कमल का दामन छोड़कर हाथी पर चढ़ेंगी बीजेपी की 'बाग़ी' सांसद सावित्री बाई फुले?

  • 4 अप्रैल 2018
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दलितों के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी में बाग़ी सुर अपनाने वाली सांसद सावित्री बाई फुले बीते कुछ दिनों से चर्चा में हैं.

एक अप्रैल को लखनऊ में 'भारतीय संविधान बचाओ रैली' में फुले ने कहा था, ''कभी कहा जा रहा है कि संविधान बदलने के लिए आए हैं. कभी कहा जा रहा है कि आरक्षण को ख़त्म करेंगे. बाबा साहेब का संविधान सुरक्षित नहीं है."

बीबीसी हिंदी के रेडियो संपादक राजेश जोशी और संवाददाता इक़बाल अहमद ने दिल्ली में सावित्री बाई फुले से फ़ेसबुक लाइव में बात की. इस बातचीत के दौरान सावित्री बाई फुले ने बीजेपी से मतभेद और बसपा में जाने के सवालों के जवाब दिए.

सावित्री बाई फुले
Image caption सावित्री बाई फुले

संविधान को किन लोगों से ख़तरा है? इस सवाल के जवाब में पूरी बातचीत के दौरान सावित्री फुले किसी का नाम तो नहीं लेती हैं लेकिन कहती हैं- आप सब जानते हैं कि वो कौन लोग हैं.

हालांकि फुले ऐसा बताते हुए उन बयानों का ज़िक्र ज़रूर करती हैं जो हाल ही में मोदी सरकार के मंत्रियों ने संविधान बदलने को लेकर दिए थे.

सावित्रीबाई फुले
Image caption बीबीसी के राजेश जोशी और इकबाल अहमद सावित्री बाई फुले के साथ

पढ़िए, सावित्री बाई फुले की कही ख़ास बातें-

अख़बारों, टीवी चैनलों और रेडियो के माध्यम से आपको पता चला होगा कि कभी संविधान बदलने की बातें होती हैं, कभी समीक्षा करने की तो कभी आरक्षण ख़त्म करने की.

अगर भारत का संविधान या आरक्षण ख़त्म हो जाएगा तो बहुजनों का अधिकार ख़त्म हो जाएगा.

अगर आज बहुजन समाज के लोग आईएएस, पुलिस, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने का सपना देख रहे हैं तो वो बाबा साहब के बनाए संविधान की वजह से देख रहे हैं.

मेरा कहना ये है कि दुनिया में भारत का संविधान बहुत अच्छा है. इसे पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए.

आज तक कई सरकारें आईं और गईं लेकिन भारत का संविधान पूरी तरह से लागू नहीं किया गया. इस वजह से पिछड़ी जाति के कितने ही लोग झुग्गी झोपड़ी में रहने और मैला ढोने को मजबूर हैं.

सावित्री बाई फुले

राजनीति में कैसे आईं सावित्री बाई फुले ?

मैं जब बहुत छोटी थी और हमारे परिवार के लोग बामसेफ से जुड़े हुए थे. हमारे गुरु अछेवरनाथ कनौजिया से हमारी बात हुई. मायावती तब मुख्यमंत्री थीं.

बहराइच में हुई रैली में हमारे परिवार के लोग गए हुए थे. गुरुजी ने रैली में हमसे भाषण दिलवाया. उस दिन जब मेरे पिता घर लौटे तो वो बोले- अगर मायावती मुख्यमंत्री बन सकती हैं तो मेरी बेटी भी बन सकती है.

पिताजी ने कहा था कि हम अपनी बेटी को मायावती की तरह आगे बढ़ाना चाहता हूं. पिताजी ने उस दिन मुझे गुरुजी को गोद दे दिया. गुरुजी ने मुझे पढ़ाया लिखाया और राजनीति में लेकर आए.

मैं छठी क्लास में पढ़ रही थी तो मुझे स्कॉलरशिप मिलनी थी. मैंने टीचर से कहा कि जब सरकार की तरफ से अनुसूचित जाति के बच्चों को पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिलती है तो हमें मिलनी चाहिए.

उसी वक्त हमारे टीचर ने मुझे स्कूल से निकाल दिया. मैंने तीन साल तक इंतज़ार किया. तब हमारे गुरुजी ने मुझे मायावती से मिलवाया.

मायावती ने ज़िला अधिकारी को आदेश दिया और मेरा एडमिशन हो सका. यहीं से मेरी राजनीति की शुरुआत हुई.

सावित्री बाई फुले

मायावती को छोड़ बीजेपी का दामन थामने की वजह?

कई बार ऐसे राजनीतिक हालात होते हैं कि मुझे बीजेपी में जाना पड़ा.

इसकी वजह ये भी है कि साल 2000 में मायावती ने मुझे पार्टी से निकाल दिया था. इस वजह से मैं बीजेपी में गई.

बीजेपी की टिकट पर मैंने तीन बार विधानसभा चुनाव लड़ा. साल 2012 में मैं विधायक हुई और 2014 में सांसद बनी.

मैं अवसरवाद की राजनीति नहीं करती हूं. मुझे बाबा साहब की वजह से टिकट मिली. अगर संविधान में बहराइच सुरक्षित सीट न होती तो मैं सांसद न बन पाती. मुझे यकीन नहीं है कि कोई (बीजेपी) मुझे टिकट देता.

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किन मुद्दों पर बीजेपी से मेल नहीं खाती फुले की सोच?

मैं विरोध नहीं करती. मैं सांसद बनकर आईं हूं तो ये मेरी ज़िम्मेदारी है कि मैं लोकसभा में संविधान लागू करने की मांग करूं.

मैं मांग करती हूं कि प्रधानमंत्री मोदी से भी कि भारतीय संविधान को पूरी तरह लागू करके बहुजनों को आगे बढ़ाने का काम करें.

भारत का संविधान और आरक्षण को पूरी तरह से लागू करवाने के लिए मुझे जो कुर्बानी देनी पड़े, मैं तैयार हूं.

अभी जिस कानून की बात हो रही है, उसके बनने से पहले भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति और आदिवासी महिलाओं के साथ गांव फूंक दिए जाते हैं. सामूहिक बलात्कार और शोषण होता था.

तब संसद में कानून बना कि अगर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का कोई शोषण करेगा तो कानून के दायरे में उसको कड़ी सजा दी जाएगी. लोग उस कानून से डरते थे.

दो अप्रैल को भारत बंद के दौरान जो खूनी क्रांति हुई, उसके लिए कानून के साथ खिलवाड़ करने वाला वो शख़्स है जो सुप्रीम कोर्ट गया है. ऐसे व्यक्ति को कड़ी सजा होनी चाहिए.

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चार साल तक चुप क्यों रहीं सावित्री?

मैं चुप नहीं रही. भारत में पिछड़ी, अनुसूचित जाति, जनजाति और आदिवासी महिलाओं के साथ जो हो रहा है. तेल डालकर फूंका जा रहा है.

देश में संविधान निर्माता की मूर्ति तोड़ी जा रही है. मैं पूछना चाहती हूं कि बाबा साहेब की मूर्ति तोड़ने वालों के ख़िलाफ क्यों कार्रवाई नहीं हो रही.

2014 में लोकसभा में दलितों के मुद्दे को मैंने उठाया. मैं लगातर महिलाओं और पिछड़ों की आवाज़ उठाती रही हूं. मैं भारत सरकार से मांग करती हूं कि बहुजनों के ख़िलाफ अत्याचार करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाए.

(इस बातचीत के दौरान राजेश जोशी ने कई बार फूले से सवाल किया कि यूपी और केंद्र दोनों में आपकी सरकार है, आपकी सरकार क्यों क़दम नहीं उठाती? कई बार पूछे जाने पर भी फुले ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया.)

सावित्री

बसपा में शामिल होंगी सावित्री?

जब सही वक्त आएगा, तब देखा जाएगा.

अभी तो मैं हक, न्याय की लड़ाई और संविधान को लागू कराने के लिए सड़क से संसद तक आवाज़ उठा रही हूं. इस काम के लिए मुझे गली-गली भी भटकना पड़ा तो मैं जाऊंगी.

मैं पूरे भारत के बहुजनों को संगठित करुंगी. भारत जब तक एक नहीं होगा, तब तक भारत का संविधान पूरी तरह से लागू नहीं होगा, पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं होगा.

मेरे पास संवैधानिक अधिकार है. अगर कोई कहे कि मैं ऐसा न करूं तो ये हमारे अधिकार छीनना है. मैं ये लड़ाई लड़ती रहूंगी, फिर चाहे मुझे शहीद ही हो जाना पड़ा.

भारत राष्ट्र के साथ जो छेड़छाड़ करने की कोशिश करेगा, वो मिट जाएगा. मैं भारत राष्ट्र से सहमत हूं.

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सपा-बसपा गठबंधन को कैसे देखती हैं सावित्री?

  • गठबंधन बनता है और बिगड़ता है. गठबंधन विचारधारा पर निर्भर करता है. दल के लोग ही तय करते हैं.
  • देश में 85 फीसदी बहुजन समाज है. मैं जातीय जनगणना की मांग करती हूं. भारत सरकार इसे कराए. इसके आधार पर पता चलेगा कि किस जाति में कितने लोग अमीर हैं और कितने लोग ग़रीब हैं.

फुले बातचीत के आख़िर में मायावती और कांशीराम के नारे 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी' का ज़िक्र करती हैं और अपने बागी सुरों की वजह और भविष्य की संभावनाओं की ओर इशारा कर जाती हैं.

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