जहां औसत तापमान 460 डिग्री सेल्सियस है

  • 10 जुलाई 2016
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हम जब भी अंतरिक्ष में जाने की बात करते हैं, हमारे ज़ेहन में चांद पर जाने या फिर मंगल ग्रह पर जाने का ख़्याल सबसे पहले आता है.

ये दोनों धरती के सबसे क़रीब जो हैं. मगर, एक और ग्रह जो धरती के क़रीब है वो है शुक्र. वहां जाने की ज़्यादा बात नहीं होती है.

लेकिन अब अमरीका और रूस के अलावा यूरोपीय देशों की स्पेस एजेंसी भी शुक्र ग्रह पर मिशन भेजने की तैयारी कर रही है.

शुक्र ग्रह, हमारे सौर मंडल के सबसे भयानक माहौल वाले ग्रहों में से एक है. ये पूरी तरह से गंधक के एसिड के बादलों से ढका है.

यहां औसत तापमान 460 डिग्री सेल्सियस रहता है. यहां कार्बन डाई ऑक्साइड का दबाव धरती से नब्बे गुना ज़्यादा है.

सीसा, ज़िंक और टिन जैसी धातुएं भी यहां पिघली हुई पाई जाती हैं.

कार्बन डाई-आक्साइड यहां इतनी भारी होती है, जितनी समंदर के एक किलोमीटर अंदर होती है. इतने दबाव में पनडुब्बियां भी तबाह हो जाती हैं.

मगर, बरसों बाद एक बार फिर शुक्र ग्रह में इंसान की दिलचस्पी पैदा हुई है.

जापान ने अभी हाल ही में अकात्सुकी मिशन भेजा था, जो पिछले साल दिसंबर से शुक्र का चक्कर लगा रहा है.

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नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी भी 2020 तक शुक्र पर अपना मिशन भेजने की तैयारी कर रही हैं.

यहां तक कि रूस भी शुक्र पर स्पेसक्राफ्ट भेजने का इरादा किए हुए है.

रूस ही वो पहला देश था जिसने सत्तर और अस्सी के दशक में शुक्र ग्रह पर वेनेरा और वेगा जैसे बेहद कामयाब मिशन भेजे थे.

ये शुक्र का चक्कर लगाने के लिए भेजे गए थे. रूस इस बार भी शुक्र का चक्कर लगाने वाला अंतरिक्ष यान भेजने की तैयारी में है.

लेकिन, सिर्फ़ चक्कर लगाने वाले यान से बात नहीं बनेगी. शुक्र के माहौल को समझने के लिए एक अंतरिक्ष यान वहां उतारना होगा.

यही सबसे बड़ी चुनौती है. क्योंकि शुक्र ग्रह इतना गर्म है, वहां का माहौल इतना भयानक है कि कोई भी अंतरिक्ष यान उस माहौल में घंटे-दो घंटे भी नहीं टिक पाएगा.

वैसे रूस के मिशन वेनेरा डी में एक स्पेसक्राफ्ट शुक्र के धरातल पर उतारने के लिए भी जाएगा.

मगर ये वहां बमुश्किल तीन घंटे टिक पाए तो भी बड़ी बात है.

इससे पहले भी सोवियत संघ ने 1982 में वेनेरा 13 लैंडर, शुक्र पर उतारा था.

ये कुल 127 मिनट तक बच सका. शुक्र के बेहद गर्म माहौल में ये उसके बाद जलकर राख हो गया.

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वहां की भयंकर गर्मी, बेहद ख़तरनाक केमिकल वाले वातावरण में किसी यान को दिन भर के लिए बचाए रखना वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

वो इतने वक़्त तक रुकेगा तभी वहां के माहौल का जायज़ा लेकर वहां की रिपोर्ट पृथ्वी पर भेज सकेगा.

इसके लिए उसके अंदर के चिप, सर्किट, इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिक सिस्टम, इतने मज़बूत होने चाहिए कि वो वहां की भयंकर गर्मी में जल न जाएं.

इस यान को बिना सूरज की रौशनी के काम करना होगा, क्योंकि शुक्र के आसमान पर हमेशा गंधक के बादलों का साया रहता है.

दिक़्क़त ये है कि अगर कोई बैटरी वाला अंतरिक्ष यान तैयार भी कर लिया जाए, तो वो इतनी देर तक चलेंगी नहीं और उनसे इतनी ऊर्जा भी पैदा नहीं हो सकती, जिससे कोई अंतरिक्ष यान देर तक काम कर सके.

शुक्र पर भेजे जाने वाले अंतरिक्ष यान के लिए नासा एक अलग तरह की चीज़ से बनी कंप्यूटर चिप तैयार करने में जुटा है.

ये ऐसा तत्व होना चाहिए जो 500 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी बचा रहे.

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नासा के वैज्ञानिक गैरी हंटर कहते हैं कि कंप्यूटर का पूरा नया सिस्टम की गढ़ना होगा, जिसमें नए इंसुलेटर हों, नई वायरिंग, नई चिप. सब कुछ नया चाहिए.

मगर हंटर के मुताबिक़, दिक़्क़त ये है कि तमाम तत्व, बेहद गर्म माहौल में अलग ही तरह का बर्ताव करते हैं.

वो सिलिकॉन की मिसाल देते हैं, जो सेमीकंडक्टर है. मगर तापमान 300 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा होने पर, इसका बर्ताव अलग ही हो जाता है.

फिर इसके ऊपर के तापमान में ये बचा भी रहेगा कि नहीं, कहना मुश्किल है.

गैरी हंटर बताते हैं कि नासा, सिलीकॉन और कार्बाइड से मिलकर बनने वाले एक मैटीरियल से इलेक्ट्रॉनिक चीज़ें तैयार करने की सोच रहे हैं.

उन्हें उम्मीद है कि ये तत्व, शुक्र ग्रह की भीषण गर्मी झेल जाएगा.

मगर दिक़्क़त ये है कि इस मैटीरियल से डेटा गुज़ारने की रफ़्तार ठीक वैसी होगी जैसी साठ के दशक के कंप्यूटर्स की हुआ करती थी.

शुक्र ग्रह पर जाने लायक अंतरिक्ष यान बनाने के लिए नए इंजन की भी ज़रूरत होगी.

इसके लिए 1816 में ईजाद की गई स्टर्लिंग तकनीक के इस्तेमाल की कोशिश की जा रही है.

इंजन होगा तो इसके लिए ईंधन की भी ज़रूरत होगी. इंजन के विकास पर काम कर रहे वैज्ञानिक इसके लिए लीथियम को सही ईंधन मानते हैं.

ये कार्बन डाई-ऑक्साइड और नाइट्रोजन के माहौल में भी जल सकता है.

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ये 180 डिग्री सेल्सियस पर पिघलता है. जो शुक्र ग्रह के माहौल के लिहाज़ से एकदम सटीक है.

इसका वज़न भी कम होता है, जिससे शुक्र ग्रह पर भेजे जाने वाले यान का वज़न भी कम रहेगा.

फिलहाल इस दिशा में कई प्रयोग चल रहे हैं. नई चीज़ें विकसित करने की कोशिश हो रही है.

लेकिन अभी कामयाबी हासिल करने के लिए बहुत काम किया जाना बाक़ी है.

शुक्र और हमारी पृथ्वी में कई समानताएं हैं. इनका आकार कमोबेश एक जैसा है.

ये सूरज के एक ही हिस्से से अलग होकर ग्रह बने हैं. शुक्र ग्रह, धरती का 81 फ़ीसद माना जाता है.

अब अगर इंसान शुक्र के बारे में और जानकारी जुटा पाया तो, हम एक पहेली और हल कर सकेंगे कि आख़िर कैसे सूरज से एक साथ अलग होकर ग्रह बने धरती और शुक्र में इतना फ़र्क़ है.

जहां धरती पर ज़िंदगी लहलहा रही है, वहीं, शुक्र का माहौल नर्क़ जैसा क्यों है?

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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