'पाकिस्तान भी परमाणु पनडुब्बी बनाए'

पनडुब्बी
Image caption भारत परमाणु पनडुब्बी हासिल करने वाला छठा देश है

भारतीय बेड़े में परमाणु पनडुब्बी शामिल होने के बाद पाकिस्तान के एक पूर्व एडमिरल ने ऐसी ही क्षमता हासिल करने की ज़रूत बताई है.

हालांकि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्पष्ट किया है कि उनके देश की नीति आक्रामक नहीं है और न ही पनडुब्बी का मक़सद धमकी देना है.

परमाणु ताकत से लैस पनडुब्बी अरिहंत समुद्र में उतार देने के बाद भारत ऐसी क्षमता हासिल करने वाला दुनिया का छठा देश बन गया है.

पाकिस्तान की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया तो नहीं आई है लेकिन पूर्व एडमिरल इफ़्तिख़ार सिरोही ने कहा है कि पाकिस्तान को इसे गंभीरता से लेना चाहिए.

उन्होंने बीबीसी से कहा, “हम तो चाहते हैं कि हिंद महासागर परमाणु हथियार मुक्त रहे लेकिन भारत सुपरपावर बनना चाहता है. वह सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट चाहता है. अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है, इसलिए वह इस पर पैसा खर्च कर सकते हैं.”

वो कहते हैं, “पहले उन्होंने रूस से पनडुब्बी उधार ली अब ख़ुद बना ली. हम भी परमाणु शक्ति संपन्न है. हमारे पास भी तकनीक है.”

एडमिरल सिरोही का कहना है कि अब ज़रूरी हो गया है कि पाकिस्तान भी भारत के इस क़दम का जवाब दे.

मगर क्यों, इस पर वो कहते हैं, “हम ताउम्र भारत पर विश्वास नहीं कर सकते. उन्होंने 1974 में परमाणु परीक्षण किया तो हमने 1998 में किया. जब उन्होंने पांच किए तब हमने छह. इसलिए इससे पाकिस्तान की सेहत पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.”

असाधारण क्षमता

भारत के पूर्व एडमिरल विष्णु भागवत कहते हैं कि इस क्षमता का पाकिस्तान या चीन से कोई लेना देना नहीं है.

उनका कहना है, “ये दोनो हमारे ना तो स्थानीय दुश्मन हैं ना दोस्त. हमारी नीति है कि हम पहले हमा नहीं करेंगे, इसलिए ज़रूरी था कि पहले अगर हम पर हमला हुआ तो आक्रमण का जवाब देने के लिए ‘सेकेंड स्ट्राइक’ क्षमता हो.”

एडमिरल भागवत बताते हैं कि बैट्री और डीज़ल की पनडुब्बी कारगर नहीं क्योंकि उन्हें कुछ ही घंटों में समुद्र के ऊपर आना पड़ता है जबकि अरिहंत समुद्र के नीचे लंबे समय तक रह सकता है.

उनका मानना है कि जिनके पास ऐसी क्षमता है उन्हें कोई भी हल्के में नहीं ले सकता और एक तरह से यह ब्रह्मास्त्र है.

एडमिरल भागवत कहते हैं कि अरिहंत से भारतीय सामरिक क्षमता का विस्ता हुआ है लेकिन यह पहले ही हो जाना चाहिए था.

वो बताते हैं, “इसमें असाधारण समय लगा है. सबसे पहले 1968 में इंदिरा गांधी ने तत्कालीन रक्षा मंत्री को परमाणु पनडुब्बी का प्रस्ताव दिया था. लेकिन इतनी देरी हो गई.”

एडमिरल भागवत बताते हैं, “अमरीका के एडमिरल रिकोवर ने इस तरह का सबमरीन चार साल में बना लिया, रूस के इंजीनियर एडमिरल कोटोव ने भी चार साल में इसका निर्माण कराया और चीन ने आठ साल लगाए.”

वो कहते हैं, “भारत में इतनी देरी होने के कई कारण रहे. शुरु में तो इस परियोजना के कर्ता धर्ता ग़लत दिशा में गए. उसके बाद हमारी असमर्थता सामने आती रही.”

संबंधित समाचार