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बुधवार, 22 अक्तूबर, 2008 को 01:25 GMT तक के समाचार
 
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चाँद की ओर भारत का पहला क़दम
 

 
 
इसरो के वैज्ञानिक
प्रक्षेपण की सफलता पर इसरो के वैज्ञानिक फूले नहीं समा रहे हैं

हालांकि बादल छाए हुए थे और वैज्ञानिक मौसम को लेकर थोड़े चिंतित थे लेकिन भारत का पहला मानवरहित अभियान चंद्रयान-1 बुधवार को सुबह नियत समय पर यानी 6 बजकर 22 मिनट पर सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया गया.

तमिलनाडु के नज़दीक और आंध्रप्रदेश की सीमा में स्थित श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से पीएसएलवी सी-11 इस चंद्रयान को लेकर अंतरिक्ष में रवाना हुआ.

जहाँ प्रक्षेपण केंद्र में मौजूद वैज्ञानिकों ने सफल प्रक्षेपण का तालियाँ बजाकर ज़ोरदार स्वागत किया, वहीं भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने देश का नाम रोशन किया है.

ग्यारह उपकरण भी भेजे

इसरो के अध्यक्ष माधवन नायर ने प्रक्षेपण के कुछ मिनट बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पहले चरण का उद्देश्य था कि चंद्रयान सफलता से छोड़ा जा सके और अपनी पहली कक्षा में स्थापित हो. ऐसा हो गया है और हम अपने पहले उद्देश्य में सफल हो गए है.

उन्होंने कहा, "चार दिन से हम लोग कुछ प्रतिकूल चुनौतियों से जूझ रहे थे. बारिश, बिजली, तेज़ हवा जैसी चुनौतियाँ भी हमारे सामने थीं. फिर भी हम सफलतापूर्वक चंद्रयान का प्रक्षेपण कर पाए."

 चार दिन से हम लोग कुछ प्रतिकूल चुनौतियों से जूझ रहे थे. बारिश, बिजली, तेज़ हवा जैसी चुनौतियाँ भी हमारे सामने थीं. फिर भी हम सफलतापूर्वक चंद्रयान का प्रक्षेपण कर पाए
 
इसरो अध्यक्ष माधवन नायर

उन्होंने इसे ऐतिहासिक क्षण बताते हुए इस अभियान से जुड़े सभी वैज्ञानिकों को इस सफलता पर बधाई दी है.

इसरो के अनुसार चंद्रयान के साथ 11 अन्य उपकरण अंतरिक्ष में भेजे गए हैं जिनमें से पाँच भारत के हैं और छह अमरीका और यूरोपीय देशों के.

वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रयान को उसकी कक्षा में स्थापित करने के लिए कुल मिलाकर क़रीब 15 दिनों का समय लगेगा.

यह चंद्रयान चंद्रमा की सतह से 100 किलोमीटर ऊपर रहकर चंद्रमा का त्रिआयामी नक्शा तैयार करेगा और उसकी सतह पर मौजूद तत्वों और खनिजों के विवरण एकत्रित करेगा.

चंद्रयान-1 का सफ़र

वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत के चंद्रयान सहित 11 उपकरण लेकर अंतरिक्ष में गया पीएसएलवी सी-11 भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम के लिहाज से एक काफी बड़ी उपलब्धि है.

ऐसे कम ही देश हैं जो अंतरिक्ष कार्यक्रम को लेकर ऐसी उपलब्धि हासिल कर सके हैं.

इसरो से मिली जानकारी के मुताबिक सबसे पहली जिस कक्षा में यह यान पहुँचेगा उसकी पृथ्वी से न्यूनतम दूरी 250 किलोमीटर की है और अधिकतम 23,000 किलोमीटर की.

पर चंद्रयान यह एक चक्कर काटकर नई कक्षा में प्रवेश कर जाएगा. इस 3,87,000 किलोमीटर वाली कक्षा में पृथ्वी की परिक्रमा करने में इस चंद्रयान को 11 दिन का वक्त लगेगा. चंद्रयान पृथ्वी के चारों ओर पाँच अलग अलग कक्षाओं में धूमेगा.

यहीं अंतिम कक्षा में चंद्रयान की मुलाक़ात होगी चंद्रमा से. जिस वक्त यह चंद्रयान सबसे बाहरी कक्षा में पृथ्वी के चक्कर लगा रहा होगा, उसी वक्त पृथ्वी के गिर्द धूमता चंद्रमा भी ऐसी जगह पर पहुँच जाएगा जहाँ से चंद्रयान और उसके बीच की दूरी कुछ सौ किलोमीटर भर ही रह जाएगी.

इसी वक्त एक नए अंतरिक्षयान मोटर को चालू करके चंद्रयान को चंद्रमा की कक्षा में लाया जाएगा.

यहाँ पहले 5000 किलोमीटर की कक्षा से शुरू करके चंद्रयान तीसरी और अंतिम कक्षा में चंद्रमा से कुल 100 किलोमीटर दूर होगा.

वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रयान-1 पृथ्वी के उपग्रह चंद्रमा की सतह से सौ किलोमीटर ऊपर इसी कक्षा में स्थापित कर दिया जाएगा.

चंद्रयान अभियान की तैयारी
दुनिया के कम ही देश हैं जिन्होंने अंतरिक्ष अभियानों में भारत जैसी उपलब्धियाँ हासिल की हैं

इसी बिंदु से चंद्रयान अपना काम शुरू करेगा. पहले चंद्रमा की सतह पर ‘मून इंपेक्ट प्रोब’ को उतारा जाएगा औऱ फिर वहाँ से जानकारी जुटाने का काम शुरू होगा. इस काम में मदद करेंगे चंद्रयान के साथ गए कैमरे और स्पेक्ट्रोमीटर.

इसरो का आकलन है कि यह अभियान दो वर्षों तक चलेगा.

महत्वाकांक्षी अभियान

हालांकि चंद्रमा के सच को खोजने खंगालने का काम तो सितंबर, 1959 में ही शुरू हो गया था जब सोवियत लूना-2 अंतरिक्षयान ने पहली बार चंद्रमा की सतह को छुआ.

इसके बाद 1969 में नील आर्मस्ट्रांग ने चंद्रमा की धरती पर पहला क़दम रखकर इतिहास रच दिया. पर भारत अभी तक ऐसी उपलब्धियों से दूर है.

बुधवार को हुए सफल प्रक्षेपण के बाद चंद्रयान अगर चंद्रमा की सतह को छूता है तो भारत के लिए भी यह बड़ी उपलब्धि बन जाएगी.

पर एक सवाल फिर भी जेहन में उठता है कि पिछले कुछ दशकों से दुनिया के अन्य देशों ने चांद को जितना खंगाता है, उससे क्या अलग और नया भारत खोजने जा रहा है.

जाहिर है, भारत के लिए इसका सटीक जवाब अभी कुछ वक्त लेगा पर इसरो ऐसे कई सवालों की ओर इशारा करता है जिनके जवाब दशकों चले अभियानों में भी अंतरिक्ष वैज्ञानिक नहीं खोज पाए हैं.

यहाँ तक कि चंद्रमा की उत्पत्ति और विकास तक को लेकर विज्ञानिकों में एक राय नहीं है. फिर चंद्रमा के बारे में जितनी जानकारी अभी तक हासिल हुई है, उससे कहीं, कहीं ज़्यादा जानकारी अभी भी खोज का विषय है.

फिर नाभिकीय ईधन के तौर पर इस्तेमाल हो सकने वाली हीलियम-3 गैस की मात्रा का आकलन और चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी जैसे सवालों का हल खोजने की कोशिशें तो हुई हैं पर नतीजा अभी भी भ्रम के ज़्यादा क़रीब है.

 
 
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