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मंगलवार, 09 मई, 2006 को 10:08 GMT तक के समाचार
 
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नासा और इसरो में ऐतिहासिक समझौता
 
अंतरिक्ष यान
अब तक अमरीका, रूस और जापान ही चंद्र अभियानों को अंजाम दे पाए हैं
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने बंगलौर में मंगलवार को एक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं.

इस समझौते के तहत भारत के प्रस्तावित चंद्र अभियान में भारतीय अंतरिक्ष यान के साथ दो अमरीकी अंतरिक्ष उपकरण भी ले जाए जाएँगे.

इन अमरीकी उपकरणों में पहला चंद्रमा पर बर्फ़ का परीक्षण करेगा और दूसरा इसकी सतह पर खनिज पदार्थों की छानबीन करेगा.

साथ ही भारत ने अपने चंद्र अभियान में यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी को भी साझीदार बनाया है.

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के चार अंतरिक्ष उपकरण भी इस यान के साथ चंद्रमा की कक्षा में भेजे जाएँगे जो चंद्रमा से सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थापित किए जाएँगे.

इसरो के प्रमुख माधवन नायर ने बताया कि भारत वर्ष 2008 में चंद्रमा पर अपना पहला मानव रहित अंतरिक्ष यान 'चंद्रयान-1' भेजने की तैयारी में लगा है.

यह यान श्रीहरिकोटा से छोड़ा जाएगा जहाँ से पहले भी भारतीय अंतरिक्ष यान भेजे जाते रहे हैं.

हालांकि अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के साथ अंतरिक्ष यान को भेजने की योजना पर भारत फिलहाल कोई निर्णय नहीं ले सका है.

चंद्रयान-1

भारत के इस प्रस्तावित मानवरहित चंद्र मिशन के तहत 'चंद्रयान-1' नामक उपग्रह को चंद्रमा की ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया जाएगा.

'चंद्रयान-1' क़रीब 100 किलोमीटर दूर रह कर चंद्रमा की परिक्रमा करेगा.

योजना के मुताब़िक एक 250 किलोग्राम वजन का उपग्रह भारत निर्मित रॉकेट पीएसएलवी की सहायता से चाँद तक पहुँचाया जाना है.

इस उपग्रह की सहायता से चाँद की सतह का जायज़ा लिया जा सकेगा.

हाल के वर्षों में भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को उपग्रह और अंतरिक्ष यान से जुड़ी प्रौद्योगिकी में कई सफलताएँ हाथ लगी हैं लेकिन चंद्र अभियान के लिए कहीं ज़्यादा जटिल अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में महारत हासिल करने की आवश्यकता होती है.

अब तक अमरीका, रूस और जापान ही चंद्र अभियानों को पूरा कर पाए हैं.

 
 
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