अफ़ग़ानिस्तान में भारत की भूमिका

हिंद, जैसा कि लोग भारत को पुकारते है, की छाप काबुल में हर जगह मिल जाती है. मेरा ड्राइवर अहमद अपनी कार में धर्मेंद्र की तस्वीर रखता है और उसकी गाड़ी में हिंदी गाने चलते रहते है.

शेरशाह सूरी ने सड़क बनाई जिससे काबुल भारत से जुड़ा. आज भारत की कंपनियां तीस साल के युद्ध से नष्ट हुई सड़को को बनाने का काम कर रही है. अस्पतालों और स्कूलों के ज़रिए भारत आपको यहाँ दिख जाता है.

भारत की वजह से काबुल में 22 घंटे बिजली से घर रोशन हो रहे है. और तो और लोकतंत्र में हाल में कदम रखने वाले इस देश के संसद भवन के निर्माण में भी भारत की भूमिका है.

अफ़गानिस्तान में कई परियोजनाओं पर काम कर रही कंपनी बीएससी एंड सी के

उप प्रोजेक्ट मैनेजर राजीव वधावन कहते है, “हमारी कंपनी 2003 से यहाँ काम कर रही है और ज़्यातातर सड़क निर्माण में लगी है. हमने पिछले पांच छ सालो में 500 किलोमीटर से ज़्यादा की सड़क बनाई है.हमने जलालाबाद में काम किया है, त्रिन्कोट, लश्करगाह में किया है और अभी गरदेज़ खोस्त सड़क बना रहे है. हम अफ़गानिस्तान संसद के अलावा भारतीय दूतावास के निर्माण का भी काम कर रहे है’’.

लोगों से जुड़ने की कोशिश

बड़ी-बड़ी परियोजनाओं पर तो काम हो ही रहा है पर भारत सरकार का अब जो़र ऐसी योजनाओं पर है जिसका सीधे सामाजिक क्षेत्र पर असर पड़े.

अफ़ग़ानिस्तान में भारत के राजदूत जयंत प्रसाद कहते है, “हमने पचास छोटी योजनाएँ बनाई हैं जो जल्दी पूरी हो जाएँगी.ये उत्तर में बदख्शान से लेकर दक्षिण में कंधार तक है. ये योजनाएँ सामजिक क्षेत्र में है और इनकी प्रांतीय अधिकारी मांग करते है और हम अफ़ग़ान सरकार की मदद से इन्हें पूरा करवाते है, हम बाकी देशों की तरह काम खुद न कर अफ़ग़ान सरकार के हिसाब से इन्हें करते है और जैसा वे चाहते है वैसा काम करवाया जाता है. इनमे सौर्य उर्जा, सिंचाई परियोजनाएं आदि शामिल हैं जिसका सीधा और जल्द फायदा लोगों तक पहुँचता है.’’

आज यहाँ के प्रमुख टेलीविज़न स्टेशनों पर हिंदी सीरियल दिखाए जाते है.एक समय था जब इनके प्रसारण के समय काबुल की सड़के खाली हो जाती थीं.

पूरा शहर सास बहू की कहानी में उलझा रहता था. आज भी औरतें पूछती हैं इन धारवाहिकों के नायक नायिकाओ के बारे में यानि रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में, चाहे वो टीवी सिरियल ही सही भारत दिख जाता है.

पर इनकी लोकप्रियता से नाराज़ हो कर और इनके समाज पर दुष्प्रभाव को खत्म करने के लिए इन्हें रोकने के लिए दबाव बनाया गया.पर आज भी ये यहाँ दिखाए जाते है. पत्रकार नवाब मोमंद पहले यहां के निजी चैनल टोलो टीवी में काम करते थे वे कहते है कि ‘‘जो मौलवी इन के खिलाफ़ थे वो भी घर पर इन्हीं को देख रहे थे. ’’

फिर हाल में काबुल एक्सप्रेस जैसी फिल्मों की शूटिंग भी यहाँ हुई.

सुरक्षा का सवाल

यहाँ के सिनेमाघरो में बॉलीवुड की फिल्में दिखाई जाती हैं और उनके डीवीडी भी धड़ल्ले से बिकते है. आज भी आपको लोग वो पुल दिखाना नहीं भूलते जहां खुदागावाह की शूटिंग हुई थी.

पर यहां काम करना इतना आसन नहीं.सुरक्षा एक समस्या है. भारत ने यहाँ अपने कई लोग पुनर्निमाण के दौरान हमलो में गवाएं है. आज यहाँ तीन हज़ार भारतीय काम कर रहे है. पर यहाँ वे अकेले ही रहते है, परिवारों को यहाँ लाने की अनुमति नहीं.

राजीव वधावन कहते है की फोन, इंटरनेट के ज़रिए और भारत जा कर वो अपनी बीवी-बच्चों से मिल पाते है.

पर ज़हन में ये सवाल उठता है कि अफ़गानिस्तान के पुनर्वास में भारत की भूमिका के पीछे मंशा क्या है.भारत इसमे क्या फ़ायदा देखता है. जयंत प्रसाद कहते हैं, “ये निष्काम कर्म तो है नहीं. हमें फायदा इसमें है कि

अफ़गानिस्तान के निवासी अपने पैरों पर खडे़ हो जाए,"यहाँ आतंकवाद ख़त्म हो जाए,घुसपैठ ख़त्म हो जाए और ये अपने भविष्य के बारे में फै़सले खुद ले सकें, हमें इतना ही चाहिए. हमें इससे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. उसी में हमारी भी ख़ुशी है और भारत का भी हित है. इसलिए अगर अफ़गा़निस्तान का पुनर्निर्माण होता है तो वो हमारे लिए भी सफलता होगी.”

तो आज एक बार फिर काबुलीवाला मेवे लेकर भारत पहुँच रहा है और पुराना दोस्त हिंदुस्तान अफ़गानिस्तान के लोकतंत्र की ओर बढ़ते छोटे-छोटे कदमों में उसका साथ दे रहा है. शायद इस सहयोग में ही क्षेत्र की स्थिरता और समृद्धि की कुंजी छिपी है.

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