अपने दुर्ग में नाकाम भाजपा

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Image caption भाजपा सिर्फ़ एक बार यहाँ से जीती है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और अंबेडकरवादी विचार के मानने वालों के दिल और दिमाग में नागपुर बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

अगर आप नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय हेडगेवार भवन जाएँ, तो इमारत की दूसरी मंज़िल पर एक कमरे में प्रदर्शनी दिखाता हुआ आपका 16-17 साल का किशोर गाइड आपको बताएगा कि यहीं 1925 में संघ के संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने पहली बार भगवा ध्वज फहराया था.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, भाजपा नेता संघ की कसमें खाते मिल जाएँगें.

संघ के प्रचारक अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने. आज भी लोकसभा में विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी से लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तक कई भाजपा नेता संघ के स्वयंसेवक हैं.

लेकिन कई राज्यों में सरकार चलाने वाले संघ का राजनीतिक मानसपुत्र समझे जानी वाली भाजपा अपने घर नागपुर में कोई बड़ी राजनीतिक उपलब्धि हासिल नहीं कर पाई है.

भाजपा को मात्र एक बार सफलता

आज़ादी के बाद से आज तक केवल एक बार भाजपा के प्रत्याशी बनवारी लाल पुरोहित 1996 में भाजपा के टिकट से लोकसभा का चुनाव जीते थे.

लेकिन पुरोहित मूलत: कांग्रेस से आए थे और पहले दो बार वो कांग्रेस की टिकट पर जीत चुके थे. दूसरी बार पुरोहित भी नहीं जीते.

नागपुर विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यापक और आरएसएस से जुड़े डॉक्टर योगानंद काले नागपुर में मुसलमान और दलित मतदाताओं की बड़ी संख्या को इसका कारण बताते हैं.

वे कहते हैं, "नागपुर में मुसलमान 10 प्रतिशत वोटर हैं और वो जिस ओर रुख़ करते हैं वो जीत जाता है."

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नितिन गडकरी जो की ख़ुद नागपुर से हैं, कहते हैं, "मुसलमान और दलितों के बीच फैला जातिवाद का ज़हर इसके लिए ज़िम्मेदार है."

हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस नागपुर लोकसभा क्षेत्र की 12 में से आठ सीटों पर सबसे आगे थी.

गडकरी दावा करते हैं कि इस बार भाजपा-शिवसेना गठबंधन को परिसीमन से तय हुई नागपुर की 10 विधानसभा सीटों में से कम से कम आठ मिलेगीं.

अंबेडकर हार गए थे

भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष और पहले बड़े दलित नेता भीम राव अंबेडकर के कारण भारत के करोड़ों दलित और बौद्ध भी इस शहर को काफ़ी महत्व देते हैं.

इस शहर के बीचों-बीच बनी दीक्षा भूमि पर अंबेडकर ने अपने अनुयायियों के साथ 1956 में बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी.

आज भी नागपुर दलित वैचारिक चेतना का बड़ा केंद्र है. लेकिन आंबेडकर ख़ुद यहाँ से चुनाव हार गए थे.

आज के दिन तक अंबेडकरवादी विचारधारा को मानने वाले लोगों को नागपुर में कोई बहुत ही बड़ी सफलता नहीं मिली है.

क्या हैं कारण?

दलित विचारक और कई दलित आंदोलनों से जुड़े विचारक डॉक्टर भाऊ लोखंडे इसके पीछे वही कारण बताते हैं जो संघ समर्थक भाजपा की हार के पीछे.

Image caption दलित भी नागपुर को अपनी वैचारिक भूमि मानते हैं

वे कहते हैं, "नागपुर में सवर्ण इतने हैं कि किसी दलित का रास्ता रोक सकें इसलिए एक दो विधानसभा सीटों को छोड़ कहीं अंबेडकरवादी दलित जीत नहीं पाते. दूसरा कारण है अंबेडकरवादियों के बीच एकता का अभाव है. अंबेडकर ने जिस रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया की स्थापना की थी, उसके कई टुकड़े हो गए और कोई एक दूसरे को सहन नहीं कर सकता."

इस तरह दो विचारधाराएँ, जिन्होंने भारत की राजनीति को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया, उनको उनके घर में जाति ने पछाड़ दिया.

दोनों ही विचारधाराओं ने अपने-अपने तरीक़े से जाति नामक संस्था का चरित्र बदलने की कोशिश की थी और बहुत जगह सफल भी हुए.

लेकिन उनके अपने घर नागपुर के दुर्ग में जाति पूरी सफलता के साथ पहरा दे रही है.

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