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मंगलवार, 02 सितंबर, 2003 को 10:04 GMT तक के समाचार
अच्छी सोच, अच्छी सेहत
बुरे ख़यालों से सेहत पर भी बुरा ही असर पड़ता है
बुरे ख़यालों से सेहत पर भी बुरा ही असर पड़ता है

एक कहावत है कि जो जैसा सोचता है उसके विचार और ख़याल भी उसी दिशा में जाने लगते हैं.

दूसरे लफ़्ज़ों में कहें तो अधभरे गिलास को दोनों तरह से देखा जा सकता है यानी आधा गिलास ख़ाली या आधा भरा.

कहते हैं यह देखने वाले की नज़र पर है कि वह किस पहलू को देखता है लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर चीज़ों पर नकारात्मक सोच के साथ नज़र डाली जाए तो उससे पूरी सेहत पर असर पड़ने लगता है.


आदमी के ख़यालात उसकी सेहत अच्छी रखने वाले तत्वों पर महत्वपूर्ण असर डालते हैं.

डॉक्टर रिचर्ड डेविडसन
एक अमरीकी पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ़ द नेशनल एकेडेमी ऑफ़ साइंस ने एक अध्ययन के बाद नतीजा निकाला है कि दिमाग़ में किसी भी नकारात्मक गतिविधि से आदमी की रोगों से लड़ने की ताक़त कमज़ोर हो जाती है.

अमरीका के विस्कोंसिन मेडिसन विश्वविद्यालय में शोधकर्ताओं ने कुछ ऐसे लोगों के दिमाग़ के उस हिस्से का अध्ययन किया जो नकारात्मक विचारों से जुड़ा होता है.

इन लोगों को जब फ़्लू की दवाई दी गई तो उसने कुछ असर नही नहीं दिखाया.

वैज्ञानिक पहले ही यह जानते थे कि निराशावादी सोच रखने वाले लोगों पर नकारात्मक गतिविधि का जल्दी असर होता है जिससे उनके दिमाग़ के एक ख़ास हिस्से में गतिविधियाँ तेज़ होती हैं.

हलचल कहाँ?

दिमाग़ का का यह हिस्सा दाहिनी तरफ़ होता है जिसे 'राइट प्री फ्रंटल कोर्टेक्स' कहा जाता है.

जबकि बाईं तरफ़ के हिस्से में सकारात्मक विचारों से जुड़ी गतिविधियाँ तेज़ चलती हैं.

इस अध्ययन दल का नेतृत्व डॉक्टर रिचर्ड डेविडसन ने किया जिसमें 57 से 60 साल की उम्र के 52 लोगों के दिमाग़ों का अध्ययन किया गया.


"नकारात्मक सोच से सेहत पर भी बुरा असर होता है"
अध्ययन में हर आदमी से कहा गया कि वे कोई ऐसी घटना याद करें जिससे उन्हें ख़ुशी होती है और ऐसी भी जिसे याद करके उन्हें दुख होता हो, ग़ुस्सा आता हो या डर लगता हो.

जब वे ऐसी घटनाओं को याद करते थे तो उसी दौरान उनके दिमाग़ों पर नज़र रखी जाती थी कि किन विचारों के साथ कौन से ख़ास हिस्सों में हलचल होती है.

इस प्रयोग के बाद हर आदमी को फ़्लू की दवाई दी जाती थी.

इन विचारों के दौरान जिनके दिमाग़ के बाईं तरफ़ हलचल होती थी उनके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ने बहुत अच्छा असर दिखाया.

लेकिन जिनके दिमाग़ के दाईं हिस्से में ज़्यादा हलचल हुई उनमें उस दवाई का कोई असर ही नहीं देखा गया यानि रोगों का मुक़ाबला करने की उनकी क्षमता कमज़ोर हो चुकी थी.

ये प्रयोग छह महीने तक किए गए जिस दौरान यह देखा गया कि उस दवाई ने रोग प्रतिरोधक क्षमता को किस तरह विकसित किया.

डॉक्टर रिचर्ड डेविडसन का कहना था, "आदमी के ख़यालात उसकी सेहत अच्छी रखने वाले तत्वों पर महत्वपूर्ण असर डालते हैं."
 
 
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