ता हो जाती है. अगर आज़ाद ख़्याल हैं तो हमारी सोच और खुली हो जाती है.

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धार्मिक सोच वाले हैं तो धर्म में हमारा यक़ीन बढ़ जाता है.

आख़िर ऐसा क्यों होता है?

जानकार कहते हैं कि मौत की चेतावनी, हमें अमरत्व तलाशने की ओर धकेलती है.

हम चाहते हैं कि हमारी सोच, हमारा किरदार, हमारे मरने के बाद भी क़ायम रहे.

इसीलिए हम उन लोगों से नज़दीकी चाहते हैं जो हमारे जैसे हैं. इसीलिए देशभक्ति का ज़ज़्बा उमड़ने लगता है.

बहुत से धर्मों में अमरत्व के सिद्धांत को अच्छा ख़ासा मक़ाम हासिल है.

इसी वजह से मरने की सोच से हम अपने धर्म की तरफ़ खिंचाव महसूस करते हैं.

मौत की चेतावनी मिलते ही लोगों का दिमाग़ शोहरत हासिल करने के नुस्ख़े तलाशने लगता है.

उन्हें अपने बाल-बच्चों की फ़िक्र होने लगती है. असल में लोग मरने के बाद अपने काम की वजह से याद किए जाते हैं.

इसीलिए वो शोहरत में अमरत्व तलाशते हैं. इसी तरह मरने के बाद भी इंसान का डीएनए हमारे बाल-बच्चों में ज़िंदा रहता है.

तो लोगों को मरते के ख़्याल से औलाद की फ़िक्र होती है.

अक्सर पूछे जाने पर हम ख़ुद से या दूसरों से यही कहते हैं कि हमें मौत का कोई ख़ौफ़ नहीं.

न हमें ये मालूम होता है कि मौत का ख़्याल हमारी सोच पर कितना बड़ा असर डालता है.

कैसे, मौत की चेतावनी से तमाम चीज़ों के बारे में हमारी राय बदलती है.

हम ख़ुद के बारे में ये नहीं बता सकते कि भविष्य में किसी ख़ास हालात में हमारा बर्ताव कैसा होगा.

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किसी ख़ास घटना पर हम कैसे रिएक्ट करेंगे. ऐसे में, जब मौत सामने खड़ी होगी, तो, हम क्या सोचेंगे, क्या करेंगे, ये सही-सही अंदाज़ा लगा पाना बेहद मुश्किल है.

इसीलिए, मौत की चर्चा करना, बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसा है. जैसा कि रिसर्च से मालूम हुआ है.

मौत की चर्चा करने से हमारी सोच और सख़्त हो जाती है. हम अपने से अलग लोगों के बारे में बुरा सोचने लगते हैं.

तो, डर इस बात का है कि जब 'डेथ कैफ़े' में बैठकर हम मौत की चर्चा करेंगे, तो हमारी सोच कट्टरपंथी होती जाएगी.

ऐसे में होना तो यही चाहिए कि हम बुजुर्गों की राय मानें और मौत के मुद्दे को दबा-ढंका ही रहने दें. जब आनी होगी आएगी.

लेकिन, इसके उलट मनोवैज्ञानिक अलग सलाह देते हैं.

वो कहते हैं कि 'एक्सपोज़र थेरेपी' में लोगों का उस चीज़ से बार-बार सामना कराया जाता है जिससे वो डरते हैं.

जैसे कोई ख़्वाब, कोई इंसान, या कोई जानवर. धीरे-धीरे लोगों का उस चीज़ से डर दूर हो जाता है

तो, शायद 'डेथ कैफ़े' भी मौत को लेकर हमारा डर दूर कर सकें. कोशिश करने में क्या हर्ज़ है?

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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