'चाय में चीनी से पता चलती है आपकी हैसियत'

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अंग्रेज़ों को चाय बहुत पसंद है. कहते हैं कि हर साल ब्रिटेन के लोग क़रीब 60 अरब कप चाय पी जाते हैं. इसका औसत बैठता है 900 कप चाय सालाना. ये औसत बड़े-बूढ़ों और बच्चों सबको मिलाकर होता है.

इनमें से कुछ बच्चे तो ऐसे होंगे जो चाय नहीं पीते होंगे. अब इसी से आप अंदाज़ा लगा लीजिए कि अंग्रेज़ औसतन कितनी चाय एक दिन में सुड़क जाते होंगे.

किसी को दूध वाली चाय पसंद है, तो किसी को लेमन टी, किसी को सादी चाय से प्यार है तो कोई बिना चीनी वाली चाय पीता है. मगर ब्रिटेन में चाय जमकर पी जाती है, ये बात तय है.

आज चाय अंग्रेज़ों के रहन-सहन का अटूट हिस्सा बन गई है. सुबह की चाय, दोपहर बाद की चाय. काम से उकताहट होने पर होने वाला टी ब्रेक. लॉन में बैठकर सुकून से चाय का लुत्फ़ लेते हैं लोग और दफ़्तर में सूट बूट में बैठे हुए भी चाय सुड़कते हैं. यहाँ छोटे-बड़े रेस्तरां, घरों और आलीशान होटलों में, आपको चाय हर जगह मिल जाएगी .

आख़िर चाय में ऐसी क्या बात है कि अंग्रेज़ उसके इतने बड़े शैदाई बन गए हैं? और क्या आपको पता है कि आप जिस तरह की चाय पीते हैं, उससे आपके किरदार के बारे में बहुत सी बातें पता चल जाती हैं?

चाय का स्वाद इस बात पर निर्भर करता है कि वो कैसे उगाई जाती है, फिर कैसे उसे तैयार किया जाता है और आख़िर में चाय बनाई कैसे जाती है?

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चाय के पौधे का वैज्ञानिक नाम कैमेलिया साइनेसिस है. ये गर्म, बारिश वाले इलाक़ों में उगती है. अगर इस पौधे से ग्रीन टी तैयार की जानी है तो इसे छाया में उगाना होगा. इसके ऊपर जाली लगानी होगी. ताकि सूरज की रोशनी कम होने पर इसकी पत्तियाँ ज़्यादा क्लोरोफिल पैदा करेंगी. सूरज की रौशनी कम होने पर चाय के पौधे में पॉलीफिनॉल नाम का केमिकल भी कम निकलता है, जिससे चाय में हल्का कसैला स्वाद आता है. वैसे कुछ लोगों को ये स्वाद भी पसंद आता है.

चाय की पत्तियां और कलियाँ तोड़कर पहले इन्हें सुखाया जाता है. इन्हें कितना सुखाया जाएगा, ये इस बात पर तय होता है कि किस तरह की चाय आपको चाहिए. ग्रीन टी बनानी है तो पत्तियों को सिर्फ़ एक दिन सुखाकर उन्हें भाप में पकाया जाता है.

अगर चाय की पत्ती को कुछ दिन सुखाकर उसे हल्का सा तोड़कर भाप में उबालकर ब्लैक टी तैयार होती है. यही चाय दुनिया में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल की जाती है. कुल चाय की खपत का 78 फ़ीसद ब्लैक टी होती है. इस चाय को काफ़ी दिनों तक सुखाया जाता है. फिर इसकी पत्तियाँ हल्की सी तोड़कर भाप में पकाई जाती हैं.

जब चाय की पत्ती सूख रही होती है, वैसे ही इसमें पाये जाने वाले एंजाइम, दूसरे केमिकल में तब्दील होते हैं. जितना ज़्यादा समय तक इसे सुखाया जाएगा, उतना ही इसके एंजाइम काम करते हैं और उतने ही नए तरह के रसायन इसमें बनते हैं. इनमें सबसे मशहूर है थियाफ्लेविन. इससे चाय का काला रंग आता है और हल्का कसैला स्वाद भी इसी केमिकल की वजह से आता है.

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सूखने और पकाने की प्रक्रिया के दौरान चाय की पत्ती में कई तरह के केमिकल बनते हैं. इन्हीं से चाय का अलग-अलग स्वाद आता है. हालाँकि बहुत से केमिकल ऐसे भी हैं, जिनके असर और जिनकी ख़ूबी का पता लगना बाक़ी है.

जैसे-जैसे लोगों के बीच चाय का शौक़ बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इसके फ़ायदे समझने की कोशिश बढ़ रही है. मगर बरसों के रिसर्च के बाद भी चाय के फ़ायदे और नुक़सान को लेकर मिली-जुली बातें ही सामने आई हैं.

उबली हुई चाय में कैफ़ीन की काफ़ी तादाद होती है. जितनी एक कप कॉफ़ी में होती है, उसकी आधी एक कप चाय में होती है. इससे आपकी दोपहर की नींद भाग सकती है. कई लोग कहते हैं कि चाय पीने से कॉफ़ी से ज़्यादा चौकन्नापन आता है. इसकी वजह है थियानाइन नाम का अमीनो एसिड. ये चाय में ही पाया जाता है. जब लोग चाय और कॉफ़ी दोनों साथ पीते हैं तो ज़्यादा सजग रहते हैं.

अब सवाल उठता है कि अंग्रेज़ों को चाय इतनी पसंद क्यों है? और अलग-अलग तरह की चाय पीने से आपके ऊपर क्या असर पड़ता है?

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मशहूर मानवशास्त्री केट फॉक्स ने अपनी क़िताब, 'वाचिंग द इंग्लिश' में इस बारे में काफ़ी कुछ लिखा है. वो कहती हैं कि कड़क ब्लैक टी अक्सर कामगार लोग पीते हैं. जैसे-जैसे समाज के ऊंचे दर्जे के लोगों की चाय को देखते हैं, उसका स्वाद हल्का होता जाता है.

इसी तरह दूध और चीनी का चाय में अपना रोल होता है. चाय में चीनी डालकर पीने का मतलब होता है कि ऐसे लोग समाज के निचले तबक़े से आते हैं. यहाँ तक कि कम चीनी वाली चाय पीने का मतलब भी यही निकाला जाता है. अगर आप चाय में चीनी डालकर पीते हैं तो इस तरह की चाय से आप हद से हद निम्न मध्यम वर्ग के माने जा सकते हैं. अगर आप दो चम्मच चीनी चाय में डालते हैं तो आप कामगार तबक़े से आते हैं. बिना चीनी और दूध वाली लैपसैंग सोउचॉन्ग चाय पीने का मतलब है कि आप मध्यम वर्ग से आते हैं और ऊंचे तबक़े के दिखने की कोशिश कर रहे हैं.

अंग्रेज़ चाय को ऐतिहासिक वजहों से पसंद करते हैं. जानकार कहते हैं कि खाने-पीने की आदतें आपके माहौल की वजह से पड़ती और बदलती हैं. आप जिन चीज़ों को पसंद करते हैं, वो इसलिए नहीं कि वह आपको पसंद हैं. बल्कि ऐसा इसलिए होता है कि आपके माहौल में वो चीज़ें मिली जुली हैं. वैसे कई लोग नई-नई चीज़ें खाने-पीने की आदतें भी डाल लेते हैं.

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कुल मिलाकर खान-पान और रहन-सहन, आपके माहौल पर निर्भर करता है.

केट फॉक्स कहती हैं कि चाय, अंग्रेज़ों के लिए मुश्किल हालात से निकलने का ज़रिया है. जब भी अंग्रेज़ ख़ुद को किसी नाज़ुक हालत में पाते हैं, वो चाय बनाने लगते हैं और ऐसा उनके साथ अक्सर होता है. कई बार चाय पीते हुए नए रिश्ते भी बनते हैं.

दिलचस्प बात ये है कि चाय में मिलने वाले कई केमिकल, इसे चिड़ियों, कीड़ों और दूसरे जानवरों का चारा बनने से बचाते हैं. अक्सर इंसान भी इनसे बचने की जुगत लगाता रहता है. तो शायद हम चाय पीकर नींद के साथ-साथ इन जानवरों को भी ख़ुद से दूर भगाते हैं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

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