सुरक्षा है सबसे बड़ा मुद्दा

चुनाव प्रचार
Image caption चुनाव में पैंतीस से ज़्यादा उम्मीदवार खड़े हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में राष्ट्रपति चुनावों की तैयारियाँ ज़ोरो पर है. सड़को के किनारे खंभे और दीवारें पोस्टरों से पटी पड़ी है.

राष्ट्रपति करज़ई के पोस्टर काबुल शहर में सबसे ज़्यादा है. पूरी चुनावी सोच और बातचीत उनके ईर्द-गिर्द ही घूम रही है. यूं लग रहा है कि ये चुनाव करज़ई के भविष्य से जुड़ा है और उनकी नीतियों और कार्यप्रणाली पर एक तरह का जनमत संग्रह है.

पर यहां आज 2004 वाले चुनावो जैसी बात नहीं है जब साफ़ संदेश पहुंचा था कि अमरीका का हाथ करज़ई के साथ है. आज शायद अमरीका का करज़ई के सिर से हाथ न उठा हो पर ये समर्थन संपूर्ण नहीं लगता.

और इसके पीछे है उनकी कार्यशैली और वो सब वादे जो वो पूरे नहीं कर पाए. गुरुवार के राष्ट्रपति चुनावों में 35 से ज़्यादा उम्मीदवार मैदान में है और शायद सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा को लेकर है.

काबुल विश्वविद्यालय के क़ानून और राजनीतिक विभाग में प्रोफ़ेसर नसरुल्ला स्तानकज़ई कहते हैं,‘’सुरक्षा की स्थिति अफ़गानिस्तान की सबसे बड़ी समस्या है. मेरा सुरक्षा से मतलब चुनाव के लिए सुरक्षित माहौल के साथ-साथ आर्थिक सुरक्षा और मानसिक तौर पर सुरक्षित होना तीनों ज़रुरी है."

वो कहते हैं, "ये अफ़गानिस्तान के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण समय है और साथ ही बहुत ख़तरनाक भी. अल क़ायदा, तालेबान, क्षेत्रीय छापामार नेता, सभी सक्रिय है और कुछ पड़ोसी देश जैसे ईरान और पाकिस्तान भी सक्रिय हैं.’’

साथ ही आर्थिक सुरक्षा का मामला भी महत्वपूर्ण है. यहां के 60 प्रतिशत युवाओं के पास नौकरी नहीं है. शुद्घ पेय जल, सड़के , मूलभूत सुविधाएं, अस्पताल सभी की कमी है.

काबुल में आज बिजली है क्योकि वो भी वो तज़ाकिस्तान से ख़रीद रहा है और टीकाकार कहते है कि तालेबान की ताकत भी ये बेरोज़गार है. फिर अफीम के पैसे से यहां फलफूल रहे ड्रग माफिया भी हालत को पेचीदा बनाते है.

उम्मीदें

इस माहौल मे चुनाव का महत्व और बढ़ जाता है. पिछले सात सालों में हामिद करज़ई सरकार की नीतियो में खामिया रही तो ग़लती अंतराष्ट्रीय समुदाय की भी रही. हर देश जिसका अफ्ग़ानिस्तान के भविष्य से वास्ता है वो अलग नीतियों का पालन करता रहा.

Image caption स्तानकज़ई मानते हैं कि सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है.

करज़ई सरकार में भी तरह-तरह के लोग थे जिन्हें सरकार चलाने का तज़ुर्बा भी नहीं था. सरकार के अंदर की अंतर्कलह भी सरकार के ख़राब प्रदर्शन का कारण रही.

पर इन सब के बीच चुनाव में जो उम्मीदवार खड़े हुए है क्या वो बदलाव ला सकते है.

नसरुल्ला स्तानकज़ई कहते है कि चार तरह के उम्मीदवार मैदान में है, ‘’चार-पांच गंभीर उम्मीदवार है, फिर कुछ एसे है जिन्हें मै कहूंगा मानसिक समस्याएं है, फिर वो हैं जो दूसरों का खेल बिगाड़ने के लिए खड़े हुए है और फिर वो हैं जो दूसरी सरकारों की गुप्तचर सेवाओं के जासूस है, और ये सबसे ख़तरनाक हैं.’’

मतदाता की मुश्किल

पर आम मतदाता कहता है कि सब एक से लोग है किसको वोट डालें, ये बड़ी मुश्किल है.

Image caption मौजूदा राष्ट्रपति करज़ई को पश्चिमी देशों का समर्थन घटा है.

डॉक्टर अशरफ़ ग़नी अहमदज़ई को बहुत समझ है, उनको बहुत तज़ुर्बा भी है पर पूरा अफ़ग़ानिस्तान उन्हे नहीं जानता. वे किताबी बाते करते है. केंद्रीय अफ़ग़ानिस्तान हो या उत्तरी क्षेत्र, पश्तून क्षेत्र में भी उनकी पकड़ मज़बूत नहीं है.

दूसरे बड़े उम्मीदवार अब्दुल्ला अब्दुल्ला है. वे जमीयते इस्लामी के सदस्य है जो कि एक कट्टर इस्लामी संगठन है और अफ़ग़ानिस्तान के गृह युद्घ में इस संगठन की बड़ी भूमिका थी.

अबदुल्ला को हज़ारा, उज़्बेक और पश्तून लोगो का ज़्यादा समर्थन प्राप्त नहीं है.

ऐसे मे करज़ई की पहुंच और स्वीकार्यता ज़्यादा लोगो में है और शायद सत्ता में रहने का तज़ुर्बा भी.

पर तालेबान को सरकार में शामिल करने और विदेशी ताकतों को अफ़ग़ान मामलों से बाहर रखने जैसी बाते करने के कारण उन्होंने पश्चिमी देशों का पूर्ण समर्थन खोया है और भ्रष्टाचार, तालेबान की बढ़ती ताकत और अधूरे वादो से अफ़ग़ान जनता का भी उनके प्रति मोहभंग हुआ है.

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