शिकारियों के ख़िलाफ़ इस शेरनी की जंग

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आज आपको दुनिया की अब तक की सबसे मशहूर शेरनी का क़िस्सा सुनाते हैं. इस शेरनी का नाम था एल्सा. एल्सा का क़िस्सा पूरी दुनिया में मशहूर हुआ. वो जंगली जानवरों के शिकारियों के ख़िलाफ़ जंग की पूरी दुनिया में पहचान बन गई थी.

एल्सा पर किताब लिखी गई. उस पर फ़िल्म भी बनी. ये शेरनी, जंगलों के, जानवरों के बचाने की मुहिम की सबसे बड़ी प्रतीक बन गई थी.

एल्सा का जन्म, दुनिया के सबसे बड़ी वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी, केन्या के मेरू नेशनल पार्क में हुआ था. जिस वक़्त वो पैदा हुई थी, उस वक़्त मेरू नेशनल पार्क बहुत अच्छी हालत में था.

यहां हज़ारों जंगली जानवर थे. बड़ी संख्या में शेर भी यहां पाये जाते थे. यहां के जानवरों की जान बचाने में एल्सा का भी बड़ा योगदान था. लेकिन उसकी मौत के बाद, मेरू नेशनल पार्क बर्बाद हो गया.

साठ के दशक में एल्सा की वजह से मेरू नेशनल पार्क की दुनिया भर में चर्चा होती थी. इसकी शुरुआत हुई, जॉय एडमसन की क़िताब 'बॉर्न फ्री' के छपने से.

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असल में हुआ ये था कि जॉय के पति ने 1956 में ग़लती से एल्सा की मां को गोली मार दी थी. जॉय के पति जॉर्ज को लगा कि एल्सा की मां उन पर हमला करने जा रही है. जबकि असल में वो अपनी बच्ची यानी एल्सा को लेकर फ़िक्रमंद थी. मां की मौत के बाद, शेरनी एल्सा को जॉय और जॉ़र्ज ने मिलकर पाला.

बाद में एल्सा को जंगल में छोड़ दिया गया. वो कई साल तक ज़िंदा रही. उसने तीन बच्चे भी पैदा किए. 1961 में एक बीमारी से उसकी मौत हो गई.

जॉय की क़िताब 'बॉर्न फ्री' के छपने पर एल्सा और मेरू नेशनल पार्क की चर्चा पूरी दुनिया में होने लगी. आज से पचास साल पहले 1966 में इस किताब पर बनी फ़िल्म रिलीज़ हुई. जिसने केन्या को पूरी दुनिया में चर्चा में ला दिया. हर साल लाखों लोग मेरू नेशनल पार्क, यहां के जंगलों-जानवरों को देखने के लिए आने लगे.

उस फ़िल्म में ब्रिटिश कलाकारों, वर्जीनिया मैक्केना और बिल ट्रैवर्स ने जॉय और जॉर्ज के रोल किए थे. दोनों कलाकार असल ज़िंदगी में भी पति-पत्नी थे. फ़िल्म की कहानी का दोनों पर इतना असर पड़ा कि उन्होंने एक ग़ैरसरकारी संस्था बनाकर जंगली जानवरों की बेहतरी के लिए काम करना शुरू कर दिया.

मेरू नेशनल पार्क में एक नदी के किनारे बनी एल्सा की क़ब्र, शिकारियों के ख़िलाफ़ जंग की प्रतीक बन गई. कभी लोग यहां किसी तीर्थस्थान की तरह आते थे.

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'बॉर्न फ्री' फ़िल्म रिलीज़ होने के कुछ सालों के अंदर ही मेरू नेशनल पार्क तबाह हो गया. शिकारियों ने इसे बर्बाद कर डाला. जंगली जानवरों का कमोबेश ख़ात्मा हो गया. यहां के लहलहाते जंगल वीरान हो गए.

असल में मेरू नेशनल पार्क केन्या में जहां पर है, उसके आस-पास का इलाक़ा बेहद अशांत है. एक तरफ़ हिंसा से जल रहा सोमालिया है, तो दूसरी तरफ़ तबाही झेल रहा इथियोपिया.

साठ के दशक में ही केन्या में रहने वाले सोमालियों ने बग़ावत कर दी थी. इथियोपिया और सोमालिया में जंग के चलते हालात और बुरे हो गए. मेरू नेशनल पार्क के सीनियर वार्डेन तुक़ा जिर्मो बताते हैं कि पूरा इलाक़ा जंग की आग में जल रहा था.

मशीनगन से लैस लड़ाके, शिकारी बनकर नेशनल पार्क पर झपट पड़े. यहां के रखवालों के पास शॉटगन हुआ करती थीं. वो भला मशीनगनों का मुक़ाबला कैसे करतीं?

इसके अलावा एशिया में हाथी दांत की बढ़ती मांग ने भी शिकारियों का हौसला बढ़ाया. ग़रीब लोग भी बंदूकें लेकर हाथियों और गैंडों का शिकार करने लगे. तुक़ा बताते हैं कि उस वक़्त जंगल में इतने हाथी थे कि किसी को ख़्वाब में भी ये ख़याल नहीं आया था कि एक दिन हाथियों को बचाने के लिए मुहिम छेड़नी पड़ेगी.

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सत्तर और अस्सी के दशक में शिकारियों ने जानवरों को मार-मारकर पूरा इलाक़ा तबाह कर डाला. ख़राब सड़कें, रहने के ठिकानों की कमी ने नेशनल पार्क को वीरान जंगल में तब्दील कर दिया. कभी यहां तीन हज़ार से ज़्यादा हाथी थे. लेकिन बीस सालों में इनकी संख्या कुछ सौ ही रह गई. शिकार रोकने में केन्या की सरकार की कोशिशें नाकाम रहीं.

इसकी एक वजह ये भी थी कि नेशनल पार्क के रखवाले, जानवरों को बचाने के लिए अपनी ज़िंदगी को दांव पर लगाने के लिए तैयार नहीं थे. उसकी वजह भी थी. उनकी तनख़्वाहें कम तीं. हथियार बेहद घटिया थे. उनके मुक़ाबले शिकारी बेहतर हथियारों से लैस थे. उनसे मुक़ाबला पूरी तरह इकतरफ़ा था. कई रेंजर्स को शिकारियों ने जब मार डाला तो बाक़ियों ने जान बचाने में ही भलाई समझी.

बॉर्न फ्री फाउंडेशन के टिम ओलू एक क़िस्सा बताते हैं. वो कहते हैं कि एक बार शिकारियों ने बाक़ायदा एलान करके पांच गैंडों का शिकार किया. किसी की उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं हुई.

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1980 में जॉय एडमसन की भी मौत हो गई. बाद में पता चला कि उनका तो क़त्ल किया गया था. 1989 में डकैतों ने पास के कोरा नेशनल पार्क में दो फ्रेंच सैलानियों को मार डाला. जिसके बाद मेरू नेशनल पार्क के दरवाज़े भी बंद करने पड़े.

एक साल बाद 1990 में केन्या की सरकार ने केन्या वाइल्डलाइफ़ सर्विस शुरू की. दूसरे देशों से मिले साढ़े बारह लाख डॉलर की रकम से मेरू नेशनल पार्क को फिर से गुलज़ार करने की मुहिम शुरू हुई. दूसरे नेशनल पार्क से 1300 जानवर लाकर यहां बसाए गए. इनमें जिराफ़, इम्पाला, तेंदुए, ज़ेब्रा, हाथी और गैंडे शामिल थे.

नेशनल पार्क की सड़कों की भी मरम्मत की गई. वहां सैलानियों के रहने के जो ठिकाने बने थे उन्हें भी सुधारा गया. जंगलों की रखवाली करने वाले रेंजर्स को ऊंचे दर्जे की ट्रेनिंग दी गई. उन्हें नए नए हथियारों से लैस किया गया. वायरलेस सेट भी दिए गए. उनकी तनख़्वाहें बढ़ाई गईं और रहने के लिए घर भी दिए गए.

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इसके बाद रेंजर्स ने शिकारियों से जमकर मुक़ाबला किया. धीरे-धीरे शिकारियों को मेरू नेशनल पार्क से खदेड़ दिया गया. वैसे तो आज भी जानवरों पर शिकार का ख़तरा मंडराता रहता है. मगर ये काफ़ी कम हो गया है. साठ गैंडों को शिकारियों से बचाने के लिए उनकी दिन-रात निगरानी की जाती है. 2014 में दो शिकारी, एक गैंडे को मारने के लिए आए थे. मगर वो ख़ुद रेंजर्स के हाथों मारे गए.

आज मेरू नेशनल पार्क फिर से जानवरों से आबाद हो गया है. यहां बड़े जानवरों की अच्छी ख़ासी आबादी रहने लगी है. साथ ही चार सौ से ज़्यादा नस्लों के परिंदे भी यहां के बाशिंदे हैं.

पर, आज अगर एल्सा ज़िंदा होती तो उसे ये इलाक़ा अजीब लगता. क्योंकि जंगल में शेर न का बराबर बचे हैं. 2016 में पहली बार यहां शेरों की गिनती हुई. कुल मिलाकर अस्सी शेर ही गिने गए यहां. आज पूरे केन्या में केवल दो हज़ार शेर बचे हैं. जब एल्सा ज़िंदा थी तो केन्या में एक लाख से ज़्यादा शेर बसते थे. हालांकि लोगों को उम्मीद है कि एक बार फिर मेरू नेशनल पार्क में शेरों की दहाड़ गूंजेगी.

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हालांकि अब पार्क में नई मुसीबत खड़ी हो गई है. मांस के लिए जानवरों का शिकार करने के लिए यहां लोग जाल बिछाते हैं. जिसमें जानवरों के पैर फंस जाते हैं. लोग भैंसों, जिराफ़, इम्पाला का इस तरह से शिकार करते हैं. लेकिन उनके जाल में हाथी या तेंदुए या शेर भी फंस जाते हैं. ऐसा शिकार रोकने के लिए कई लोगों को पकड़कर सज़ा भी दी गई है. लेकिन अभी इस पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाई जा सकी है.

बॉर्न फ्री फाउंडेशन के विक्टर मुटुमाह कहते हैं कि इसकी सबसे बड़ी वजह ग़रीबी है. नेशनल पार्क के आस-पास रहने वाले लोगों के पास रोज़ी का कोई ठोस ज़रिया नहीं. इसीलिए वो जंगली जानवरों का शिकार करते हैं. कभी खाने का इंतज़ाम करने के लिए. तो कभी मांस बेचकर पैसे कमाने के लिए.

इसके अलावा हाथियों से उनकी फ़सलों को नुक़सान पहुंचता है. वहीं, चीता और शेर उनके पालतू जानवरों को मारकर खा जाते हैं. इसीलिए स्थानीय लोग जंगली जानवरों से चिढ़ते हैं. इन ग़रीबों को लगता है कि ये जंगल सफारी अमीरों की सैर के लिए बनाए गए हैं. किराए पर गाड़ी लेकर नेशनल पार्क में घूमना बहुत महंगा है. इसलिए स्थानीय लोग इसका लुत्फ़ नहीं ले सके हैं. ये भी नेशनल पार्क के प्रति बेरुख़ी की एक वजह है.

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इसीलिए अब स्थानीय लोगों को भी जंगल बचाने की मुहिम से जोड़ा जा रहा है. वाइल्डलाइफ़ सर्विस, लोगों की पढ़ाई, उनकी सेहत और पानी का इंतज़ाम करता है. उनके बच्चों को घुमाने के लिए भी ले जाया जाता है. इसका फ़ायदा ये हुआ है कि कई बार स्थानीय लोग ख़ुद आकर बताते हैं कि फलां जगह जाल बिछाया गया है.

एल्सा की कहानी के नाम पर बना बॉर्न फ्री फाउंडेशन भी इसमें अहम रोल निभा रहा है. ये फाउंडेशन 1984 में बना था. पहले इसका नाम 'ज़ू चेक' था. 2014 से बॉर्न फ्री फाउंडेशन, पूरी तरह से मेरू नेशनल पार्क के बचाव और रख-रखाव में साझीदार है. उन्होंने दो सालों में 1600 से ज़्यादा जाल, जंगलों से निकाले हैं.

विक्टर मुटुमाह कहते हैं कि मेरू को उसके पुराने दिनों जैसा बनाने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाक़ी है.

उम्मीद है कि अगले कुछ सालों मे एल्सा की क़ब्र पर सैलानियों की आमदो-रफ़्त बढ़ेगी. नई पीढ़ी के शेर भी यहां घूमा करेंगे.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

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