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शुक्रवार, 16 मई, 2003 को 08:02 GMT तक के समाचार
भारत की अंतरिक्ष कामयाबियाँ
भारत अनेक उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ चुका है जो काम कर रहे हैं
भारत अनेक उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ चुका है जो काम कर रहे हैं



भारत ने स्वदेशी रॉकेट जीएसएलवी-डी2 का हाल ही में सफल प्रक्षेपण किया. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानि इसरो का कहना है कि किसी भी भारतीय रॉकेट का छोड़ा हुआ ये सबसे भारी उपग्रह है.

जीएसएलवी -डी2 की इस यात्रा तक भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक लंबा सफ़र तय किया है.

वर्ष 2001 में भारत पहला 'जिओ-सिंक्रोनस' उपग्रह प्रक्षेपण यान लाया था, जिससे तक़रीबन डेढ़ हज़ार किलो का उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा गया था.


इसरो कई अभियानों पर आगे
लेकिन इसरो का ये मिशन फ़ेल हो गया और इस दृष्टि से हाल ही में किया गया जीएसएलवी डी-2 का सफल प्रक्षेपण बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

प्रक्षेपण के कुछ ही देर बाद इस 49 मीटर लंबे रॉकेट ने तक़रीबन 1800 किलो का एक परीक्षण संचार उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा.

इस तरह कुछ ही महीनों में भारत ने दो उपग्रह इंसैट 3ए और जीसैट डी-2 का सफल प्रक्षेपण कर अंतरिक्ष विज्ञान में अहम प्रगति की है.

इससे दो फ़ायदे होंगे. एक अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति और दूसरा संचार क्रांति में एक क़दम और आगे बढ़ाना.

ये दोनों उपग्रह टेलीविज़न, मोबाइल और सैटेलाइट टेक्नॉलोजी के ज़रिए भारत के 33 लाख वर्ग किलोमीटर के इलाक़े में फैले एक अरब से ज़्यादा लोगों को एक दूसरे के नज़दीक लाने में मदद करेंगे.

आत्मनिर्भरता

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन - इसरो के सैटेलाइट सेंटर के निदेशक डॉक्टर पीएस गोयल का कहना है कि इन उपग्रहों से देश की संचार प्रणाली को बल मिलेगा.

"हमारी कोशिश है कि जल्द ही हम अपने ही संचार उपग्रहों के नेटवर्क को इतना व्यापक बना लें कि हमारी किसी भी ज़रूरत के लिए हमें बाहर के उपग्रहों पर निर्भर नहीं रहना पड़े."

युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के मुलार्ड स्पेस साइंस लैबोरेटरी के वैज्ञानिक डॉक्टर एन्ड्रू कोएट्स कहते हैं कि इन नए उपग्रहों के प्रक्षेपण से भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र के अग्रणी देशों के बीच अपना स्थान और मज़बूत किया है.


डॉक्टर कस्तूरीरंगन का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है
"भारत, अमरीका, रूस, जापान, चीन और यूरोपीय देशों के अंतरिक्ष संगठन की तरह अपने प्रक्षेपण यान में अपना उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ सकता है - ये कोई साधारण बात नहीं है. इससे भी बढ़कर बात ये है कि ये उपग्रह बेहतरीन टेक्नॉलोजी का नमूना हैं."

अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉक्टर एन्ड्रू कोएट्स ये भी कहते हैं कि भारत की बहुत कम समय में की गई यह प्रगति प्रशंसनीय है.

वे याद दिलाते हैं कि दुनिया का पहला उपग्रह सोवियत संघ ने 1957 में अंतरिक्ष में छोड़ा.

ये वो समय था जब अमरीका और रूस के बीच शीतयुद्ध जारी था. उसके बाद अमरीका ने भी तेज़ी से कोशिश करते हुए अपना उपग्रह छोड़ा.

एक तरफ़ अमरीका और सोवियत संघ जैसी महाशक्तियाँ और दूसरी ओर भारत जिसे आज़ाद हुए बामुश्किल एक दशक हुआ था.

उस समय जब भारत ने इसे राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न मानते हुए अंतरिक्ष की खोज और अपनी सैनिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अंतरिक्ष कार्यक्रम की घोषणा की तो कहा गया था कि भारत अपनी चादर के बाहर पाँव फैला रहा है.

लेकिन भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रणेता वैज्ञानिक डॉक्टर विक्रम साराभाई के नेतृत्व में भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम तेज़ी से आगे बढ़ा.

लबा सफ़र

भारत की पहली बड़ी सफलता थी 1975 में उपग्रह आर्यभट्ट का अंतरिक्ष में भेजा जाना और फिर उसके बाद 1984 में स्क्वॉड्रन लीडर राकेश शर्मा बने अंतरिक्ष में जानेवाले पहले भारतीय.

डॉक्टर एन्ड्रू कोएट्स कहते हैं कि जब अंतरिक्ष विज्ञान की शुरुआत हुई तो सोवियत संघ और अमरीका के बीच अंतरिक्ष दौड़ की शुरुआत हुई"

"सोवियत संघ ने पहले उपग्रह स्पूतनिक का प्रक्षेपण करने में सफलता हासिल की तो अमरीका ने चाँद पर आदमी पहले भेजकर उसका जवाब दिया लेकिन भारत का मामला दूसरा है."


भारत ने आज़ादी के 15 साल के अंदर ही अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू करने के बाद लगातार प्रगति की और एकमात्र ऐसा प्रगतिशील देश बना जो अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में विकसित देशों के बीच जा खड़ा हुआ.

डॉक्टर एन्ड्रू कोएट्स
वह कहते हैं कि भारत ने आज़ादी के 15 साल के अंदर ही अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू करने के बाद लगातार प्रगति की और एकमात्र ऐसा प्रगतिशील देश बना जो अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में विकसित देशों के बीच जा खड़ा हुआ."

अंतरिक्ष कार्यक्रम के साथ साथ भारत का मिसाइल कार्यक्रम भी आगे बढ़ा.

1972 तक रॉकेट रोहिणी-560 का परीक्षण कर लिया गया था. रोहिणी-560 की क्षमता तक़रीबन 100 किलो वजन के साथ 334 किलोमीटर दूर तक की थी.

और अब स्थिति ये है कि भारत ने पृथ्वी, आकाश, अग्नि, नाग और त्रिशूल नाम की मिसाइलें बना ली हैं. लेकिन परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम मिसाइलें बनाने के कारण भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अन्य देशों के लिए एक चिंता का विषय भी है.

हालाँकि लंदन स्थित अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉक्टर एंड्रयू कोएट्स का ख़याल है कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम किसी के लिए चिंता का विषय नहीं है.

"भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम परिपक्व लगता है और साथ ही उसका ख़ास ध्यान देश की प्रगति पर है, बात चाहे संचार उपग्रहों की हो या रिमोट सेंसिंग की, भारत ने इन संचार उपग्रहों का उपयोग लोगों की भलाई के लिए किया है."

डॉक्टर कोएट्स की बात से इसरो सैटेलाइट सेंटर के डॉक्टर पी एस गोयल भी सहमत हैं और उनके अनुसार भारत की कोशिश है कि आनेवाले दिनों में अंतरिक्ष विज्ञान के फ़ायदे आम लोगों तक पहुँचाए जाएँ, ख़ासकर गाँवों तक.

"हमारी कोशिश है कि संचार उपग्रहों के ज़रिए गाँवों तक शिक्षा को पहुँचाने की. जिन गाँवों तक हम पर्याप्त शिक्षा व्यवस्था नहीं पहुँचा पाए हैं उन तक हम बेहतरीन शिक्षा कार्यक्रम उपग्रहों तक पहुँचा सकेंगे. "

डॉक्टर गोयल कहते हैं कि कई अन्य क्षेत्रों में प्रवेश करने पर विचार किया जा रहा है - मसलन, टेलीमेडिसिन को और विकसित कर जल्द ही एक और उपग्रह छोड़ा जा सकता है जो सिर्फ़ टेलिमेडिसिन के काम आए.

"यानि डॉक्टर बैठा हो दिल्ली में लेकिन वो इस उपग्रह के ज़रिए भारत के दूर दराज़ के लोगों को अपनी सेवाएँ दे सके."

डॉक्टर पी एस गोयल का कहना है कि इसरो का अगला बड़ा क़दम होगा एक नया संचार उपग्रह इंसैट 3ई और एक नया रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट आईआर एस पी-6 का प्रक्षेपण करना जिससे भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक नए युग में प्रवेश कर जाएगा.
 
 
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