अफ़ग़ानिस्तान : उधार की ज़िंदगी

काबुल

काबुल हवाई अड्डे पर विमान धीरे-धीरे उतर रहा था और जो नज़ारा आँखों के सामने था वो अफ़ग़ानिस्तान का यथार्थ बयान कर रहा था.

पश्चिमी देशों के सैन्य विमान उनकी यहाँ मौजूदगी की कहानी बता रहे थे तो अफ़ग़ानिस्तान की उधार की ज़िंदगी की कहानी भी कह रहे थे.

काबुल के नए टर्मिनल ने हवाई यात्रियों की सहूलियत बढ़ा दी है. इसका निर्माण, यहाँ की हर काम करती चीज़ की तरह विदेशियों ने किया है.

जिस गाड़ी मे मैं अपने होटल पहुंची वो विदेशी थी, जिस सड़क पर गाड़ी दौड़ रही थी उसका निर्माण किसी दाता देश ने कर दिया और जिस होटल में पहुंची उसे चलाने वाला हिंदुस्तानी था.

किसी ने मुझ से कहा कि अफ़ग़ानिस्तान दान पर टिका है, सब कुछ यहाँ जो आप को दिख रहा है वो किसी की खैरात है. इनका अपना कुछ नहीं.

मैने मन ही मन सोचा बात में थोड़ा दम तो है. शायद चमचमाते सुपर मार्केट, आयातित सामान और हर ओर डॉलर में क़ीमतें मुझे बता रहीं थीं कि यहाँ की अर्थव्यवस्था में अमरीका और दूसरे देशों की कितनी छाप है और कितनी स्वयं अफ़ग़ानिस्तान की.

यहाँ तक कि आज अंग्रेज़ी बोलने वाले जिन युवाओं को नौकरियाँ मिली हैं वो भी विदेशियों के ग़ैर सरकारी संगठनों में या फिर इन दूतावासों द्वारा चलाए जा रहे अनेकों सहायता कार्यक्रमों में...यानी ये भी उधार की...

पर क्या ये सब वाकई उधार है और अगर है भी, तो जीवन का ये उसूल भी है कि मुफ़्त में कुछ नहीं मिलता. तो इस सबकी क्या क़ीमत चुकानी पड़ेगी अफ़ग़ानिस्तान को या वो कौन सी क़ीमत चुका रहा है.

सब चाहते हैं दोस्ती

आज भी चाहे पड़ोसी पाकिस्तान हो या ईरान या भारत, सभी चाहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में ऐसा शासन हो जो उसका दोस्त हो. ऐसा प्रशासन हो जिसमें उसकी चले क्योंकि इन सभी के लिए पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान अपने-अपने कारणों से महत्वपूर्ण है.

पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की सीमा एक है. धर्म और आबादी भी दोनों को जोड़ता है. पाकिस्तान चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान में उसकी भूमिका बनी रहे.

ईरान और अमरीका के रिश्ते जग ज़ाहिर है.अगर अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका रहता है तो भला ईरान इसे कैसे पचाए. इसलिए वो भी चाहता है कि उसका दखल यहाँ रहे.

भारत चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान में और कुछ नहीं तो कम से कम ऐसा शासन रहे जो उसका दोस्त हो और नीति ऐसी बने जो किसी दूसरे देश के इशारों पर न बनी हो.

ये तो हुई पड़ोसी देशों की बात. पर ज़रा सोचिए अमरीका ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों की, जिनके नागरिक यहाँ फ़ौज के रुप में तैनात हैं.

कई सैनिकों की जानें गई हैं और जब जब कफन में लिपटे फौजी अपने देशों को लौटते हैं वहाँ की सरकारों से सवाल पूछा जाता है कि आखिर क्यों वो वहाँ हैं... और हाल के महीनों में जान-माल का नुक़सान बढ़ा है और लोगों का धैर्य भी कम हुआ है.

पर कुछ तो है मजबूरी इन सरकारों की, भले ही वो अफ़ग़ानिस्तान की भलाई का बहाना बनाएँ. पर असल में शायद ये इस देश की क़िस्मत है कि सदियों से यहाँ का इस्तेमाल एक बड़े खेल के लिए किया जा रहा है.

और उधार नहीं

दुर्गम पहाड़ों के बीच, बीहड़ों में और प्रकृति के दिए कठिन जलवायु ने इन लोगो को मज़बूत बनाया है और बची-खुची कसर तीन दशकों से चल रहे गृहयुद्ध ने पूरी कर दी है.

आज एक आम अफ़ग़ान अपने जीवन के पचास वसंत भी नहीं देख पाता. हज़ारों बच्चों को युद्ध ने अनाथ बना दिया. जो गोलियों से बचे उन्हें खराब पानी और बीमारियाँ लील गईं.

यहाँ की आधी आबादी, यानी अधिकतर औरतें परदे के पीछे ही चुप्पी साधे जीवन का बोझ ढो रही हैं. इनमें से कई तो अपना पचासवाँ जनमदिन भी नहीं मना पातीं. इनका जीवन तो आज भी उधार का ही रहा.

पर ये सब चेहरे अब शायद मौन नहीं...ये खुद्दार चेहरे हैं..ये उधार नहीं चाहते, ये खैरात नहीं चाहते. आप कह सकते हैं कि ये भीख नहीं चाहते और न ही खुद्दार भिखारी के रुप में पहचाने जाना चाहते हैं.

पर काबुल से लौटते हुए तालेबान की धमकियों के बीच वोट डालने आए लोगों से मुलाक़ात कर ये विश्वास हो आया कि नया अफ़ग़ानिस्तान न निराश है, न हताश है और चाहे आज यहाँ डालर की तूती बोल रही हो वो जानता है कि कल अफ़ग़ानी का समय आएगा और इसे वो खुद लाएगा.

ये खैरात नहीं होगी.

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