फ़ेक न्यूज़ पर नरेंद्र मोदी ने पलटा स्मृति इरानी का फ़ैसला

  • 3 अप्रैल 2018
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केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी के फ़ेक न्यूज़ लिखने वाले पत्रकारों को ब्लैकलिस्ट करने के फ़ैसले को वापस ले लिया गया है.

प्रेस इन्फ़ॉर्मेशन ब्यूरो के डीजी फ़्रैंक नरोन्हा ने इसकी जानकारी दी.

उन्होंने लिखा है, "प्रधानमंत्री ने निर्देश दिया है कि फ़ेक न्यूज़ को लेकर जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई थी उसे वापस लिया जाए और इस मामले को केवल भारतीय प्रेस परिषद में ही उठाया जाना चाहिए."

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी ने ट्वीट किया, "फ़ेक न्य़ूज़ को लेकर बहस पैदा हो गई है. कई पत्रकार और संस्थाएं इसको लेकर सुझाव दे रहे हैं. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को खुशी होगी अगर फेक न्यूज़ को लेकर हम साथ आ सकें. इच्छुक पत्रकार मुझसे मिल सकते हैं."

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क्या था सरकार का फ़ैसला?

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने फ़ेक न्यूज़ को लेकर आदेश जारी किया था.

इस आदेश के मुताबिक, अगर कोई पत्रकार फ़ेक यानी फ़र्जी न्यूज़ लिखकर या प्रचार-प्रसार करता है, तो उसे ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है.

कहा गया कि इस बारे में फ़ैसला 'प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया' और न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स असोसिएशन (एनबीए) करेंगी.

ये दोनों प्रिंट और टेलीविज़न मीडिया की दो नियामक संस्थाएं हैं.

वापस लिए गए इस नियम के मुताबिक़, फ़ेक न्य़ूज़ के मामले में दोषी पाए गए पत्रकारों की मान्यता स्थायी या अस्थायी तौर पर रद्द की जा सकती थी.

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सोशल पर चर्चा

सरकार के फ़ैसला लेने और पलटने की चर्चा सोशल मीडिया पर भी है. जो पत्रकार, इस फ़ैसले पर आपत्ति जता रहे थे वो अब इसको पलटने की तारीफ कर रहे हैं.

कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो इस पर चुटकी ले रहे हैं.

ट्विटर हैंडल @RoflGandhi_ ने स्मृति इरानी की एक सीरियल की रोती हुई तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, ''जब आपका परिवार आपके प्रस्ताव को न माने और उसे कूड़ेदान में डाल दे.''

बरखा दत्ता ने नए ट्वीट में लिखा- सरकार ने फेक न्यूज़ को लेकर किया फैसला वापस ले लिया है.

इससे पहले बरखा दत्त ने लिखा था, "ट्रंपनुमा माहौल फिज़ाओं में है. ये फ़ेक न्यूज़ की लड़ाई है, जहां मीडिया दुश्मन है. हालांकि एक वैकल्पिक वास्तिवकता से वॉट्सऐप पर 'पोस्टकार्ड' भेजने जारी हैं. जिसे 'वैकल्पिक तथ्य' भी बताया गया."

वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने ट्विटर पर लिखा, "सरकार का फ़ैसला मुख्यधारा मीडिया पर हमला है. ये राजीव गांधी के एंटी-मानहानि बिल लाने जैसी ही स्थिति है. पूरे मीडिया को अपने मतभेदों को भूलकर इसका विरोध करना चाहिए."

शेखर गुप्ता ने उस दौरान पत्रकारों के विरोध प्रदर्शन की एक तस्वीर को री-ट्वीट भी किया. इस तस्वीर में खुशवंत सिंह, रामनाथ गोएनका, कुलदीप नैय्यर, अरुण शौरी दिखाई दे रहे हैं.

तहसीन पूनावाला ने ट्वीट किया, "फ़ेक न्यूज़ बताकर पत्रकारों की मान्यता रद्द करने का फैसला परेशान करने वाला है. ये प्रेस की आज़ादी पर बड़ा हमला है."

कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला लिखते हैं, "इंटरनेट पर अपने कई झूठों की वजह से पकड़ी गई मोदी सरकार अब आज़ाद आवाज़ों पर भ्रामक नियम लाना चाहती है."

पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी लिखती हैं, "प्रिय प्रधानमंत्री कार्यालय आपकी सरकार औद्योगिक स्तर पर फ़ेक न्यूज़ को बेचती है. स्मृति ईरानी के आज़ादी पर हमला करने वाले कदम पर रोक लगाइए."

टीवी मीडिया से जुड़े मानक गुप्ता लिखते हैं, "शिकायत दर्ज होते ही पत्रकार सस्पेंड. क्या यही नियम सरकार के मंत्री अपने लिए लागू करेंगे. फ़ेक न्यूज़ की परिभाषा भी बता देते."

पत्रकार निशांत चतुर्वेदी ने लिखा, "चलिए ये तो अच्छा हुआ कि फ़ेक न्यूज़ बनाने वाले पत्रकारों की मान्यता रद्द होगी. लेकिन झूठ वादे करने वाले राजनेताओं की मान्यता कब रद्द होगी."

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आम लोग भी उठा रहे थे सवाल?

अश्विन लिखते हैं, "स्मृति इरानी से मेरा सवाल है कि इस फैसले के निशाने पर मान्यता प्राप्त पत्रकार क्यों हैं? वो हमेशा बकवास ख़बरें नहीं देते. लेकिन उन असली फ़ेक न्यूज़ देने वाले दैत्यों का क्या, जो सोशल मीडिया पर हैं और वो पत्रकार जो मान्यता प्राप्त नहीं हैं."

कृष्ण प्रताप सिंह ने ट्वीट किया, "पहले वो चार साल तक असली दिखने वाली फ़र्जी ख़बरें बनाएंगे. अब जब वो सरकार और सत्ता में लगातार फेल हो रहे हैं तो वो असली न्यूज़ को फ़ेक बताना चाह रहे हैं."

शादाब ख़ान ने लिखा, "बिना चुनाव जीते फ़र्ज़ी तरीके से मंत्री बनना और आजतक फ़र्ज़ी डिग्री लेकर घूमने वाले आज फ़ेक़ न्यूज़ पर कानून बना रहे हैं. वाह."

स्वप्निल लिखते हैं, "भारत और भारतीय मीडिया ज़रूरत से ज़्यादा आज़ाद है. अब कुछ नियमों की ज़रूरत है."

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