अफ़ग़ान चुनाव पर सिखों की भी नज़र

अफ़ग़ानिस्तान में गुरुद्वारा
Image caption अफ़ग़ानिस्तान में सिखों की भी इस चुनाव पर नज़र लगी है

काबुल के कारते परवान क्षेत्र पहुँचते ही जो नज़ारा दिखता है वो है एक नई सड़क के निर्माण का काम और सड़क किनारे के घर जिन्हें तोड़ दिया गया है और यहीं पर है काबुल का एक पुराना गुरुद्वारा. इसे यहाँ धरमसाल कहते है. इस गुरुद्वारे में और इसके आस-पास कई सिख परिवार रहते है.

कई सिख पुरुष अकेले ही रहते हैं और व्यापार करते हैं. वे समय-समय पर भारत जाकर बीवी बच्चों से मिल आते हैं.

तिरलोक सिंह का परिवार सदियों से अफ़गानिस्तान में रहा मगर वह कहते हैं, "उन्नीस सौ बानवे में जब कम्युनिस्टों और मुजाहिदीन की लड़ाई हुई तब सिखों को घर-बार छोड़ कर भागना पड़ा."

वह भी भारत चले गए और चार साल पहले करज़ई सरकार के गठन के बाद लौट आए हैं. आज वह यहाँ कपड़े की दुकान चलाते है. कमाई से ज़्यादा वह यहाँ अपनी संपत्ति पर फिर क़ब्ज़ा करने लौटे हैं.

एक अनुमान के अनुसार आज पचास हज़ार की जगह देश भर में केवल एक हज़ार सिख परिवार बचे होंगे.

मगर आज भी परेशानियाँ कम नहीं हैं. मुख्यधारा से जुड़ाव सिखों का वैसा नहीं है जैसा कि सदियों से बसे लोगों का होना चाहिए.

आज भी सिख कहते है कि वे यहाँ मुसलमानों के हाथ का खाना नहीं खाते और उनके साथ शादियाँ भी नहीं होती. गुरबचन सिंह के बच्चे दिल्ली में हैं और वह कहते हैं, "यहाँ मदरसों में हमारे बच्चे पढ़ नहीं सकते, उन्हे बहुत छेड़ा जाता है. जो बच्चे यहाँ रह भी गए हैं वे अनपढ़ रह गए हैं.’’

दया सिंह चुनाव आयोग की मदद कर रहे हैं पर कहते हैं कि अल्पसंख्यक हिंदू और सिखों की समस्या जस की तस बनी हुई है.

उनके अनुसार, "करज़ई सात साल से देश की कमान सँभाले हैं आज तक उन्होंने हमें बसाने के लिए एक टुकड़ा ज़मीन नहीं दी. हम आज भी विस्थापितों की तरह रह रहे हैं. रिफ्यूजी की तरह गुरुद्वारों में रह रहे है. जो कसर बची थी वो सड़क निर्माण के नाम पर हमारे घर तोड़ कर पूरी कर ली गई."

विकराल समस्या

Image caption गुरुद्वारे के ग्रंथी सतबीर सिंह ने अफ़ग़ानिस्तान में जीवन की नई राह पाई है

मगर मसला सिर्फ़ जीवन का ही नहीं है बल्कि मृत्यु के बाद का भी है. वो मसला ये है कि हिंदुओं और सिखों के श्मशान घाट पर स्थानीय लोगों ने क़ब्ज़ा कर लिया है जिसकी वजह से उन्हें अंतिम संस्कार में भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

तिरलोक सिंह कहते है कि नेताओं से गुहार का कोई असर नहीं हुआ... "करज़ई ने क्या किया है. हमारे श्मशान बंद हैं, हम तो मन्नत मानते हैं कि कोई मर न जाए. लड़ाई में हम चले गए थे और उस पर कॉलोनी वालों ने क़ब्ज़ा कर लिया है. अब हम पिछले दो सालों से इस ज़मीन को वापस लेने की कोशिश कर रहे हैं पर कोई मदद नहीं मिल रही. हमें पुलिस बुलाकर सुरक्षा के बीच अंतिम संस्कार करने पड़ रहे है...."

हालात तो काबुल के बाहर आज भी बहुत ख़राब है. राजकौर अपने परिवार के साथ खोस्त में चल रही लड़ाई से बचकर काबुल के इस गुरुद्वारे में शरण लेने पहुँची हैं और कहती हैं कि दिल्ली चली जाएँगी. पर साथ ही कहती हैं, "अफ़गानिस्तान मेरा घर है जैसे ही माहौल अच्छा होगा लौट आऊँगी."

उनकी बेटी सपना का लड़ाई के कारण स्कूल जाना भी बंद हो गया और अब वह कहती हैं कि भारत जाकर ही स्कूल फिर शुरु कर पाएँगी.

पर सतबीर सिंह जैसे कुछ लोग भी हैं जिन्होंने यहाँ आकर जीवन की नई राह पाई है. वह चार साल पहले ग्रंथी बन कर आए थे और यहीं उन्होंने एक स्थानीय अफ़ग़ान सिख लड़की से शादी कर ली है. अब सब बढ़ती हिंसा के बीच स्पष्ट चुनावी नतीजों की कामना कर रहे है ताकि शांति कायम रह सके और अफ़ग़ान सिख भी अपने घर अफ़गानिस्तान में बराबरी का जीवन जी सकें.

संबंधित समाचार

संबंधित इंटरनेट लिंक

बीबीसी बाहरी इंटरनेट साइट की सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है