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रविवार, 13 जुलाई, 2003 को 06:01 GMT तक के समाचार
भीष्म साहनी का अंतिम संस्कार
तमस धारावाहिक में भीष्म साहनी ने ख़ुद भी भूमिका निभाई थी
तमस धारावाहिक में भीष्म साहनी ने ख़ुद भी भूमिका निभाई थी

  भीष्म साहनी से कुछ महीने पहले हुई ललित मोहन जोशी की बातचीत सुनिए

भारत के प्रख्यात साहित्यकार भीष्म साहनी की शनिवार को अंत्येष्टि कर दी गई है.

उनका शुक्रवार को दिल्ली में निधन हो गया था.

भीष्म साहनी को सात जुलाई को दिल का दौरा पड़ने पर दिल्ली के एस्कॉर्ट अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

उनके निधन के साथ ही प्रगतिशील साहित्यिक धारा का एक मज़बूत स्तंभ गिर गया है.


भीष्म साहनी से बीबीसी की बातचीत

उनसे पहले इस धारा के कैफ़ी आज़मी, सरदार जाफ़री और फ़िल्मकार-साहित्यकार बलराज साहनी जैसे लोग दुनिया को अलविदा कह चुके हैं.

उन्होंने अपनी आत्मकथा 'आज के अतीत' कुछ ही दिन पहले पूरी की थी जिसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.

तमस

भीष्म साहनी अपने उपन्यास तमस से साहित्य जगत में बहुत लोकप्रिय हुए थे. तमस को 1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार के सम्मानित किया गया था.

तमस भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय हुए सांप्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास था जिसका अनुवाद 1988 में अंग्रेज़ी में भी हुआ था.

तमस अपनी साहित्यक विशेषता के लिए पूरी दुनिया में जाना गया. इस उपन्यास पर टेलीविज़न धारावाहिक भी बना.


भीष्म साहनी ने बटवारे पर बहुत कुछ लिखा
सांप्रदायिक दंगों की त्रासदी की कहानी को जिस सशक्त तरीक़े से तमस में उकेरा गया वह साहित्य जगत की एक धरोहर बन गया है.

भीष्म साहनी का जन्म आज के पाकिस्तानी शहर रावलपिंडी में आठ अगस्त, 1915 को हुआ था.

उन्होंने विभाजन की त्रासदी को अपनी आँखों से देखा और महसूस किया था इसलिए उनकी ज़िंदगी के साथ साथ उनके साहित्य सृजन पर भी उसका गहरा असर पड़ा.

उनका कहना था कि सांप्रदायिक हिंसा का असल शिकार दोनों ही समुदायों के आम लोग होते हैं

भीष्म साहनी ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था.

मार्च 1947 में जब रावलपिंडी में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे तब उन्होंने प्रभावितों की मदद के लिए काम किया.

थिएटर

भीष्म साहनी थिएटर की दुनिया से भी नज़दीक से जुड़े रहे और उन्होंने इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन इप्टा में काम करना शुरू किया जहाँ उन्हें बड़े भाई बलराज साहनी की सरपरस्ती मिली.

भीष्म साहनी ने मशहूर नाटक भूत गाड़ी का निर्देशन भी किया जिसके मंचन की ज़िम्मेदारी ख़्वाजा अहमद अब्बास ने ली थी.

1950 में उन्होंने दिल्ली कॉलेज में अंग्रेज़ी के लेक्चरर के रूप में सेवाएं शुरु कीं.

भीष्म साहनी मॉस्को में 1957 से 1963 तक रहे जहाँ उन्होंने हिंदी भाषा के प्रोत्साहन और रूसी भाषा से साहित्यिक अनुवाद भी किया.

भीष्म साहनी हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा उर्दू, संस्कृत, रूसी और पंजाबी भाषाओं के अच्छे जानकार थे.
 
 
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