बच सकते हैं बेघर होने से

  • 30 अगस्त 2009
नदी का कटाव
Image caption बांगलादेश में हर साल लगभग एक लाख लोग देश की दो बड़ी नदियों की तेज़ धारा से बेघर हो जाते हैं.

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि उसने एक ऐसा तरीक़ा विकसित कर लिया है जिससे उन हज़ारों बांग्लादेशियों की मदद की जा सकती है जो हर साल नदी के तटों की मिट्टी बह जाने से बेघर हो जाते हैं.

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) का कहना है कि उपग्रह के माध्यम से ली गई तस्वीरों के अध्ययन से ये पता लगाया जा सकता है कि कौन सा इलाक़ा नदी के कटाव की चपेट में आ सकता है और फिर प्रभावित लोगों को मदद पहुँचाई जा सकती है.

बांगलादेश में हर साल लगभग एक लाख लोग देश की दो बड़ी नदियों ब्रह्मपुत्र और गंगा (बांगलादेश में इसे जमुना और पद्मा कहा जाता है) की तेज़ धारा से बेघर हो जाते हैं.

जब मॉसून में नदी उफान पर होती है तो हज़ारों हेक्टेयर ज़मीन को पानी बहा ले जाता है.

जबकि प्रभावितों को बहुत ही मामूली मदद मिलती है जिससे बड़ी संख्या में लोग पलायन करते हैं और वो राजधानी ढाका की झुग्गी- झोपड़ियों में आकर रहने लगते हैं.

'ख़ामोश आपदा'

बांगलादेश में यूएनडीपी के सहायक निदेशक अमिनुल इस्लाम का कहना है, "ये एक ख़ामोश आपदा है".

वो आग कहते हैं, "हर साल हज़ारों लोग अपनी ज़मीन को खो रहे हैं और ख़ामोशी के साथ लोग इसके शिकार बन रहे हैं, क्योंकि कोई भी इसका लेखा-जोखा नहीं रखता."

अमिनुल इस्लाम का कहना है, "अगर कोई आँकड़ा हो और आप उन सब को मिला दें तो आप पाएंगे कि ये एक चक्रवात से भी बड़ी आपदा है जो काफ़ी ध्यान आकर्षित करता है और जिसे अंतरराष्ट्रीय सहायता भी मिलती है."

यूएनडीपी इस समय तीन ऐसे इलाक़ो में पाइलट प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है जो इस साल कटाव के चपेट में आ सकते हैं.

यूएनडीपी ये काम ढाका के पर्यावरण और भौगोलिक सूचना सेवा केन्द्र के साथ मिलकर रहा है.

अध्ययनकर्त्ता ख़तरे के स्तर को बताने के लिए लाल और पीला रंग का इस्तेमाल कर रहे हैं. उनका ये काम पिछले 25 सालों की उपग्रह की तस्वीरों और मि्टटी पर किए गए अध्ययन पर आधारित है.

उत्तर पश्चिम ढाका में सिराजगंज के नज़दीक कैजुरी इलाक़ें पर इनकी भविष्यवाणी सही साबित हो चुकी हैं.

Image caption जब मॉसून में नदी उफान पर होती है तो हज़ारों हेक्टेयर ज़मीन को पानी बहा ले जाता है.

इस साल जून से अबतक जमुना नदी का 10 किलोमीटर किनारा नष्ट हो चुका है और लगभग दो हज़ार लोग अपना घर गँवा चुके हैं.

एक प्रभावित अहमद अली का कहना है, "यह बहुत ही जल्दी होता है, पानी के तेज़ बहाव से ज़मीन की सतह लापता हो जाती है."

एक स्थानीय पारषद सैफ़ुद्दीन भी ऐसी समस्या से जुझ चुके हैं, कहते हैं, "इससे बचने के लिए लोगों को बताया जाना चाहिए जो इस समस्या के बारे में कुछ नहीं जानते."

लेकिन लोग शुक्रगुज़ार है कि इस साल उन्हें इस सिलसिले में चेतावनी मिली हैं.

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