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शुक्रवार, 04 अप्रैल, 2008 को 23:31 GMT तक के समाचार
 
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कश्मीर में हो रहा है जोंक से इलाज
 

 
 
जोंक से इलाज
जोंक से इलाज यूनानी चिकित्सा पद्धति में किया जाता है
भारत प्रशासित कश्मीर के अस्पतालों में एक नया प्रयोग हो रहा है. वहाँ ख़ून चूसने वाले जोंक का उपयोग इलाज करने में किया जा रहा है.

तीन अस्पतालों में डॉक्टर जोंक का उपयोग दिल के रोगियों का इलाज करने के लिए कर रहे हैं.

वैसे गठिया, वात, लगातार सिरदर्द और साइनोसाइटिस जैसी बीमारियों के इलाज में भी जोंक का उपयोग हो रहा है.

जिन रोगियों की बीमारी परंपरागत दवाइयों से ठीक नहीं हो रही है, संभावना है कि वही लोग जोंक की सहायता से इलाज करवाना पसंद करेंगे.

जोंक से इलाज के कार्यक्रम का नेतृत्व करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि इस इलाज के परिणाम अद्भुत रहे हैं.

उल्लेखनीय है कि 19वीं सदी के अंत तक जोंक का उपयोग दवा की तरह किया जाता था.

उत्सुकता और उम्मीद

कश्मीर के जिन अस्पतालों में इलाज के लिए जोंक का प्रयोग हो रहा है वो चिकित्सा की यूनानी पद्धति का उपयोग करते हैं.

 जोंक एक चमत्कारी डॉक्टर है और वह अपने आपमें दवा की एक फ़ैक्ट्री है जो कई तरह के एंजाइम बनाता है
 
डॉ हकीम

प्राचीन ग्रीस से शुरु हुई इस पद्धति को भारतीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने मान्यता दी हुई है.

श्योपोर के एक यूनानी अस्पताल में इलाज करवा रहे अब्दुल रज़्ज़ाक मीर उन्हें कोई बीस साल से लगातार सिरदर्द होता रहता था और सर्दी की शिकायत बनी रहती थी. इसके कारण उनकी आँखों पर भी असर पड़ रहा था.

वे कहते हैं, "एलोपैथी दवाओं से तो मुझे कोई फ़ायदा नहीं हुआ और मुझे उम्मीद है कि जोंक से इलाज का फ़ायदा होगा."

इसी तरह अब्दुल रशीद बट को चर्म रोग है और वे भी इस आशा से आए हैं कि उन्हें जोंक पद्धति से इलाज का फ़ायदा मिलेगा.

डॉ नासिर अहमद हकीम तीन अस्पतालों के मुखिया हैं. उनका कहना है कि उन्होंने पिछले साल कम से कम दो सौ मरीजों के इलाज के लिए जोंक पद्धति का उपयोग किया.

वे कहते हैं, "जोंक एक चमत्कारी डॉक्टर है और वह अपने आपमें दवा की एक फ़ैक्ट्री है जो कई तरह के एंजाइम बनाता है."

इलाज

डॉ हकीम का कहना है कि जब जोंक ख़ून चूसते हैं तो उसके लार में मौजूद सौ से अधिक जैविक तत्व मनुष्य के भीतर जाते हैं.

जोंक से इलाज
इस इलाज पद्धति की काफ़ी आलोचना भी हुई है

चूंकि यूनानी अस्पतालों में जोंक से इलाज नहीं सिखाया जाता इसलिए डॉ हकीम ने पारंपरिक लोगों को इस काम में लगाया है.

वे बताते हैं कि एक बार जोंक का प्रयोग किसी भी मरीज के ऊपर करने के बाद उसे मार दिया जाता है ताकि एक मरीज का संक्रमण दूसरे मरीज में न चला जाए.

वैसे डॉ हकीम की इस चिकित्सा पद्धति की एलोपैथी और दूसरी चिकित्सा पद्धति के लोगों ने ख़ूब आलोचना की है.

लेकिन उनका कहना है कि जब यह पता चला कि जोंक से प्रभावी इलाज होता है तो कई ऐलोपैथी डॉक्टर उनसे इलाज करवा रहे हैं.

डॉ हकीम ने दावा किया कि कई ऐलोपैथी डॉक्टर 'डायबिटिक फ़ुट' (मधुमेह के मरीज़ों के पैरों में होने वाली समस्या) के इलाज के लिए मेगट यानी इल्लियों का उपयोग कर रहे हैं.

वे बताते हैं कि इल्लियों में यह ख़ास गुण होता है कि वे ख़राब उत्तकों को तो खा लेती हैं लेकिन स्वस्थ इल्लियों को नहीं खातीं.

श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेस के मेडिसिन विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ अब्दुल वहीद बाँडे का कहना है कि जोंक से इलाज को लेकर पश्चिमी देशों में एक नई रुचि पैदा हुई है.

उनका कहना है कि हालांकि यह ग़रीब लोगों के लिए सस्ती पद्धति है लेकिन इस बात की कोई संभावना नहीं दिखती कि निकट भविष्य में इसका उपयोग ऐलोपैथी वाले करने लगें.

वे कहते हैं कि इस पद्धति के उपयोग के लिए कोई ठोस कारण अभी दिखाई नहीं देता.

लेकिन डॉ हकीम इसे लेकर अभी आशावान हैं.

 
 
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