ज़रदारी के एक साल का रिकॉर्ड कार्ड

  • 9 सितंबर 2009
आसिफ़ अली ज़रदारी
Image caption बेनज़ीर भुट्टो की मौत के बाद ज़रदारी ने राजनीति में क़दम रखा था

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने देश के सबसे शक्तिशाली पद पर बैठने के एक वर्ष के भीतर अपने व्यक्तित्व के बारे में कुछ मिली-जुली छाप छोड़ने की कोशिश की है.

कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि आसिफ़ अली ज़रदारी देश में पैदा हुए नेतृत्व ख़ालीपन को भरने में कामयाब नहीं हो पाए हैं.

सेना अब भी सरकार के नियंत्रण से बाहर नज़र आती है, चरमपंथियों का सफ़ाया होना अभी दूर की बात लगती है और अर्थव्यवस्था का अब भी पटरी पर आना बाक़ी है.

हालांकि कुछ अन्य पर्यवेक्षक स्वीकार करते हैं कि आसिफ़ अली ज़रदारी अपने दोस्तों और दुश्मनों की सबसे ख़तरनाक आशंकाओं के विपरीत साबित हुए हैं.

कहने का मतलब ये है कि आसिफ़ अली ज़रदारी ने किसी एक गीत के बदले कोई सरकारी संपत्ति नहीं बेची है, कोई ऐसा बड़ा वित्तीय घोटाला नहीं हुआ है जिसमें राष्ट्रपति की उंगलियों की छाप नज़र आती हो और उन्होंने सरकार के राज़ ग़ैर-दोस्त देशों को नहीं बेचे हैं.

राष्ट्रपति भवन में आसिफ़ अली ज़रदारी की प्रविष्टि बस एक संयोग ही कहा जा सकता है क्योंकि उनकी पत्नी बेनज़ीर भुट्टो की मौत के बाद उनका रास्ता बना था. बेनज़ीर भुट्टो ने आसिफ़ अली ज़रदारी को राजनीति से बाहर रखने की भरसक कोशिश की थी और उन्हें वर्ष 2008 का चुनाव भी नहीं लड़ने दिया था.

ऐसा इसलिए भी था क्योंकि ज़रदारी की छवि एक व्यक्ति की बन चुकी थी जो कथित तौर पर भ्रष्ट सौदेबाज़ी में माहिर बन चुके थे और अगर मौक़ा मिला तो अपनी जेबें भरने के लिए वो देश को नुक़सान पहुँचाने से भी बाज़ नहीं आएंगे.

अपराध साबित नहीं

बेनज़ीर भुट्टो का विश्वास था कि देश के कुख्यात सुरक्षा संस्थानों ने आसिफ़ अली ज़रदारी को भ्रष्टाचार के आरोपों में इसलिए फँसाया था ताकि ख़ुद भुट्टो को राजनीतिक समझौते करने के लिए मजबूर किया जा सके.

एक स्वतंत्र रुख़ और विचार रखने वाली राजनेता के रूप में बेनज़ीर भुट्टो की छवि कभी भी सुरक्षा संस्थानों को रास नहीं आई और सुरक्षा संस्थानों के कुछ कनिष्ठ अधिकारियों ने तो बेनज़ीर भुट्टो को सार्वजनिक तौर पर यहाँ तक घोषित कर दिया कि भुट्टो देश की 'सुरक्षा के लिए एक ख़तरा' हैं.

आसिफ़ अली ज़रदारी ने भी भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करते हुए आठ वर्ष जेल में गुज़ारे. यह अवधि उस जेल अवधि से कुछ ज़्यादा है जो उन भ्रष्टाचार के आरोपों में उनका अपराध साबित होने के बाद उन्हें दंड के तौर पर काटने को कहा जाता.

लेकिन ज़रदारी का कोई अपराध साबित नहीं हुआ और अनेक मुक़दमों में को अदालत में सुनवाई ही नहीं हुई. शायद वादी पक्ष के पास ज़रदारी के ख़िलाफ़ को ठोस सबूत नहीं थे या फिर ज़रदारी के ख़िलाफ़ अपराध साबित करने में वादी पक्ष की ज़्यादा दिलचस्पी ही नहीं थी.

लेकिन इसके बावजूद जब वह वर्ष 2008 में राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बने तो उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप फिर से ताज़ा हो गए और उन पर ख़ासी बहस हुई.

हाल के समय में अनेक लोगों का आरोप है कि ज़रदारी की सरकार चरमपंथी गतिविधियों पर क़ाबू पाने में नाकाम रही है, बिजली की क़िल्लत की समस्या का कोई हल नहीं निकला है, महंगाई नहीं रोकी जा सकी है और सुरक्षा हालात में कोई बेहतरी नहीं आई है.

लेकिन कुछ अन्य पर्यवेक्षकों और विपक्षी नेताओं का ये भी मानना है कि ये सब सिर्फ़ एक वर्ष में हासिल नहीं किया जा सकता है.

कहा जा रहा है कि पाकिस्तान में 1950 से जारी सैनिक शासन में आसिफ़ अली ज़रदारी तीसरे 'असैनिक शासन के हस्तक्षेप' का नेतृत्व कर रहे हैं.

सेना ने 1950 के दशक में ही रक्षा मामलों की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी और उसके बाद तो सेना ने सरकार के विभिन्न क्षेत्रों में निर्णायक रूप से अपना प्रभाव बढ़ा लिया है जिनमें विदेश नीति भी शामिल है.

आसिफ़ अली ज़रदारी सेना के इस प्रभाव को छोटी सी अवधि में ख़त्म नहीं कर सकते और यह काम वो अकेले भी नहीं कर सकते हैं.

मज़बूत जड़ें

चरमपंथियों के ख़िलाफ़ सेना जो अभियान चला रही है उसकी वजह से भी वो राजनेताओं की निगरानी से सुरक्षित समझी जाती है. कुछ मित्र देशों ने भी सुझाव दिया है कि सेना को इस तरह की किसी निगरानी से बाहर रखा जाना चाहिए.

कुछ विपक्षी नेताओं ने पूर्व सैनिक शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ पर मुक़दमा चलाने की माँग की है और उनका कहना है कि पाकिस्तान सरकार मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने में इसलिए झिझक रही है क्योंकि सूदी अरब और ब्रिटेन सरकारों ने ऐसा करने से मना किया है.

इस सबके बीच सेना अपनी जड़ों की मज़बूती को लेकर बिल्कुल आश्वस्त है. वर्ष 2008 में सेना ने सरकार के आदेशों की दो बार अनदेखी की.

एक बार तब जब सरकार ने गुप्तचर एजेंसी आईएसआई को असैनिक सरकार के नियंत्रण में लाने की कोशिश की और दूसरी बार तब जब सरकार ने मुंबई में नवंबर 2008 में हुए हमलों के बाद आईएसआई प्रमुख को भारत जाने का आदेश दिया था.

लेकिन पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में हाल के अभियानों में सेना की कामयाबी को राजनीतिक नेतृत्व की कामयाबी के तौर पर देखा जा रहा है. समझा जा रहा है कि राजनीतिक नेतृत्व चरमपंथियों को अलग-थलग करने के लिए संकल्पबद्ध नज़र आ रहा है और सेना पर चरमपंथियों का मुक़ाबला करने का भी दबाव डाल रहा है.

स्वात घाटी में सरकार और सेना को जो भी कामयाबी मिली है वो हालाँकि कुछ ज़्यादा नहीं है लेकिन असाधारण अवश्य है. वहाँ सेना के इससे पहले के अभियान बुरी तरह नाकाम रहे थे.

आसिफ़ अली ज़रदारी ने गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र को महत्वपूर्ण स्वायत्तता देने के लिए एक क़ानून पर भी दस्तख़त किए हैं. ऐसी संभावना भी है कि एक नया क़ानून और बनाया जा रहा है जिसके तहत क़बायली क्षेत्रों के निवासियों को हासिल क़ानून अधिकारों दायरा बढ़ाया जाएगा.

ये क़बायली इलाक़े पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच स्थित हैं और उनके बीच स्थित सीमा पर विवाद बरक़रार है.

ज़्यादा सहिष्णु

गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र भी भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित है. इन दोनों क्षेत्रों के लोग भी अपने लिए क़ानूनी और राजनीतिक अधिकारों की माँग कर रहे हैं लेकिन पाकिस्तान सरकार अभी तक इन माँगों की अनदेखी करती रही है.

Image caption ज़रदारी ने भारत के साथ भी रिश्ते सुधारने की कोशिश की है

राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी सत्तारूढ़ और विपक्षी राजनेताओं के बीच राजनीतिक मतभेद उभरने से रोकने में कामयाब रहे हैं जिसे ख़ासा महत्वपूर्ण समझा जा रहा है.

मार्च 2009 में उन्होंने बेमन से ही, लेकिन मुशर्रफ़ शासन काल में बर्ख़ास्त मुख्य न्यायाधीश इफ़्तेख़ार चौधरी को बहाल करने पर सहमत हुए, हालाँकि उन्होंने ऐसी नवाज़ शरीफ़ के दबाव में आकर किया.

इसलिए लब्बोलुबाव ये है कि आसिफ़ अली ज़रदारी ने भले ही एक वर्ष के दौरान इस पद पर रहकर कोई करिश्मा नहीं दिखाया हो लेकिन एक वर्ष तक इस पद पर टिके रहना ही अपने आम में एक उपलब्धि है.

उनके दौर में देश में फिर से लोकतंत्र बहाल हुआ है, उन्होंने प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक गुटों के बीच ज़्यादा सहिष्णुता बनाई है, चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अनेक सैनिक अभियानों की अध्यक्षता की है और देश में अधिकारों की स्थिति में भी कुछ प्रगति की है.

पाकिस्तान जैसे अनपेक्षित संभावनाओं वाले देश में यह कहना मुश्किल है कि क्या आसिफ़ अली ज़रदारी अपनी इन कामयाबियों को आधार बनाकर अगले वर्ष में भी कुछ नई कामयाबियाँ हासिल कर पाएंगे या नहीं.

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