अफ़ग़ानिस्तान और गठबंधन सेनाएँ

  • 4 सितंबर 2009
Image caption गठबंधन सेनाओं पर दबाव बढा है

अफ़ग़ानिस्तान मे गठबंधन सेनाओं के लिए मुश्किल समय है, उन पर लगातार हमले बढ़ रहे हैं और उनके ज़्यादा सैनिक मारे जा रहे हैं.

लेकिन इन हालात में वो अफ़गानिस्तान छोड़ कर चली जाएँ, ऐसा संभव नही है.

इस समय बेशक गठबंधन सेनाओं के लिए मुश्किल समय है पर तालेबान आज जितना कमज़ोर है उतना कमज़ोर वो कभी नही था और ऐसे मे अगर गठबंधन सेनाएँ चली जाती हैं तो अफ़गानिस्तान फिर गृहयुद्ध मे फँस जाएगा.

इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान के आम लोग ताज़िक, उज़्बेक, हज़ारा या फिर एक हद तक पश्तून भी नहीं चाहते की गठबंधन सेनाएँ अफ़ग़ानिस्तान छोड़ कर चली जाएँ.

अफ़ग़ानिस्तान मे गठबंधन सेनाओं की मुश्किलों के कई कारण हैं उनमे से एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि ये सेनाएँ पश्तून इलाक़ों मे अपनी पैठ नहीं बना पाईं हैं. यहाँ इनके पास करज़ई के अलावा कोई और बड़ा नाम नही हैं और करज़ई का अब पहला सा रुतबा नही रहा.

उनकी लोकप्रियता घटी है और अब वो लोगों और गठबंधन सेना की पसंद कम मजबूरी ज़्यादा हैं.

दूसरा बड़ा कारण है कि अफ़ग़ानिस्तान मे पुननिर्माण का काम अच्छा नहीं हुआ है. उत्तरी इलाक़े मे तो फिर भी कुछ काम हुए हैं पर पश्तून इलाक़ा अभी भी पिछड़ा हुआ है.

तीसरा कारण है यह है कि अफ़ग़ानिस्तान की अपनी सेना और पुलिस को खड़ा करने का काम जितनी तेज़ी से होना चाहिए था, वो नहीं हुआ है.

पर इन सब कारणों को ध्यान मे रखते हुए भी इस नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता कि गठबंधन सेनाओं के लिए अफ़गानिस्तान मे कोई गुंजाईश नहीं बची है.

इन सेनाओं ने तालेबान के असर को सीमित करने में कामयाबी पाई है और उसको अभी इस काम को आगे बढाना होगा, ज़्यादा नुकसान उठाने के बावजूद.

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