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 विज्ञान
शुक्रवार, 19 सितंबर, 2003 को 03:08 GMT तक के समाचार
कैसे चलता है अपराधी दिमाग़?
स्कैन से दिमाग़ की गतिविधियाँ देखी जा सकती हैं
स्कैन से दिमाग़ की गतिविधियाँ देखी जा सकती हैं

छोटा-मोटा झूठ तो लगभग सभी बोलते हैं, जैसे बहाना बनाकर दफ़्तर से छुट्टी लेना या अपनी घड़ी का दाम बढ़ाकर बताना.

वैज्ञानिकों का कहना है कि झूठ तो लोग बोलते हैं लेकिन झूठ बोलने पर उन्हें पछतावा भी होता है, यह पछतावा ख़ास उपकरणों के सहारे देखा भी जा सकता है क्योंकि दिमाग़ के ख़ास हिस्से में होने वाली गतिविधि का पता चलता है.


अब दिमाग़ को बारीक़ी से पढ़ा जा सकता है
यानी झूठ बोलना ऐसा काम है जिसके लिए अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है, वैज्ञानिकों का कहना है कि आपराधिक प्रवृति वाले लोग बड़ी आसानी से झूठ बोल सकते हैं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि तीन से चार वर्ष की उम्र से बच्चे झूठ बोलना सीखते हैं लेकिन साथ ही दूसरों को नुक़सान न पहुँचाने की भावना भी उनके अंदर आती है.

दिमाग़ की गतिविधियों का गहन अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक कहते हैं कि जो लोग आपराधिक प्रवृति के होते हैं वे झूठ बोलना तो सीख जाते हैं लेकिन दूसरों के प्रति सहानुभूति नहीं सीख पाते.

यही वजह है कि उन्हें अपराध करने से रोकने के लिए नैतिक चेतावनी देने की कोई व्यवस्था उनके दिमाग़ में नहीं होती.

बड़े ज़िम्मेदार

शोध करने वालों का कहना है कि ऐसा अक्सर उन्हीं लोगों के साथ होता जिन्हें किसी समझदार वयस्क व्यक्ति का साथ नहीं मिलता.


आपराधिक प्रवृति वाले लोगों के अंदर कोई ग्लानि नहीं होती इसलिए उन्हें अपराध करते समय कुछ भी नहीं खटकता

डॉक्टर शॉ स्पेंस
ब्रिटेन की शेफ़ील्ड यूनिवर्सिटी के डॉक्टर शॉ स्पेंस का कहना है कि "जब हम झूठ बोलते हैं तो ग्लानि पैदा होती जो हमें ऐसा करने से रोकती है क्योंकि हमारे अंदर दूसरों को नुक़सान न पहुँचाने की भावना आम तौर पर रहती है."

डॉक्टर स्पेंस का कहना है, "लेकिन आपराधिक प्रवृति वाले लोगों का दिमाग़ इस तरह नहीं चलता, उनके अंदर कोई ग्लानि नहीं होती इसलिए उन्हें अपराध करते समय कुछ भी नहीं खटकता."

उनका कहना है कि जब बड़े आपके साथ सहानुभूति प्रकट करते हैं और सही-ग़लत का भेद बताते हैं तो यह बात धीरे-धीरे आपके अंदर बैठ जाती है, इसकी कमी आपराधिक प्रवृति के पनपने का प्रमुख कारण है.

उनका कहना है, "अगर किसी के साथ कच्ची उम्र में बुरा व्यवहार या हिंसा हुई हो तो संभव है कि वह बड़ा होकर किसी के साथ सहानुभूति न रख पाए."

डॉक्टर स्पेंस की राय में "माँ-बाप की अच्छी निगरानी ही ऐसी प्रवृतियों को पनपने से रोक सकती है."

उनके मुताबिक़ "अगर किसी व्यक्ति के साथ बुरा व्यवहार भी हुआ हो लेकिन अगर उसे किसी परिपक्व व्यक्ति का साथ मिल जाए तो बात आम तौर पर नहीं बिगड़ती."
 
 
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