सोशल: ट्विटर पर क्यों ट्रेंड हो रहा है #MeTooUrbanNaxal

  • 29 अगस्त 2018
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पुणे पुलिस के पांच बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने का मामला चर्चा में है.

देश के कई हिस्सों में मंगलवार को हुई छापेमारी और गिरफ्तारी के बाद इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें रिमांड पर भेजने से इनकार कर दिया.

सभी गिरफ़्तार लोग अपने घर में नज़रबंद रहेंगे. अगली सुनवाई छह सितंबर को होगी.

जिन पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उनमें वामपंथी विचारक वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस जैसे नाम शामिल हैं. कुछ लोगों को घर पर नज़रबंद भी किया गया है.

ये सभी लोग अलग-अलग मौकों पर सरकार की आलोचना करते रहे हैं.

पुणे पुलिस के जॉइंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (लॉ एंड ऑर्डर) शिवाजी बोडखे ने बीबीसी से बातचीत में गिरफ्तार लोगों को "माओवादी हिंसा का दिमाग़" बताया है.

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कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, सोशल मीडिया पर चर्चा

सोशल मीडिया पर इन गिरफ्तारियों को लेकर मिली जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. इनमें गिरफ्तारी को सही ठहराने वाले लोग भी शामिल हैं और गलत बताने वाले भी.

'बुद्धा इन ट्रैफिक जाम' फ़िल्म बना चुके विवेक अग्निहोत्री ने मंगलवार को एक ट्वीट किया.

उन्होंने लिखा, ''मुझे कुछ ऐसे युवाओं की ज़रूरत है, जो ऐसी लिस्ट बना सकें जो #UrbanNaxals यानी शहरी नक्सलियों का बचाव कर रहे हैं. अगर आप इस काम में जुड़ना चाहते हैं तो मुझे बताएं.''

विवेक अग्निहोत्री के इस ट्वीट पर सैकड़ों लोगों ने प्रतिक्रियाएं दी.

इस हैशटैग के जवाब में फ़ेक न्यूज़ का पर्दाफाश करने वाली वेबसाइट एल्ट न्यूज़ से जुड़े प्रतीक सिन्हा ने एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखी.

इस पोस्ट में प्रतीक ने लिखा, ''आप जानते हैं कि एंटी-नेशनल टर्म अब अस्तित्व में नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि हममें से ज़्यादातर लोगों ने अपने आप को एंटी-नेशनल बताते हुए इस टर्म को एक चुटकुले में बदल दिया. अब ये आपत्तिजनक नहीं, बस एक मज़ाक है. ऐसे में इन लोगों को एक नए टर्म की ज़रूरत है जो अर्बन नक्सल है. आइए इस टर्म को भी एक चुटकुले में बदलते हैं. #MeTooUrbanNaxal यानी मैं भी अर्बन नक्सल हूं. आप क्या हैं?''

इस पोस्ट को लिखे जाने के कुछ देर बाद से #MeTooUrbanNaxal ट्विटर पर टॉप ट्रेंड है.

इस हैशटैग के साथ दोनों तरफ के लोग अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं.

पत्रकार सागरिका घोष ने विवेक अग्निहोत्री के अर्बन नक्सल टर्म को कहने का एक नया पहलू बताने की कोशिश की. उन्होंने ट्वीट किया है कि क्या ये फिल्मकार अपनी किताब का प्रमोशन कर रहे हैं. दरअसल विवेक अर्बन नक्सल नाम से एक किताब लिख चुके हैं.

माना जाता है कि सरकार के ख़िलाफ़ हथियार उठाने वाले नक्सली ग्रामीण इलाकों और जंगली क्षेत्र में रहते हैं. लेकिन अर्बन नक्सल से यहां मायने शहरों में बसे उन लोगों से है, जो इन नक्सलियों से सहानुभूति रखते हैं.

यूपीए सरकार में गृहमंत्री रह चुके पी चिदंबरम भी ऐसे लोगों के लिए अर्बन नक्सल टर्म का इस्तेमाल कर चुके हैं.

अक्षय गुप्ता लिखते हैं, ''मुझे यकीन है कि अगर आज भगत सिंह होते तो वो भी इस लिस्ट में शामिल होते.''

@Babu_Bhaiyaa हैंडल से लिखा गया, ''बीते कुछ सालों में लोग 'मैं भी अन्ना हूं' से 'मैं भी अर्बन नक्सली हूं' तक पहुंच गए हैं. 2019 में अगर मोदी जीत गए तो ये लोग 'मैं भी हाफिज़ सईद' और 2023 में 'मैं भी लादेन' जैसे नारे लगा सकते हैं.''

अशफाक मसूदी ने ट्वीट किया, ''उन सभी लोगों को प्यार और सम्मान जो #MeTooUrbanNaxal के साथ अपनी बात कह रहे हैं. लेकिन ऐसे भी लोग हैं जो अपनी जाति, धर्म या आर्थिक स्थिति की वजह से ये बात भी नहीं कह सकते. वो बस इतना जानते हैं कि अगर कोई हिट लिस्ट बन रही है तो सबसे पहले उन्हें चुना जाएगा.''

यशवंत देशमुख ने ट्वीट किया, ''दोस्तों, मुझे बताया गया कि इमरजेंसी जैसा माहौल है. लोगों को बोलने की इजाज़त नहीं है. आप पीएम की आलोचना नहीं कर सकते. सरकार के ख़िलाफ़ भी कुछ नहीं बोल सकते. और हाल ये है कि #MeTooUrbanNaxal ट्विटर पर टॉप ट्रेंड है.''

कांग्रेस प्रवक्ता संजय झा ने ट्वीट किया, ''मैं अरुंधति रॉय की किताब ब्रोकन रिपब्लिक पढ़ रहा हूं. आइए मुझे गिरफ्तार कीजिए. #MeTooUrbanNaxal''

दिल्ली में इतिहासकार एस इरफान हबीब ने लिखा, ''पांच कथित अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी और प्रताड़ना राजनीतिक असहमति को अपराध की श्रेणी में डालने की कोशिश है.''

कब हुई थी भीमा कोरेगांव की घटना?

महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव की 200वीं बरसी के मौक़े पर भीमा नदी के किनारे पर जनवरी में स्थित स्मारक के पास पत्थरबाज़ी हुई थी और आगज़नी की घटनाएं हुईं थीं.

कहा जाता है कि भीमा कोरेगांव की लड़ाई एक जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना और पेशवाओं के नेतृत्व वाली मराठा सेना के बीच हुई थी.

इस लड़ाई में महार जाति ने ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लड़ते हुए मराठाओं को मात दी थी. महाराष्ट्र में महार जाति को लोग अछूत समझते रहे हैं.

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Image caption सुधा भारद्वाज

कौन हैं वो पांच लोग, जिन्हें किया गया गिरफ्तार

  • गौतम नवलखा: मशहूर ऐक्टिविस्ट हैं, जिन्होंने नागरिक अधिकार, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार के मुद्दों पर काम किया है. वे अंग्रेज़ी पत्रिका इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) में सलाहकार संपादक के तौर पर भी काम करते हैं.
  • सुधा भारद्वाज: वकील और ऐक्टिविस्ट हैं. दिल्ली के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में गेस्ट फ़ैकल्टी के तौर पर पढ़ाती हैं. सुधा ट्रेड यूनियन में भी शामिल हैं और मज़दूरों के मुद्दों पर काम करती हैं.
  • वरवर पेंड्याला राव: वामपंथ की तरफ़ झुकाव रखने वाले कवि और लेखक हैं. वो 'रेवोल्यूशनरी राइटर्स असोसिएशन' के संस्थापक भी हैं. वरवर वारंगल जिले के चिन्ना पेंड्याला गांव से ताल्लुक रखते हैं.
  • अरुण फ़रेरा: मुंबई के बांद्रा में जन्मे अरुण फ़रेरा मुंबई सेशंस कोर्ट और मुंबई हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं. वो अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट और देशद्रोह के अभियोग में चार साल जेल में रह चुके हैं.
  • वरनॉन गोंज़ाल्विस: मुंबई में रहने वाले वरनॉन गोंज़ाल्विस लेखक-कार्यकर्ता हैं. वो मुंबई विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडलिस्ट हैं और मुंबई के कई कॉलेजों में कॉमर्स पढ़ाते रहे हैं. उन्हें 2007 में अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया गया था. वो छह साल तक जेल में रहे थे.

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