क़यामत से बचने के लिए क्या करेंगे?

  • 29 मई 2016
धरती से एस्टेरॉ़यड की टक्कर इमेज कॉपीरइट Getty

कभी आपने सोचा है कि हमारी धरती से एस्टेरॉ़यड टकरा जाए तो क्या होगा? अंतरिक्ष यात्राओं से जुड़े देश मानते हैं कि हमें इसे धरती से टकराने से रोकना होगा. अगर हम ऐसा नहीं कर पाए तो क़यामत का आना तय है.

एस्टेरॉयड धरती से न टकराए इसके लिए सबसे पहले तो मालूम करना होगा कि इसे रोकने के लिए हमारे पास कितना वक़्त है. फिर रोकने का तरीक़ा ढूंढना होगा. अंतरिक्ष से आकर धरती से टकराने वाली किसी चीज़ को रोकना इतना आसान काम नहीं.

वैसे तो एस्टेरॉयड के धरती से टकराने की घटना बहुत कम होती है. पिछली बार ऐसी घटना आज से क़रीब 108 साल पहले 1908 में रूस के तुंगुस्का नाम के इलाक़े में हुई थी.

यहां एक एस्टेरॉयड धरती से क़रीब दस किलोमीटर ऊपर धमाके के साथ बिखर गया था. साइबेरिया जैसे सुनसान इलाक़े में बिखरने के बावजूद काफ़ी नुक़सान हुआ था.

अगर ये एस्टेरॉयड चार या पांच घंटे बाद धरती के वातावरण से टकराया होता तो रूस का बड़ा शहर सेंट पीटर्सबर्ग तबाह हो गया होता. मंज़र कुछ यूं होता कि जैसे वहां बड़ा एटम बम गिरा दिया गया हो.

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हाल में इस तरह की घटना साल 2013 में हुई थी. रूस के चेलियाबिंस्क शहर में एक छोटा सा उल्कापिंड टूटकर बिखर गया था.

ये घटना धरती से क़रीब तीस किलोमीटर ऊपर हुई थी. लेकिन इसका असर ऐसा था कि घरों की खिड़कियां टूट गई थीं. यही नहीं, क़रीब 1400 लोग घायल हो गए थे.

उल्कापिंड में 500 किलोटन यानी हिरोशिमा पर गिराए गए एटम बम जैसे लगभग तीस बमों के बराबर विस्फोट हुआ.

इस तरह की घटनाएं वैसे तो आम हैं लेकिन समंदर के ऊपर या सुनसान इलाक़ों में होने के कारण इनके बारे में ज़्यादा पता नहीं चल पाता.

साल में ऐसा क़रीब तीन बार होता है जब कोई उल्कापिंड आसमान में उड़ते हुए धरती के वायुमंडल में घुस आता है और टक्कर के बाद धमाके के साथ बिखर जाता है.

लेकिन कोई एस्टेरॉयड यदि धरती से टकरा जाए तो इसका असर ज़्यादा भयानक होगा.

ऐसा होने की सूरत में इसे कैसे रोका जाए, इसके बारे में कई देशों की सरकारें काफ़ी गंभीर हैं. यह टकराव पूरी मानवता का सफाया कर सकती हैं.

अभी इसी साल जनवरी में अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 'प्लैनेटरी डिफेंस को-ऑर्डिनेशन ऑफिस' या पीडीसीओ के नाम से एक नया दफ़्तर खोला है.

ये दूसरे देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ मिलकर एस्टेरॉयड के धरती से टकराने की आशंकाओं की पड़ताल करेगी और इनकी रोकथाम के तरीक़े तलाशेगी.

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इन दिनों पीडीसीओ का मुख्य काम अंतरिक्ष में तैर रहे उन एस्टेरॉयड का पता लगाना है जो भविष्य में कभी धरती से टकरा सकते हैं. कई और अंतरिक्ष एजेंसियां भी ये काम कर रही हैं.

इसीलिए पीडीसीओ इन सभी के बीच तालमेल बिठाने का काम भी कर रहा है.

पीडीसीओ से जुड़े नासा के लिंडले जॉनसन कहते हैं कि हम अंतरिक्ष में यूं ही घूम रही चट्टानों से तब तक नहीं निपट सकते जब तक हमें यह पता न हो कि आख़िर वो हैं कहां? उनसे धरती को कितना ख़तरा है? जब किसी ऐसीे एस्टेरॉयड का पता चल जाता है तो फिर उसे रोकने की असली योजना पर काम शुरू होगा.

किसी एस्टेरॉयड को धरती से टकराने से रोकने का सबसे आसान तरीक़ा है उसे किसी चीज़ से धकेलकर उसका रास्ता बदलना. ताकि वो धरती की कक्षा में घुसे ही नहीं. इससे टक्कर होने से बच जाएगी.

इसके लिए कोई अंतरिक्ष यान भेजकर एस्टेरॉयड को धक्का मारा जाएगा. जैसे कि हम बिलियर्ड्स के खेल में इसकी गेंद को टक्कर मारते हैं.

नासा मिशन और यूरोपीय स्पेस एजेंसी मिलकर इस तरह की तकनीक को अगले कुछ सालों में लाएंगे, नाम होगा एस्टेरॉयड इम्पैक्ट ऐंड डिफ्लेक्शन एसेसमेंट (एआईडीए).

इस मिशन में दो अंतरिक्ष यान भेजे जाएंगे. पहले का नाम होगा एस्टेरॉयड इम्पैक्ट मिशन (एआईएम). जो 2020 में अंतरिक्ष में भेजा जाएगा. वहीं दूसरे स्पेसक्राफ्ट का नाम होगा डबल एस्टेरॉयड रिडायरेक्शन टेस्ट (डीएआरटी). इसे 2012 में अंतरिक्ष में भेजा जाएगा.

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दोनों ही स्पेक्राफ्ट 2022 में एक जुड़वां एस्टेरॉयड तक पहुचेंगे. इनमें से एक का नाम है 65803 डिडीमॉस. जबकि दूसरे का नाम है डिडीमून. डिडीमॉस 780 मीटर लंबी चौड़ी एस्टेरॉयड है.

वहीं डिडीमून 170 मीटर की है. डिडीमून, डिडीमॉस का चक्कर लगाती है. एक चक्कर 11.9 घंटों में पूरा होता है. दोनों एक दूसरे से केवल 1100 मीटर दूर हैं.

जब डार्ट अंतरिक्ष यान इन तक पहुंचेगा तो ये डिडीमून से टकराया जाएगा. वैज्ञानिकों का मक़सद ये देखना है कि इस टक्कर से क्या डिडीमून के चक्कर लगाने की कक्षा बदलती है? वहीं एआईएम अंतरिक्ष यान इस टक्कर से होने वाले असर की पड़ताल करेगा.

इसे बेहतर तरीक़े से समझने के लिए आपको अमरीका के एरिज़ोना में उल्कापिंड गिरने से जो गड्ढे बना, उसके बारे में बताते हैं.

वैज्ञानिक मानते हैं कि यह गड्ढा, डिडीमून एस्टेरॉयड के आकार से महज़ एक तिहाई साइज़ के उल्कापिंड के गिरने से बना था.

अगर डिडीमॉस के आकार की एस्टेरॉयड धरती से 15.5 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ़्तार से टकराती है तो इससे न्यूयॉर्क जैसा बड़ा शहर मिनटों में तबाह हो जाएगा.

अपनी पूरी रफ़्तार यानी 34.6 किलोमीटर प्रति सेकेंड की स्पीड से टकराने पर ये चार मेगाटन के एटम बम के बराबर ताक़त पैदा करेगी.

नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी के मिशन से जुड़े फ्रेंच वैज्ञानिक पैट्रिक मिशेल कहते हैं डिडीमून की रफ़्तार सिर्फ़ 19 सेंटीमीटर प्रति सेकेंड है. इसलिए इसमें ज़रा सा फ़र्क़ भी पकड़ में आ जाएगा.

इसीलिए इसे ये पता लगाने के लिए चुना गया है कि अगर कोई अंतरिक्ष यान एस्टेरॉयड से टकराया जाता है तो उसकी कक्षा में कितना बदलाव आता है.

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फिर यह देखना भी ज़रूरी है कि इसका कोई असर पड़ता भी है या नहीं. नासा के वैज्ञानिक लिंडले जॉनसन मानते हैं कि एस्टेरॉयड के ख़तरे से निपटने का यह सबसे पक्का तरीक़ा है. क्योंकि इस तकनीक को आज़माकर एक अंतरिक्ष यान रोज़ेटा नाम के धूमकेतु से टकराया जा चुका है.

मगर इस मिशन की सबसे बड़ी दिक़्क़त, इसमें लगने वाला वक़्त है. किसी स्पेसक्राफ्ट के धरती से बाहर की कक्षा में पहुंचने के लिए चार साल लग जाते हैं. फिर ये यान किसी एस्टेरॉयड तक पहुंचने के लिए एक साल का वक़्त और लेगा. अगर हमारे पास टक्कर रोकने के लिए वक़्त कम है, तो ये तरीक़ा बेकार है.

कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक किचेंग झैंग कहते हैं कि हम एस्टेरॉयड को लेज़र तकनीक से धरती से टकराने से रोक सकते हैं.

लेज़र गन की मदद से किसी एस्टेरॉयड पर लेज़र की बारिश की जाएगी. इससे उसका एक हिस्सा उड़ जाएगा और उसकी रफ़्तार बदलेगी. ऐसा होगा तो वो धरती से दूर चली जाएगी.

हालांकि सुनने में ये तरीक़ा भले ही सही न लगे. मगर लेज़र की मदद से एस्टेरॉयड की कक्षा में बदलाव हो सकता है. झैंग कहते हैं कि एक बड़ी लेज़र गन अंतरिक्ष में आसानी से बनायी जा सकती है.

वो कहते हैं कि एक गीगावाट की लेज़र से अगर एक महीने तक किसी एस्टेरॉयड पर लेज़र की बारिश की जाए तो वो तुंगुस्का से टकराने वाली एस्टेरॉयड के बराबर की किसी चीज़ को धरती से क़रीब आठ हज़ार मील दूर धकेल सकती है.

वैसे झैंग एक दूसरा तरीक़ा भी सुझाते हैं. किसी स्पेसक्राफ्ट से लेज़र को किसी एस्टेरॉयड के पास भेजा जाए. लेकिन इसमें पंद्रह साल तक का वक़्त लग सकता है. इतने में तो बहुत देर हो जाएगी.

हालांकि नासा वैज्ञानिक लिंडले जॉनसन कहते हैं कि एक किलोमीटर लंबी लेज़र को अंतरिक्ष में भेजना बेहद मुश्किल है.

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धरती की तरफ़ तेज़ी से आ रहे किसी एस्टेरॉयड को रोकने का तीसरा तरीक़ा इस पर एटमी मिसाइल छोड़ना हो सकता है. हम हॉलीवुड की फिल्मों, 'आर्मागेडॉन' या 'डीप इम्पैक्ट', में इस नुस्खे को आज़माते हुए देख चुके हैं. मगर वो फ़िल्में थीं.

वैज्ञानिक कहते हैं कि यह तरीक़ा अमल में लाना बहुत मुश्किल है. स्कॉटलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ स्ट्रैथक्लाइड के मैसिमिलियानो वासील कहते हैं कि फ़िल्मों की बात अलग है. हां, हम किसी एस्टेरॉयड से कुछ दूरी पर एटमी विस्फोट का तरीक़ा आज़मा सकते हैं. लेज़र हमले की तरह इसका मक़सद भी एस्टेरॉयड के एक हिस्से को उड़ाकर इसकी रफ़्तार और कक्षा बदलना है.

अगर एस्टेरॉयड धरती के क़रीब है तो लेज़र और एटमी हमले से इसकी रफ़्तार और इसका रुख़ बदलना आसान है. मगर इसका अलग-अलग एस्टेरॉयड पर अलग-असर होगा. कुछ तो चट्टानों के बने होते हैं. कुछ सिर्फ़ धूल-मिट्टी के बने होते हैं. जो एक ही झटके में उड़ जाएंगे. फिर इन टुकड़ों के टकराने का डर होगा.

वैसे इनमें से किसी भी तरीक़े को आज़माने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा राजनीति है. 1967 की 'आउटर स्पेस ट्रीटी' के मुताबिक़ अंतरिक्ष में एटमी हथियारों के इस्तेमाल पर रोक है. कुछ देशों को अंतरिक्ष में लेज़र लगाने पर भी ऐतराज़ हो सकता है.

मान लीजिए अगर किसी एस्टेरॉयड के न्यूयॉर्क शहर से टकराने का डर हो और नासा उस पर लेज़र से हमला करके उसकी कक्षा बदलने की तैयारी करे तो यूरोप को इससे दिक़्क़त हो सकती है. क्योंकि कक्षा में मामूली बदलाव से एस्टेरॉयड न्यूयॉर्क के बजाय लंदन से टकरा सकती है.

हालांकि सभी जानकार ये मानते हैं कि धरती पर अंतरिक्ष से आने वाले किसी बड़े ख़तरे को देखकर इंसान आपसी मतभेद भुला देगा. सब मिलकर उसका सामना करेंगे. आख़िर क़यामत किसी देश या जाति-धर्म को देखकर तो नहीं आएगी.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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