इन टैंकों से जीते गए युद्ध

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दूसरे विश्वयुद्ध से जुड़ी बहुत सी कहानियां आपने सुनी होंगी. आज आपको उस महायुद्ध की एक बेहद दिलचस्प कहानी सुनाते हैं. ये कहानी एक सनकी जनरल और उसके पागलों जैसे आइडिया की है.

1939 में विश्व युद्ध शुरू होते ही जर्मनी ने फ्रांस पर कब्ज़ा कर लिया था. ख़तरा ब्रिटेन के दरवाज़े तक आ गया था. ब्रिटेन और अमरीका के नेता चाहते थे कि जल्द से जल्द फ्रांस को हिटलर के कब्ज़े से आज़ाद कराया जाए. मगर हिटलर की सेनाओं ने पश्चिमी यूरोप में इतनी ज़बरदस्त मोर्चेबंदी कर रखी थी कि ब्रिटेन और उसके सहयोगी देशों की हर कोशिश नाकाम हो रही थी.

19 अगस्त 1942 को मित्र देशों की सेनाओं ने फ्रांस पर हमला बोला. इरादा था समंदर के रास्ते अपनी फौजी टुकड़ियां फ्रांस में उतारना और जर्मन सुरक्षा की दीवार को भेदना. ब्रिटेन और कनाडा की फौजी टुकड़ियां डिपे नाम की जगह पर उतरीं. मगर वो इस मिशन में बुरी तरह नाकाम रहे. दस घंटे के अंदर, छह हज़ार में से अस्सी फ़ीसद सैनिक या तो मारे गए थे, या फिर पकड़े गए.

इस मिशन में नाकाम रहने के बाद, अगले दो साल तक ब्रिटिश कमांडर, फ्रांस की घेरेबंदी वाली जर्मन दीवार लांघने की सोच भी नहीं सके.

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लेकिन एक ब्रिटिश जनरल ऐसे थे, जिनके पास था हिटलर की सुरक्षा दीवार को भेदने का नुस्खा. उनका नाम था पर्सी होबार्ट. पर्सी ने पहले विश्व युद्ध में भी हिस्सा लिया था. उन्होंने तब फ्रांस और इराक़ के मोर्चों पर जंग लड़ी थी.

पहले विश्व युद्ध में पहली बार टैंकों का इस्तेमाल किया गया था. लेकिन उनमें कई कमियां थीं. उनकी रफ़्तार धीमी थी. हालांकि कई मोर्चों पर उन्होंने ब्रिटिश सेनाओं को जीत दिलाई थी. इसीलिए होबार्ट को लगता था कि आगे कभी जंग हुई तो टैंक उनमें अहम रोल निभाएंगे.

पहला विश्व युद्ध ख़त्म होते ही पर्सी, टैंकों की टुकड़ियां बढ़ाने की वकालत करने लगे. वो ब्रितानी फौज की पहली टैंक कोर के इंस्पेक्टर बनाए गए. उनकी शोहरत इस क़दर थी कि मशहूर जर्मन कमांडर हाइंज गुडेरियन, पर्सी की रिपोर्ट को मंगाकर उनका अनुवाद कराके पढ़ा करते थे.

होबार्ट सोचते थे कि जैसे मध्य युग में मंगोल लड़ाके, तेज़ रफ़्तार से दुश्मन पर धावा बोलकर उसे तबाह कर देते थे, वैसे ही आज के दौर में टैंकों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

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लेकिन, अफ्रीका में एक फौजी टुकड़ी को ट्रेनिंग देने के बाद उन्हें ज़बरदस्ती रिटायर कर दिया गया. उसकी वजह, उनका ज़रूरत से ज़्यादा टैंकों की वकालत करना था. जब जर्मनी ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन पर हमला बोला, उस वक़्त पर्सी एक आम फौजी की तरह, ब्रिटेन के कॉस्टवोल्ड इलाक़े में तैनात थे.

जंग शुरू होते ही मशहूर ब्रिटिश कमांडर मॉन्टगोमरी ने पर्सी को बुलावा भेजा. इसके बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने पर्सी से मुलाक़ात की. इस मुलाक़ात के बाद पर्सी को उनका ओहदा वापस दिया गया. और टैंकों की लड़ाई के लिए ब्रिटिश फौजों को तैयार करने का ज़िम्मा सौंपा गया.

कई ब्रिटिश जनरलों को लगता था कि जर्मनी के कब्ज़े से फ्रांस को छुड़ाने का एक ही तरीक़ा है. समंदर के रास्ते धावा बोलना. मगर 1942 में ये कोशिश बुरी तरह नाकाम रही थी.

जर्मनों ने स्पेन से लेकर नॉर्वे तक समंदर के किनारे किनारे खेमेबंदी कर रखी थी. इसे अटलांटिक वॉल का नाम दिया गया था, जिसमें कंक्रीट के बने खेमे थे, खाइयां थीं, बड़ी बड़ी तोपें थीं. एंटी टैंक तोपें थीं और बारूदी सुरंगें भी बिछी हुई थीं.

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पहली बार मित्र देशों की सेनाएं 6 जून 1944 को फ्रांस के नॉर्मंडी नाम की जगह पर उतरीं. इसके साथ पांच और जगहों पर उन्होंने जर्मनी के सुरक्षा घेरे को भेदने में कामयाबी हासिल की. इनमें पर्सी की टैंक टुकड़ियों का बड़ा योगदान था. पर्सी ने टैंकों को अलग ही रंग रूप में ढाल दिया था, जिसकी वजह से इन्हें 'होबार्ट्स फनीज़' कहा जाता था.

इस बार मिशन बहुत कामयाब रहा था. होबार्ट को लगता था कि जर्मन सुरक्षा घेरे को तोड़ने के लिए बड़ी तादाद में टैंकों की ज़रूरत होगी. और वो सही सलामत फ्रांस पहुंच जाएं, इसके लिए उनमें बदलाव की ज़रूरत भी होबार्ट को लगती थी. फिर होबार्ट ने ये भी तय किया कि सारे टैंक एक ही रास्ते से न भेजे जाएं. उन्हें अलग-अलग हिस्सों में बांटकर फ्रांस में अलग अलग जगहों पर उतारा जाए.

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इसके लिए पर्सी होबार्ट ने ब्रिटेन के मशहूर शर्मन टैंकों में एक बड़ा बदलाव किया. उन्होंने इनमें कैनवस की चादरें जोड़ दी. इसकी वजह से जब ये टैंक पानी में होते थे तो ये काफ़ी हल्के होकर तैरने में कामयाब होते थे. इन्हें पानी वाला रास्ता पार करने में आसानी हो जाती थी.

फ्रांस में जिस दिन ब्रिटिश और कनाडाई-अमरीकी फौजी टुकड़ियां उतरीं, उसे डी डे कहा जाता है. उस दिन पर्सी की टैंक टुकड़ियों ने मित्र देशों की सेनाओं की जीत में बड़ा रोल निभाया.

ये टैंक समुद्री किनारों के क़रीब उतारे गए, जहां से ये पानी में तैरते हुए, फ्रांस की ज़मीन पर जा पहुंचे. अचानक इतने टैंक देखकर जर्मन फौजी हक्का-बक्का रह गए. ज़मीन पर पहुंचकर शर्मन डीडी टैंक अपनी कैनवस की चादरें समेटकर आम टैंकों की तरह जंग के मैदान में कूद पड़े.

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इन टैंकों के पीछे कुछ टैंक ऐसे भी थे, जिन्हें टैंक कहा ही नहीं जा सकता था. इनमें से एक था, जिसका नाम था क्रैब. ये भी शर्मन टैंक में हेरफेर करके बनाया गया था, जिसमें आगे की तरफ़ मूसल जैसी चीज़ लगी थी.

ये ज़मीन पर धमक पैदा करता चलता था. इसके शोर से ज़मीन में अगर कोई बारूदी सुरंग होती थी तो वो फट जाती थी. इस तरह पीछे आ रही फौजी टुकड़ियों का रास्ता साफ़ होता जाता था.

इसके अलावा ब्रिटिश टैंक चर्चिल में बदलाव करके पर्सी ने चर्चिल बॉबिन नाम का टैंक तैयार किया. इसमें कैनवस की लंबी सी चादर आगे की तरफ़ बिछ जाती थी, जब टैंक चलता था. इससे आगे का रास्ता साफ़ हो जाता था.

इसी तरह कुछ और चर्चिल टैंकों में बदलाव करके उन्हें शोर वाली बमबारी करने लायक़ बनाया गया था. इनसे, जो कंक्रीट के खेमे जर्मन सेनाओं ने बना रखे थे, उन्हें तोड़ने में मदद मिलती थी. इनकी गोलीबारी से कंक्रीट की दीवार में रास्ता निकल आता था. उनके ज़रिए मित्र देशों की फौजी टुकड़ियां जर्मन सुरक्षा घेरा भेदकर आगे बढ़ती थीं. इनके धमाकों से इतना शोर होता था कि जर्मन सैनिक घबरा जाते थे.

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इसी तरह कुछ टैंक, अपने साथ बेंत या छड़ियां लेकर चलते थे. कोई खाई होने की सूरत में वो इन्हें वहां गिरा देते थे. इससे पीछे से आ रहे टैंकों को खाई पार करने में दिक़्क़त नहीं होती थी.

जानकार कहते हैं कि होबार्ट की सबसे बड़ी ख़ूबी ये थी कि उन्हें किसी की बात सुनने, किसी का अच्छा आइडिया लेने में कोई दिक़्क़त नहीं थी. पुराने से पुराने नुस्खे को भी वो आज़माने को तैयार रहते थे. इसी वजह से उन्होंने टैंकों में कई तरह की तब्दीलियां करके उन्हें डी-डे के हमले के लिए तैयार किया. उनके बनाए हुए 'फनी टैंक' इस मिशन के लिए वरदान साबित हुए.

कई चर्चिल टैंकों को चौड़ी खाई पार करने के लिए पुल बनाने के काम में लगाया गया था. इसी तरह कुछ टैंकों में तब्दीली करके, उन्हें कंक्रीट की ऊंची दीवार पार करने में मददगार की तरह इस्तेमाल किया गया था. ये टैंक आगे जाकर दीवार से लगकर खड़े हो जाते थे. फिर दूसरे टैंक, इनके ऊपर से होकर गुज़र जाते थे. जैसे किसी आदमी के कंधे पर पांव रखकर कोई दूसरा, दीवार फांदे.

कुछ टैंकों को पर्सी ने बुल्डोज़र का रूप दे दिया था. ये रास्ते का कचरा हटाते चलते थे. पर्सी ने कुछ टैंकों में तब्दीली करके इन्हें 'क्रोकोडाइल' नाम दिया था. ये ड्रैगन की तरह आग उगलते थे. इनसे जान का कम नुक़सान होता था, मगर ये डर ख़ूब पैदा करते थे. इनकी मदद से रास्ता साफ़ करने में काफ़ी आसानी होती थी. कई बार तो ऐसा हुआ कि इन क्रोकोडाइल टैंकों ने आग उगली ही थी कि सामने खड़ी जर्मन टुकड़ियों ने सरेंडर कर दिया.

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डीडे के बाद भी मित्र देशों की सेनाओं ने पर्सी के तैयार किए हुए टैंकों का ख़ूब इस्तेमाल किया. ख़ास तौर से नॉरमंडी में संकरे मोर्चों पर लड़ाई में इनका ख़ूब इस्तेमाल हुआ.

पहले पहल तो अमरीकी सेनाओं ने इनके इस्तेमाल से इंकार कर दिया था. मगर बाद में अमरीकी सेनाओं ने भी पर्सी होबार्ट के 'फनीज़' का ख़ूब इस्तेमाल किया.

विश्व युद्ध के ख़ात्मे के वक़्त, पर्सी की बटालियन, यूरोप की सबसे बड़ी जंगी यूनिट बन गई थी.

इसमें पर्सी होबार्ट की सनक का बड़ा योगदान रहा, जिन्होंने वक़्त से बहुत आगे की सोची. उनके प्लान की मदद से ही मित्र देशों की सेनाएं, हिटलर पर आख़िरी वार कर सकीं. उनके बनाए कई डिज़ाइन के टैंकों का आज तक इस्तेमाल हो रहा है.

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