जब बुश को कहना था सेटबैक, कह गए सेक्स..

  • 9 जुलाई 2016
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अकसर लोगों की ज़ुबान फिसल जाती है. वो कहना कुछ चाहते हैं और मुंह से निकल कुछ और जाता है. कई बार ज़ुबान फ़िसलने की वजह से लोगों को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है.

इसकी एक बड़ी मिसाल, अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश सीनियर की दी जाती है. वो किसानों के एक सम्मेलन में गए थे.

वहां बुश को एक सादा सा, छोटा सा भाषण देना था. उन्होंने भाषण शुरू किया. मगर बीच में उन्हें जहां 'सेटबैक' शब्द बोलना था, वहां वो सेक्स बोल गए.

ज़ुबान फिसलने की इस आदत को 'फ्रायडियन स्लिप' कहते हैं. ये नाम उन्नीसवीं सदी में ऑस्ट्रिया के मशहूर मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड के नाम पर दिया गया है.

ज़ुबान फिसलने की इस आदत के बारे में सबसे पहले उन्होंने ही लंबी-चौड़ी रिसर्च जो की थी.

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आख़िर हमारी ज़ुबान फिसलने के पीछे वजह क्या है?

ख़ुद फ्रायड भी इसे लेकर किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सके. पर मोटे तौर पर वो ये मानते थे कि ये हमारी अंदरूनी ख़्वाहिशों का अचानक से सामने आ जाना है.

हमारे दिमाग़ में बहुत सी बातें चलती रहती हैं. हम अपने बहुत से ख़्याल दबाकर रखते हैं. दुनिया के सामने ज़ाहिर नहीं होने देते. फ्रायड के मुताबिक़ यही ख़्वाहिशें, यही दबे अरमान, ज़ुबान फिसलने से बाहर आ जाते हैं.

वैसे आज की तारीख़ में बहुत से मनोवैज्ञानिक फ्रायड के बहुत से दावों को ग़लत बताते हैं. ज़ुबान फ़िसलने की उनकी बताई वजह को भी ज़्यादातर मनोवैज्ञानिक ग़लत ठहराते हैं.

इस बारे में अमरीका की कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी में एक रिसर्च की गई. इसमें कुछ लोगों एक लैब में बुलाया गया.

उन्हें नहीं बताया गया था कि किसलिए बुलाया गया है. कुछ लोगों का स्वागत एक बुजुर्ग प्रोफ़ेसर ने किया. वहीं कुछ का सामना एक जवां, ख़ूबसूरत लैब असिस्टेंट से हुआ, जिसने बहुत छोटे, भड़काऊ कपड़े पहने हुए थे.

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इस मुलाक़ात के बाद इन सभी लोगों से कुछ ऊटपटांग के शब्द मन में दोहराने को कहा गया.

बीच बीच में बज़र दबाकर इनसे वही शब्द ज़ोर से बोलने को कहा जाता था. जिन लोगों का स्वागत युवा लैब असिस्टेंट ने किया था, वो अक्सर शब्द बोलने में ग़लती करते पाए गए.

ये लोग, सही शब्द की जगह ऐसे ग़लत शब्द बोलते थे, जिसका सेक्स से कोई न कोई संबंध होता था.

इससे पता ये चला कि लैब असिस्टेंट से मिलने के बाद इनके दिमाग़ में सेक्स का ख़्याल आया था. तभी उनकी ज़ुबान इतनी फिसल रही थी.

रूस के लेखक फियोदोर दोस्तोवस्की ने इसे 'व्हाइट बीयर प्रॉब्लम' का नाम दिया था, जिसके मुताबिक़ आप जिस चीज़ से ध्यान हटाना चाहते हो, दिमाग़ में वही चीज़ घूमती रहती है.

अस्सी के दशक में मनोवैज्ञानिक डैनियल वेगनर ने भी इस बारे में रिसर्च की थी. उनका कहना था कि दिमाग़ के जिस हिस्से को ज़ुबान फिसलने से रोकने की ज़िम्मेदारी दी गई है, उसी के फेल होने से ये हादसा होता है.

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क्योंकि हमारे दिमाग़ के भीतर ये काम लगातार चलता रहता है कि कौन सी बात ज़ुबान पर आए और कौन सी नहीं. कई बार सच सामने आ ही जाता है.

आप अक्सर किसी को मोटा कहने से बचने की कोशिश करते हैं. मगर कभी न कभी सच बयां हो ही जाता है. इसी तरह आप नई गर्लफ्रैंड के सामने पुरानी प्रेमिका का नाम नहीं लेना चाहते. मगर अक्सर ये हादसा भी पेश आ जाता है.

हालांकि सब फ्रायड के इस तर्क से सहमत नहीं. फ्रायड के सबसे बड़े आलोचक रहे रुडॉल्फ़ मेरिंगर ने इस बारे में अपना ही तजुर्बा किया था.

उन्होंने क़रीब हज़ार लोगों से बातचीत की. उनकी ज़ुबान फिसलने की आदत पर ग़ौर किया. मेरिंगर इस नतीजे पर पहुंचे कि बोलते वक़्त लोग अक्षर का तालमेल मिलाने में गड़बड़ा जाते हैं.

वो ग़लत शब्द नहीं बोलते, बल्कि अक्षरों का हेलमेल बिगड़ने से उनकी ज़ुबान फ़िसल जाती है.

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मेरिंगर के मुताबिक़, ये ज़ुबान का फिसलना, मन के भाव का सामने आना नहीं, असल में बेइरादा, मासूम सी ग़लती है.

बेल्जियम की घेंट यूनिवर्सिटी के रॉब हार्टसुकर, मेरिंगर की बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं. कई बार ऐसा हुआ है कि शब्दों के अक्षरों के घालमेल से शब्द बदल गए हैं.

इस बारे में बीबीसी रेडियो के जिम नॉटी का क़िस्सा बड़ा मशहूर है. उन्होंने उस वक़्त के संस्कृति मंत्री का नाम ऐसे बोला कि पूरी दुनिया में उसका मज़ाक़ बन गया था.

हम दिन भर में क़रीब पंद्रह हज़ार शब्द बोलते हैं. एक अंदाज़ के मुताबिक़, इनमें से 22 शब्द ही हम ग़लत बोलते हैं. यानी हमारा दिमाग़ शब्दों की प्रॉसेसिंग का काम बड़े अच्छे तरीक़े से करता है.

लेकिन परफेक्ट से परफेक्ट मशीन से भी ग़लती हो ही जाती है. ख़ास तौर से जब हम किसी शब्द का अभ्यास कर रहे होते हैं, तो ज़ुबान फिसलने का अंदेशा ज़्यादा रहता है.

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जब हम नर्वस होते हैं, थके होते हैं, या नशे में होते हैं तब हमारी ज़ुबान फिसलने का ज़्यादा डर होता है. कई बार हड़बड़ी में, जल्दी-जल्दी बोलने की वजह से भी हमारी ज़ुबान फिसलती है.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की रोज़ीन पेरेलबर्ग कहती हैं कि ज़ुबान का फिसलना, इंसान के किरदार का अहम पहलू है. इससे वो बातें सामने आती हैं, जो वो आम तौर पर नहीं कहना चाहेगा.

हालांकि सभी जानकार, रोज़ीन की बात से सहमत नहीं हैं. जैसे बेल्जियम के रॉब हार्टसुकर.

वो कहते हैं कि लोगों की ज़ुबान फिसलती तो है. मगर, ऐसा क्यों होता है, ये नहीं मालूम.

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