'मुश्किलों से ख़ुद को बचा लेंगे'

दुबई
Image caption संकट के सार्वजनिक होने के बाद भारत समेत दुनिया भर के शेयर बाज़ार गिरे थे

दुबई के हालात का असर आम नागरिकों पर पड़ा जिनमें भारत से गए लोग भी शामिल हैं. वहाँ की एक मीडिया कंपनी में काम करने वाले ऐसे ही एक भारतीय ने बीबीसी को अपनी आपबीती सुनाई. वह अपना और अपनी कंपनी का नाम देने से हिचक रहे थे और हमने उनकी इच्छा का सम्मान किया.

"मैं क़रीब साढ़े तीन वर्ष पहले दुबई आया. मेरे मन में सबसे पहली बात यह थी कि इस साफ़-सुथरे और विकसित शहर में मैं एक अच्छा जीवन जी सकूँगा. मुझे लगा कि मैं भारत से ज़्यादा दूर नहीं हूँ और यहां रह कर मैं अपने खान-पान, रीति-रिवाजों और संस्कृति को अपनाए रहूँगा.

सबसे पहले मुझे अपने लिए एक अच्छा मकान देखना था. मैंने एक अख़बार में मकान के लिए विज्ञापन देखा जो मेरे बजट के अनुकूल था. दोस्तो ने मुझे सलाह दी कि बिना देर किए मैं उस मकान को किराए पर ले लूँ नहीं तो वह भी हाथ से निकल जाएगा. मैंने दोस्तो की बात मानी और उस मकान को किराए पर ले लिया.

कुछ महीनों के अंदर यह बात मैं समझ गया कि रियल एस्टेट के कारोबार में ख़ूब पैसा है. मैंने अपने एक दोस्त की सलाह मानते हुए कारोबारी इलाक़े के नज़दीक एक ‘फ्री होल्ड’ इलाक़े में एक बेडरूम फ़्लैट बुक करवाया. उन दिनों ऐसा था कि निर्णय लेने में यदि आपने थोड़ी देर भी की तो आपके हाथों से वह संपत्ति निकल जाएगी. इसलिए मैंने आनन-फ़ानन में एक बैंक से फ़ाइनेंस करवा कर फ़्लैट ख़रीद लिया.

चार महीने के बाद मैंने सोचा कि एक बेडरूम का फ़्लैट हमारे परिवार के लिए छोटा है. मेरा बेटा बड़ा हो रहा था उसे भी एक कमरा चाहिए. दो बेडरूम फ़्लैट के लिए किराए इतने ज़्यादा थे कि उसके लिए मुझे शारजाह जा कर रहना पड़ता.

मैंने अपने प्रॉपर्टी एजेंट से बात की जिसने मुझे फ़्लैट बेचने की सलाह दी. उनका कहना था कि फ़्लैट कुछ महीनों में तैयार हो जाएगा और मुझे 3.5 लाख दिरहम यानी क़रीब 40 लाख रुपए का लाभ होगा. चार महीने में 40 लाख रूपए? मैंने सोचा कि यह सौदा फ़ायदे का है.

मैंने अपना एक बेडरूम फ़्लैट बेच दिया और उसी इलाक़े में दो बेडरूम का फ़्लैट ख़रीदने के लिए पैसा लगा दिया.

वह फ़्लैट तैयार हो गया था और मैंने अपने नए मकान में रहना शुरु कर दिया. जब मैं फ़्लैट में रहने लगा तब जाकर पता चला कि मकान के साथ कई ऐसी क़ीमतें और प्रावधान जुड़े हुए थे जिनका पता मुझे ख़रीदने से पहले नहीं था. सो मुझे और पैसे का जुगाड़ करना पड़ा.

बचत की आदत

Image caption वर्ष 2008 के मध्य से प्रॉपर्टी के दाम गिरने लगे

नए मकान में रहने के चार महीने के बाद प्रॉपर्टी एजेंट ने मुझसे संपर्क किया. उन्होंने कहा कि यदि मैं अपना मकान बेच दूँ तो मुझे 80 लाख रुपए का फ़ायदा हो सकता है. लेकिन मैं अपने मकान में ख़ुश था, मैंने उनकी बात नहीं मानी. वैसे भी मुझे मकान के किराए में जितने पैसे देने पड़ते उससे कम ही मासिक किश्त मैं चुका रहा था.

वर्ष 2008 की शुरुआत में प्रॉपर्टी की क़ीमत हर दिन एक लाख 20 हज़ार रुपए बढ़ती दिख रही थी. यह ऐसा लुभावना था कि मैं मीडिया में अपने 15 वर्ष पुराने कैरियर को छोड़ कर रियल एस्टेट यानी ज़मीन-जायदाद के धंधे में लगने की सोचने लगा. मीडिया में रहने के कारण मुझे ज़मीन-जायदाद के बारे में कई प्रॉप्रटी एजेंटों से ज़्यादा जानकारी रहती थी.

लेकिन उस वर्ष के मध्य तक सब कुछ बदल गया. लोगों की नौकरी जाने लगी. बैक कर्ज़ मांगने वालों पर कड़ी निगरानी रखने लगे. अचानक ख़रीदने वालों से कहीं ज्यादा प्रॉपर्टी बाज़ार में दिखने लगी.

आने वाले बाद के महीनों में स्थिति और भी ख़राब होने लगी. सड़कों पर भीड़ कम दिखाई देती थी. स्कूलों में दाख़िला लेने वालों की ज़बरदस्त कमी होने लगी. हर कोई किसी न किसी ऐसे व्यक्ति को जानता था जिनकी नौकरी चली गई.

यह सुनने में भले ही आश्चर्यजनक लगे, लेकिन यह सच है कि भारत और पाकिस्तान के लोग इस संकट के समय भी बेहतर ढंग से रह रहे हैं. क्योंकि हम कड़ी मेहनत करने के लिए तैयार हैं. हमने पैसों की बचत करना सीखा है. जब अर्थव्यवस्था के हालात अच्छे थे तब पश्चिमी देशों के लोग खुल कर ख़र्च किया करते थे. लेकिन अब मंदी के इस दौर में ख़राब हालात से पार पाने के लिए उनके पास पर्याप्त बचत नहीं है.

पिछले हफ़्ते की घोषणा के बाद तस्वीर काफ़ी उलझ गई है. पश्चिमी मीडिया और लोग कह रहे हैं कि आगे काफ़ी परेशानी आ सकती है. मुझे नहीं पता कि किस पर कितना विश्वास किया जाए.

मेरा मानना है कि पाकिस्तानी और भारतीय समुदाय के लोगों के लिए कारोबार पहले की तरह चल रहा है. हो सकता है कि आने वाले दिनों में हालात और भी ख़राब हों, लेकिन हम उन मुश्किलों से खु़द को बचा लेगें. हम कड़ी मेहनत करने के लिए तैयार हैं जिससे हम नौकरी में अपनी ज़रूरत को साबित कर पाएँ. यदि हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तो हमारे पास इतनी बचत है कि इस संकट को झेल जाएँगे."

( इसी संकट से जूझ रहे एक अन्य भारतीय की आपबीती हम कल आप तक पहुँचाएँगे)

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