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गुरुवार, 02 अक्तूबर, 2003 को 03:10 GMT तक के समाचार
बिगफ़ुट है या नहीं?
येती के भी पैरों के निशान तो मिलते हैं पर येती नहीं मिलता
येती के भी पैरों के निशान तो मिलते हैं पर येती नहीं मिलता

अमरीका के एक फ़ोरेंसिक विशेषज्ञ ने दावा किया है कि उनके पास इस बात के पक्के सबूत हैं कि विशालकाल पैरों वाले जीव का अब भी अस्तित्व है.

इस जीव को बिगफ़ुट के नाम से जाना जाता है.

इस जीव के बारे में कुछ लोग दावा करते हैं कि उन्होंने उसे देखा है लेकिन ज़्यादातर वैज्ञानिकों को इन दावों पर शक ही है.

टेक्सास के पुलिस डिपार्टमेंट के फ़ुट प्रिंट और फ़िंगरप्रिंट विशेषज्ञ जिमी शिलकट का कहना है कि उन्हें विश्वास है कि पैरों के जो छह निशान मिले हैं वे वास्तविक हैं और वे बिगफ़ुट के ही हैं.

ये निशान 1987 में वॉशिंगटन में मिले थे और उनका आकार 42 सेंटीमीटर यानी 18 इंच था.


वैज्ञानिक कहते हैं कि ये लोगों के मन का भ्रम है
उन्होंने बीबीसी से हुई बातचीत में कहा, ''दिलचस्प बात यह है कि ये निशान उन निशानों से मिलते हैं जो कैलिफ़ोर्निया में मिले थे.''

बिगफ़ुट के मामले से जुड़ने से पहले से ही शिलकट ने बनमानुष और बंदरों के पैरों के ढेरों निशान इकट्ठे कर रखे थे, हालांकि वह उनके पुलिस विभाग से जुड़े अध्ययन के लिए था.

उनका मानना है कि इस तरह के निशान कोस्टारिका के हॉवलर बंदर के पैरों से ही बनते हैं.

उनका कहना है कि आपराधिक मामलों के विशेषज्ञों के रुप में वे उन बातों पर कोई बात ही नहीं करते जिसे वे मानते या जानते हैं क्योंकि वे सिर्फ़ सबूतों की बात करते हैं.

बिगफ़ुट को हिमालय में कथित रुप से पाए जाने वाले येती का उत्तरी अमरीकी रुप माना जाता है.

पहली बार कैलिफ़ोर्निया के जंगलों में 1959 में बिगफ़ुट के निशान मिले थे.

इसके बाद सैकड़ों निशान मिले हैं हालांकि उनमें से कई तो झूठे भी थे.

रिसर्च

टेक्सास में बाक़ायदा एक बिगफ़ुट रिसर्च सेंटर है. इस सेंटर के निदेशक क्रेग वूलहीटर कहते हैं, ''यह कोई भूली बिसरी चीज़ नहीं है, ना ही कोई दूसरे ग्रह का प्राणी है, बल्कि यह जीवित जीव है जो मनुष्यों से बचकर रहता है.''


ये है हॉवलर बंदर
वूलहीटर का रिसर्ट सेंटर हर साल बिगफ़ुट देखे जाने के कोई सौ मामलों की जाँच करता है.

रिमोट कंट्रोल कैमरा, वीडियो निगरानी और रात्रिकालीन थर्मल इमेंजिंग जैसे ढेर सारे आधुनिक उपकरणों के बावजूद अब तक सफलता हाथ नहीं आई है.

इस तरह की खोजों की पड़ताल करने वाली एक पत्रिका के प्रबंध संपादक बेंजामिन रेडफ़ोर्ट का कहना है कि सबूत काफ़ी हैं पर वे मज़बूत नहीं हैं.

उनका कहना है कि ढेर सारे सबूत हों और मज़बूत न हों तो विज्ञान उसे नहीं मानता.

कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि यह भ्रम के अलावा कुछ नहीं है.

लेकिन कुछ और लोगों का कहना है कि इस बारे में दिमाग़ खुला रखना चाहिए.

जैवविज्ञानी और ' वेरायटी ऑफ़ लाइफ़' नामकी किताब के लेखक कॉलिन टज कई अजीबोगरीब जीवों का उदाहरण देकर कहते हैं कि कुछ भी सच साबित हो सकता है.
 
 
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