आपकी आंखों में क्यों आंसू आते हैं?

क्या आपको पता है कि आप क्यों रोते हैं? कम रोते हैं या ज़्यादा रोते हैं. कुछ लोग बातों की वजह से रोने लगते हैं. तो कुछ फ़िल्में देखकर आंसू बहाते हैं. सबके रोने की वजह अलग-अलग होती है. तो आप किस दर्जे में आते हैं? आख़िर आपकी आंखों में क्यों आंसू आते हैं?

बहुत सी फ़िल्में होती हैं जो लोगों को रुलाने के लिए बनती हैं. मसलन, केविन कोस्टनर की फ़िल्म, 'फील्ड ऑफ ड्रीम्स'. जिसमें एक बेसबाल खिलाड़ी को जन्नत से वापस लाने के लिए केविन कोस्टनर अपने मक्के के खेत के बीच में बेसबाल पिच बनाते हैं. लेकिन वहां उनकी अपने पिता से मुलाक़ात होती है, वो भी जवानी के दिनों में.

बहुत से लोग ये फ़िल्म देखकर रोते हैं. मैं हॉलीवुड फ़िल्म 'द फ़ोर्स अवेकेन्स' देखने के लिए अपनी बेटी के साथ गया था. पूरी फ़िल्म में मैं अपनी दस साल की बेटी का हाथ पकड़कर रोता रहा.

वैसे आम तौर पर मर्दों का रोना ख़राब माना जाता है. मगर बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो बहुत रोते हैं. ख़ुद को रोता हुआ देखकर हुए मैंने रोने की वजह की पड़ताल करनी शुरू कर दी.

पहला सवाल तो ये कि अगर मर्द कम रोते हैं तो इसकी क्या वजह है? रोने से क्या फ़ायदा होता है? और सबसे बड़ा सवाल ये कि आख़िर इंसान रोते ही क्यों हैं?

वैसे तमाम तजुर्बे ये साबित करते हैं कि मर्दों के मुक़ाबले औरतें ज़्यादा रोती हैं. मनोवैज्ञानिक विलियम फ्रे के 1982 के रिसर्च के मुताबिक़, महिलाएं औसतन महीने में पांच से ज़्यादा बार रोती हैं. वहीं उनके मुक़ाबले महीने में रोने का मर्दों का औसत डेढ़ बार भी नहीं है. जब कोई महिला रोती है तो औसतन पांच से छह मिनट रोती है. उनके मुक़ाबले आदमी रोने में दो से तीन मिनट ही ख़र्च करते हैं.

हॉलैंड के मनोवैज्ञानिक एड विंगरहोएट्स ने रोने पर ख़ूब रिसर्च की है. वो बताते हैं कि औरतों और मर्दों के बीच रोने का ये फ़र्क़ बचपन से ही आ जाता है. हालांकि जब बच्चा पैदा होता है तो लड़की हो या लड़का, दोनों ही बराबर रोते हैं. नवजात बच्चे इसलिए रोते हैं ताकि अपने मां-बाप का ध्यान अपनी तरफ़ खींच सकें. वैसे हम आपको ये कोई नई बात नहीं बता रहे.

फिर आख़िर क्या होता है कि बड़े होने पर औरतों और मर्दों के रोने में इतना फ़र्क़ आ जाता है. इसमें अलग अलग समाज के माहौल का भी असर पड़ता है. जहां पर रोने को बुरा नहीं मानते, उन देशों में लोग ख़ूब रोते हैं. वहीं जहां रोना बुरा माना जाता है वहां पर, लोग कम रोते हैं. विंगरहोएट्स के रिसर्च में एक और दिलचस्प बात सामने आई है. वो ये कि अमीर देशों में लोग ज़्यादा रोते हैं.

हालांकि विंगरहोएट्स ये मानते हैं कि समाज के साथ साथ टेस्टोस्टेरोन नाम के हारमोन का भी हमारे रोने से गहरा ताल्लुक़ है. वो ये बताते हैं कि प्रोस्टेट कैंसर के शिकार लोगों को इलाज के वक़्त जो दवाएं दी जाती हैं. उनसे टेस्टोस्टेरोन कम निकलता है. इसी वजह से प्रोस्टेट कैंसर के मरीज़ ज़्यादा रोते हैं.

हालांकि आप ये भी कह सकते हैं कि वो इसलिए ज़्यादा रोते हैं क्योंकि उन्हें कैंसर हो गया होता है.

मगर, सवाल वही है, हम क्यों रोते हैं? तो इसका जवाब ये है कि हमें नहीं पता!

तमाम जीवों में इंसान ही है जो इमोशनल होकर रोता है. पहले कहा जाता था कि हाथी भी रोते हैं. मगर अब तक इसका कोई पक्का सबूत नहीं खोजा गया है. हमें नहीं पता कि हम तकलीफ़ में भी रोते हैं और कई बार ख़ुशी में भी हमारे आंसू निकल आते हैं.

कुछ लोग कहते हैं कि इंसान सामाजिक प्राणी है. इसलिए कई बार वो रोकर अपने एहसास बयां करता है. मगर, इसका भी कोई पक्का सुबूत नहीं.

शायद ज़रूरत से ज़्यादा इमोशनल हो जाने पर लोग रोने लगते हैं. विंगरहोएट्स अपने तजुर्बे से बताते हैं कि लोग रोने के बाद बेहतर महसूस करते हैं. 2015 में उन्होंने कुछ लोगों से कुछ ख़ास फ़िल्में देखने को कहा.

फ़िल्म देखने से पहले का उनका मूड पूछा गया. फिर फ़िल्म देखने के बाद के उनके एहसास बयां करने को कहा गया. इनमें से एक बहुत ही इमोशनल फ़िल्म थी. तो दूसरी कॉमे़डी फ़िल्म. फ़िल्म देखने के बीस मिनट बाद लोगों से एक फॉर्म भराया गया. यही फॉर्म उनसे दो घंटे बाद भी भरने को कहा गया.

इस तजुर्बे के नतीजे एकदम साफ़ थे. जो लोग फ़िल्म देखते वक़्त नहीं रोए. उनकी दिमाग़ी हालत में कोई फ़र्क नहीं दिखा. वहीं रोने वालों के फॉर्म में बीस मिनट बाद और दो घंटे बाद के हालात में काफ़ी बदलाव दिखा. वो रोने के बाद अच्छा महसूस कर रहे थे.

कुल मिलाकर, रोने का रहस्य अभी भी रहस्य ही है. इस पर अभी और रिसर्च की ज़रूरत है. शायद तब हमें रोने की वजह मालूम हो. तब तक, जब जी चाहे रोइए. इससे आप बाद में बेहतर ही महसूस करेंगे.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)