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बुधवार, 18 अप्रैल, 2007 को 14:00 GMT तक के समाचार

त्रिफला से हो सकेगा कैंसर का इलाज

वैज्ञानिकों ने आशा जताई है कि एक दिन भारतीय आयुर्वेदिक औषधि त्रिफला से पाचन ग्रंथि के कैंसर का इलाज किया जा सकेगा.

पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय के कैंसर संस्थान की एक टीम ने चूहों पर किए एक प्रयोग में पाया कि त्रिफला चूर्ण के इस्तेमाल से पैनक्रियाज़ यानी पाचन ग्रंथि में होने वाले कैंसर का बढ़ना कम हो जाता है.

अमेरिकन ऐसोसिएशन फ़ॉर कैंसर रिसर्च में पेश अध्ययन से आशा जगी है कि एक दिन त्रिफला से इस रोग का इलाज भी हो पाएगा.

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अभी शोध अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही है.

त्रिफला चूर्ण का भारत में सदियों से इस्तेमाल होता रहा है, यह आँवला, हरड़े और बहेड़ा नाम के तीन फलों को सुखाकर बनाया जाता है इसलिए इसे त्रिफला कहा जाता है.

आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार त्रिफला में जो तीन फल हैं वे शरीर में तीन अहम चीज़ों का संतुलन बनाए रखते हैं, ये तीन चीज़ें हैं--कफ़, वात और पित्त.

त्रिफला का प्रयोग भारत में एक आम स्वाथ्यवर्धक की तरह होता रहा है और इसे रोज़मर्रा की बीमारियों के लिए बहुत प्रभावकारी औषधि माना जाता रहा है.

कैंसर-रोधक गुण

अध्ययनों में ये पाया गया है कि कोशिकाओं में त्रिफला कैंसररोधी का काम करता है और अब चूहों पर किए अध्ययन से पता चला है कि अग्नाशय को नुक़सान पहुँचाए बिना त्रिफला बहुत ही असरदार है.

मानव अग्नाशय के ट्यूमरों को चूहों में स्थापित किया गया और फिर हर हफ़्ते में पाँच दिन तक उन्हें त्रिफला खिलाया गया.

चार हफ्तों बाद इन चूहों के ट्यूमर के आकार और प्रोटीन की मात्रा की ऐसे चूहों के साथ तुलना की गई जिन्हें त्रिफला नहीं दिया जा रहा था.

शोधकर्ताओं ने पाया कि त्रिफला दिए जानेवाले चूहों में ट्यूमर का आकार आधा हो गया.

अध्ययन टीम में शामिल प्रोफ़ेसर संजय श्रीवास्तव का कहना था, "त्रिफला ने ख़राब चुकी कोशिकाओं को समाप्त कर दिया और कोई ज़हरीला प्रभाव छोड़े बिना ट्यूमर का आकार आधा कर दिया."

ब्रिटेन में कैंसर अनुसंधान के विज्ञान सूचना अधिकारी डॉ एलिसन रॉस का कहना था, "अग्नाशय कैंसर का इलाज बहुत कठिन है इसलिए इलाज़ के नए तरीके खोजने की ज़रूरत है. ये सब अभी प्राथमिक प्रयोग हैं. त्रिफला को लेकर भविष्य में बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है."

अग्नाशय कैंसर का इलाज बहुत कठिन है और इसमें मरीज़ के बचने की दर भी बहुत कम है.

ऐसा देखा गया है कि इलाज शुरू होने और मौत के बीच मात्र छह महीने का फ़ासला होता है. त्रिफला से शायद इस स्थिति को बदला जा सके.