जिन्ना, भारत, विभाजन, आज़ादी!

  • 20 अगस्त 2009
गांधी और जिन्ना
Image caption भारत में जिन्ना विभाजन के ज़िम्मेदार समझे जाते रहे हैं

बात जुलाई 2006 की है जब जसवंत सिंह ने अपनी आत्मकथा “ए कॉल टू ऑनर: इन सर्विस ऑफ़ इमर्जेंट इंडिया” में ज़िक्र किया कि नरसिंह राव के काल में प्रधानमंत्री निवास में एक ऐसा भेदी भी था जो अमरीकियों को ख़ुफ़िया जानकारी दिया करता था.

इस बात पर एक हंगामा खड़ा हो गया. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जसवंत सिंह को चैलेंज किया कि वह उस घर के भेदी का नाम बताएं.

जवाब में मनमोहन सिंह को जसवंत सिंह की ओर से बिना हस्ताक्षर का एक पत्र भेजा गया जिसमें यह स्वीकार किया गया कि उन्होंने प्रधानमंत्री हाउस में अमरीकी जासूस की मौजूद की बात सिर्फ़ शक और अनुमान की बुनियाद पर की थी.

हालांकि अगर जसवंत सिंह चाहते तो वह पारंपरिक राजनेता के तौर पर ये कह कर भी जान छुड़ा सकते थे कि वह जल्द ही या उचित समय पर अमरीकी जासूस का नाम बताएंगे.

जसवंत सिंह की गणना उन गिने चुने वरिष्ठ राजनेताओं में होती है जिन्हें हमेशा वित्त, रक्षा और विदेश मंत्रालय जैसे संवेदनशील मंत्रालय मिलते रहे हैं.

वर्ष 2001 में उन्हें बेहतरीन सांसद के पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया.

बिना पढ़े ही...

इस स्तर का आदमी जब भारत में मोहम्मद अली जिन्ना जैसे विवादास्पद व्यक्तित्व के बारे में अपनी ताज़ा किताब ‘जिन्ना, भारत, विभाजन, आज़ादी’ में परंपरा से हट कर कोई बात करता है और जिन्ना को सेक्युलर, एक महान भारतीय और विभाजन का ज़िम्मेदार होने से ख़ारिज करने का ऐलान करता है तो उस पर फ़ौरन प्रतिक्रिया के बजाए किताब को पढ़ कर उस पर सकारात्मक और नकारात्मक राय क़ायम करना ज़्यादा उचित होता.

भारतीय जनता पार्टी की जिस कमेटी ने 30 साल से पार्टी में शामिल जसवंत सिंह जैसे सीनियर आदमी के निष्कासन का फ़ैसला किया है उससे क्या ये आशा रखी जा सकती है कि उस कमेटी ने फ़ैसला देने से पहले 17 अगस्त को रिलीज़ होने वाली इस किताब को शुरू से आख़िर तक पढ़ा होगा?

जसवंत सिंह ने अपनी ताज़ा किताब की ऐडवांस कॉपी जिन लोगों को भेजी उनमें लालकृष्ण आडवाणी भी शामिल हैं. ये बात इसलिए भी समझ में आती है क्योंकि एलके आडवाणी ने 2005 में कराची में मोहम्मद अली जिन्ना के मज़ार पर हाज़री देने के बाद कहा था कि जिन्ना उन लोगों में शामिल हैं जो न सिर्फ़ सेक्युलर थे बल्कि उन्होंने अपने हाथों इतिहास रचा.

आडवाणी ने जिन्ना के 11 अगस्त 1947 के भाषण का भी हवाला दिया जिसमें उन्होंने राष्ट्र और निजी विश्वास को अलग अलग ख़ानों में रखने की बात की थी.

हिंदुत्व के स्तंभ और “जो हिंदू मत पर बात करेगा वही देश पर राज करेगा” जैसे नारों के तले जीवन भर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का जाप करने वाले भाजपा अध्यक्ष के मुंह से जिन्ना के सेक्युलर और इतिहास रचने वाले व्यक्ति होने की बात आरएसएस के लिए एक बम से कम न थी.

और इससे भी ज़्यादा हैरान करने वाली बात ये थी कि आडवाणी ने ये कहते हुए भाजपा के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया कि जिन्ना के बारे में वह अपने विचारों पर क़ायम हैं.

भारतीय अखंडता का झंडा उठाने वाली आरएसएस की ओर से आडवाणी की जो ले दे हुई वह तो अपनी जगह है लेकिन सेक्युलर कांग्रेस भी आडवाणी की निजी राय का बोझ न सह सकी और उसके प्रवक्ता अभिषेक सिंघवी ने जिन्ना को सेक्युलर कहने वाले आदमी के बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अब आडवाणी को ये भी बताना चाहिए कि उनके अनुसार सेक्युलर शब्द का क्या अर्थ है.

निजी राय

मज़े की बात तो ये है कि आडवाणी को भाजपा ने लोक सभा के पिछले चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया और भाजपा की हार के बाद वह संसद में विपक्ष के नेता हैं, जबकि जसवंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया. हालांकि जसवंत सिंह कहते ही रह गए कि ये किताब उनकी निजी राय और शोध है और इसका भाजपा की नीति या पक्ष से कोई लेना देना नहीं है.

कोई ये भी नहीं कह सकता है कि आडवाणी का मांसिक संतुलन ठीक नहीं है या जसवंत सिंह सठिया गए हैं. उनमें से एक की ख्याति उग्रवादी विचारधारा के लिए है और दूसरे की शोहरत ख़ुद भाजपा में ही एक उदारवादी प्रजातांत्रिक की है.

विचार और पृष्ठभूमि के इतने बड़े अंतर के बावजूद अगर ये दोनों नेता मोहम्मद अली जिन्ना के बारे में एक जैसे विचार रखते हैं तो जिन्ना के जीवन के कुछ पहलू तो ज़रूर ऐसे होंगे जो छह दशक बीत जाने के बाद भी ऐसे तजुर्बेकार और कट्टर राजनीतिक विचार रखने वाले व्यक्तियों का विचार बदल रहे हैं.

अच्छी बात ये है कि कम से कम भारत में शैक्षणिक और शोध कार्य उस वयस्कता के स्तर पर पहुंच रहे हैं जहां अहं और राजनीतिक मसलेहत को एक ओर रख कर अपने विरोधियों पर भी ईमानदारी या परंपरा से हट कर गंभीरता से शोध की कोशिश हो रही है.

जबकि पाकिस्तान में आज भी अगर कोई ज़िम्मेदार शोधकर्ता विभाजन, गांधी, नेहरू या मुजीब को परंपरागत विचारधार से अलग होकर तथ्यों की कसौटी पर रख कर परखने की कोशिश करे तो उसे स्वयं को ग़द्दार, देश द्रोही, भारतीय एजेंट या रॉ का एजेंट कहलवाने और भर्त्सनापूर्ण बयानों और प्रदर्शन के लिए मानसिक रूप से तैयार रहने की ज़रूरत है.

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