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गुरुवार, 08 मई, 2003 को 20:02 GMT तक के समाचार
जीएसएलवी का सफल प्रक्षेपण
जीएसएलवी-डी2 का श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण
जीएसएलवी-डी2 का श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण

भारत ने स्वदेश में निर्मित रॉकेट जीएसएलवी-डी2 का सफल प्रक्षेपण किया है.

प्रक्षेपण के कुछ ही देर बाद इस 49 मीटर लंबे रॉकेट ने तक़रीबन 1800 किलो का एक परीक्षण संचार उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान यानि इसरो का कहना है कि किसी भी भारतीय रॉकेट का छोड़ा हुआ ये सबसे भारी उपग्रह है.

भारत में इसके साथ ही उम्मीद जागी है कि वह अपने उपग्रह छोड़ सकेगा और उपग्रह प्रक्षेपण के आकर्षक व्यावसायिक बाज़ार में उतर सकेगा.


वैज्ञानिकों को बधाई दी कस्तूरीरंगन ने
रॉकेट ने जैसे ही उड़ान भरी बंगलौर स्थित इसरो के मुख्यालय में मौजूद सैकड़ो वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने ख़ुशियाँ मनाईं और एक दूसरे को बधाइयाँ भी दीं.

संस्थान के प्रमुख डॉ के कस्तूरीरंगन ने इस मौके पर वैज्ञानिकों से कहा,"ये हमारे लिए काफी बड़ा दिन है. आपके काम ने हमारा सिर ऊँचा किया है."

वर्ष 2001 में भारत पहला 'जिओ-सिंक्रोनस' यानि भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान लाया था,जिससे तक़रीबन डेढ़ हज़ार किलो का उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा गया था.

मगर ये अभियान विफल हो गया था और उपग्रह अंतरिक्ष में निर्धारित जगह नहीं पहुँच सका था.

व्यावसायिक बाज़ार

जीएसएलवी एक ऐसा आदर्श रॉकेट है जिससे दो हज़ार किलो तक का उपग्रह छोड़ा जा सकता है और अमरीका, रूस या फ़्रांस के मुक़ाबले भारत इसे काफ़ी कम क़ीमत पर मुहैया भी करा सकता है.


एक बार अगर जीएसएलवी अधिकृत हो जाए तो इससे भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा

डॉ के कस्तूरीरंगन
कई अरब डॉलर के इस बाज़ार में अभी तक इन्हीं तीनों देशों का प्रभुत्व है.

इस बारे में डॉ कस्तूरीरंगन ने कहा,"एक बार अगर जीएसएलवी अधिकृत हो जाए तो इससे भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा."

भारत को उम्मीद है कि इस दशक के अंत तक जीएसएलवी अधिकृत रूप से काम करना शुरू कर देगा.

भारत अपने ही देश में बने ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यानों के ज़रिए पहले ही रिमोट सेंसिंग उपग्रहों के क्षेत्र में उपस्थिति दर्ज़ करा चुका है.

दक्षिण कोरिया, जर्मनी और बेल्जियम से इसरो सफलता पूर्वक पहले ही माइक्रो उपग्रह प्रक्षेपित कर चुका है.

प्रतिबंध

पहले जीएसएलवी का प्रक्षेपण विफल हो जाने के बाद अंतरिक्ष कार्यक्रम के अधिकारी इस प्रक्षेपण को ख़ासा महत्व दे रहे हैं.


ये हमारे लिए काफी बड़ा दिन है. आपके काम ने हमारा सिर ऊँचा किया है

डॉ कस्तूरीरंगन
भारत जीएसएलवी के लिए अभी तक रूस की क्रायोजेनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर रहा है मगर वर्ष 2005 तक अपने ही देश में बने क्रायोजेनिक इंजन के इस्तेमाल के प्रयास भी चल रहे हैं.

वैसे भारत के जीएसएलवी कार्यक्रम पर अमरीकी प्रतिबंधों की मार भी पड़ी है.

सबसे पहले 1992 में जब इसरो ने क्रायोजेनिक इंजन की प्रौद्योगिकी के लिए रूस से सौदा किया तो उस पर प्रतिबंध लगे थे. उस समय अमरीका ने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम पर प्रक्षेपास्त्र प्रौद्योगिकी नियंत्रण के उल्लंघन का आरोप लगाया था.

अमरीका का कहना था कि इसरो भारतीय फ़ौजों को प्रक्षेपास्त्र बनाने में मदद दे रहा है लेकिन भारत ने इन आरोपों का खंडन किया था.

इसके बाद जब भारत ने 1998 में परमाणु परीक्षण किए तब अमरीका ने दूसरी बार भारत पर प्रतिबंध लगा दिए थे.

डॉ कस्तूरीरंगन के मुताबिक अमरीका ने दोहरे इस्तेमाल वाली प्रौद्योगिकी के आयात पर लगा प्रतिबंध हटा दिया है और अंतरिक्ष सहयोग के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच रिश्ते भी मजबूत हो रहे हैं.
 
 
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